भारतीय क्रिकेट के फेव फाइव में से तीसरे खिलाड़ी राहुल द्रविड़ ने पैड हमेशा के लिए खोल दिए हैं।....यानि भारतीय क्रिकेट टीम का सबसे संयमित खिलाड़ी..मैदान के अंदर भी मैदान के बाहर भी..संन्यास ले चुका है। नब्बे के दशक में भारत की खेल की दुनिया में एक से एक खिलाड़ी चमके..जो धुमकेतु नहीं थे...बल्कि धुव्र तारे की तरह स्थायी से हो गए...पर उनका तेज सूरज से कम नहीं। क्रिकेट में तेंदूलकर, द्रविड, गांगुली, कुंबले, लक्ष्मण, शतंरज में विश्वनाथ आनंद, टेनिस में लिएंडर पेस..फुटबॉल में बाइचुंग बुटिया..। आप चाहें तो कुछ और नाम भी जोड़ सकते हैं..पर इन सितारों की ख्याति और सफलता अपने खेल के अंतिम समय में भी पूरी चमक के साथ है। भले ही राहुल द्रविड़ का ऑस्ट्रेलिया दौरा खराब रहा..पर इंग्लैंड में सिर्फ द्रविड़ ही चले। एक ऑस्ट्रेलियाई दौरा राहुल के चमकदार सफर पर कोई भी धब्बा नहीं लगाता। कहने वाले कहते हैं कि राहुल सचिन से बड़े खिलाड़ी हैं। वो आखिरी तकनीकि खिलाड़ी थे जो बुक रुल के हिसाब से खेलते रहे..वगैरह वगैरह..पर अब सब सिर्फ बातें हैं.। असल में ये सभी खिला़ड़ी इस तरह की तुलना से परे जाकर अपना खेल दिखाते रहे हैं...तभी ये सब मैदान और मैदान के बाहर आज भी रोल म़ॉडल हैं।
| मैदान के उम्रदराज..पर तेज बरकरार |
राहुल द्रविड़ का संन्यास एक परिवर्तन का हिस्सा है....यानि सत्तर के दशक में जन्मी खिलाड़ियों की ये पी़ढ़ी एक-एक करके मैदान से विदाई की तैयारी में है...खेल के मैदान में ये पीढ़ी बुढ़ौती जा रही है....पर साथ ही सत्तर के दशक में जन्मी ये पीढ़ी के बाकी जगह युवा के तौर पर बागडोर संभाल रही हैं....सत्तर की ये पीढ़ी पचास और उससे पहले की पीढ़ी से विरासत संभालने को पूरी तरह तैयार है...। देश की राजनीति हो...आर्थिक मोर्चा हो...या हो खेल का मैदान..हर जगह अब ये युवा खड़े हो रहे हैं...। पर एक बात माननी पड़ेगी कि पुरानी पीढ़ी अभी चूकी नहीं है...।
यूपी के राजनीतिक मैदान में मुलायम सिंह यादव लोकतंत्र के सहारे जबरदस्त चुनावी जीत दर्ज करके अपनी विरासत अपने बेटे अखिलेश यादव को सौंप चुके हैं....। उधर लोकतंत्र के महासमर में कांग्रेस की जो हालत हुई है, उसे देखकर लगता है कि अब राहुल गांधी पार्टी की बागडोर खुलकर अपने हाथ में ले लेंगे..और पुरानी राजनीतिक पीढ़ी के छाये से अपने को मुक्त करने की कोशिश करेंगे। यानि राजनीति के मैदान में घात-प्रतिघात...साम-दाम-दंड-भेद के वार नई उर्जा के साथ होंगे..। कॉरपोरेट जगत भी बदलाव से गुजर रहा है..देश के प्रतिष्ठित टाटा उद्योग के सर्वेसर्वा रतन टाटा इस साल के आखिर में रिटायरमेंट ले लेंगे..। यहां एक बदलाव होगा...इस बार टाटा की बागडोर टाटा परिवार से बाहर के युवा के हाथ में होगी...। पर परिवार से बाहर हो या परिवार की अगली पीढ़ी...नए चेहरे..ताजी ताकतवर उर्जा के साथ अब अलग-अलग क्षेत्र में बागडोर संभालने वाले हाथ आने का समय हो गया है।
यानि राहुल द्रविड़ का संन्यास एक तरह से उसी परिवर्तन का हिस्सा है जो नई पीढ़ी के लिए जगह बनाता है....अगर इसमें कोई देरी होती है..तो कई बार नियती खुद ये काम करती है...पर ये भी सच है कि क्रिकेट में कोई विरासत नहीं संभाली जाती.....बल्कि जगह भरी जाती है....राहुल के बाद विराट कोहली द्रविड़ की जगह लेने की कूवत दिखा चुके हैं....पर दोनों का अंदाज जुदा है...होता भी यही है...हर कोई परछाई नहीं होता हर बार...कहीं खानदान की विरासत होती है.....कहीं अपने से सीनियर की विरासत का जिम्मा कंधों पर आता है.....। अमिताभ की विरासत अभिषेक नहीं संभाल पाएंगे....हरिवंश राय बच्चन की विरासत अमिताभ ने नहीं संभाली...। तो ये होता रहता है..।
| हैं तैयार हम.. |
लब्बोलुबा ये कि राहुल द्रविड़ के साथ सत्तर के दशक की हमारी पीढ़ी का एक हिस्सा एक पिच से रिटायर हो रहा है...तो दूसरा हिस्सा दूसरी पिचों पर जबरदस्त जलवा दिखाने को तैय़ार है...। नफासत-शराफत की कहानी एक जगह से खत्म हुई हो ...तो दूसरी जगह तैयार है....यानि जरुरी ये नहीं कि विराट कोहली राहुल द्रविड़ की तरह क्लासिकल प्लेयर बन पाते हैं या नहीं..बस देखना ये होगा कि विराट द्रविड़ की तरह इतिहास रच पाते हैं या नहीं...इसका जवाब भी हर बार की तरह आने वाला वक्त ही देगा...तब तक इंतजार तो करना ही होगा...। कहने का मतलब ये कि एक पिच पर भले ही हम नवयुवा न रहें हों... पर दूसरी पिचों पर अभी हम जवां हैं.....। तो अब नए सफर पर आपका स्वागत है...आप किस तरह कहां-कहां नई शुरुआत करते हैं..ये अब आप पर है...और इसके लिए....हैं तैयार हम...!!!!
कोई शक ? अगर किसी को शक हो तो हो...हमें क्या ?.....भई हम तो तैय़ार हैं धमाल के लिए......नई शुरुआत के लिए...। जय हिंद








