Sunday, June 03, 2012

छलिया तेरा नाम....Rohit


 नीली आंखों का जादूगर..ग्रैट शौमेन...भारतीय फिल्मों में एक से एक नायाब सितारे जुड़े..पर किसी सितारे में इतने रंग नहीं....जितने अकेले राजकपूर में...महज 24 की उम्र और एक स्टूडियो की स्थापना....इकादुका फिल्मों का हीरो....डायरेक्टर, प्रोड्यूसर बनने का जोखिम उठाने से झिझका नहीं.... फिल्मों को लेकर ऐसा जुनून....विरले ही किसी में देखने को मिलता है...इस आवारा को मैंने जाना दूरदर्शन पर आती फिल्मों से...पर उन फिल्मों से नहीं जिनका डायरेक्शन आर के बैनर के तले यानि अपने बैनर के तले राजकपूर ने किया हो... मेरे पिताजी ने  जीवन में एक ही फिल्म देखी थी आवारा...वो भी मजबूरी में....दरअसल पटना के रिजेंट हॉल के मालिक के बेटे निर्माता-निर्देशक शिवेंद्र सिन्हा  पिताजी के लंगोटिया यार थे...एक दिन शिबू चाचाजी के पिताजी के करना जाने दोनों दोस्तों को हॉल में जा कर बेठना पड़ा...और इस तरह पिताजी ने जीवन की पहली और आखरी फिल्म देखी....तब से राजकपूर के लिए पिताजी के पास सिर्फ एक नाम था....आवारा....और यही नाम सुनकर राजकपूर को पर्दे पर देखना शुरु किया अपन जैसे लोगो ने.. 
      समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, संप्रदायिकता, तुष्टीकरण जैसे बड़े-बड़े शब्द बचपन से ही आंखों के सामने बहस-चर्चाओं में अपने अर्थ बताते....तो कभी उनका अनर्थ कैसे होता है.....ये सिखाते.....ये सब राजकपूर कि शुरुआती फिल्मों में था...शायद ये भी कारण रहा हो राजकपूर से लगाव का.... जाहिर है ब्लैक एंड व्हाइट दूरदर्शन पर नीली आंखें तो नहीं दिखती थीं....मगर पता नहीं कैसे फिल्मों का जादू तो बचपन से ही चल चूका था.....शायद किताबों से..या दूरदर्शन से.....सिनेमा हॉल तो जाना नसीब होता नहीं था....आखिर गांधीवादी पत्रकार पिता को, फिल्में वक्त की बर्बादी ही लगती थी....बचपन में किसी समय यानि 1979 में...जाने किस सिनेमा हॉल में, एक फिल्म देखी थी..जिसमें गीत था..चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा....शायद किसी रिश्तेदार के साथ। तब हम दिल्ली के केनिंग रोड पर रहते थे....शिबू चाचा तबतक फिल्मों से दूर हो गए थे....फिल्म “किस्सा कुर्सी का” फिल्म को जलाने से लगे सदमे की वजह से...रहते कहीं मंडी हाउस के पास ही थे....शायद वो भी एक कारण बने फिल्मों से लगाव के। 
       उस समय दूरदर्शन पर फिल्में तो आती थीं...पर आर के बैनर की कोई फिल्म नहीं....तब सुना था कि राजकपूर का मानना था कि पिटे हुए डायरेक्टरों की फिल्में टीवी पर आती हैं...औऱ वास्तव में सिर्फ बॉबी को छोड़कर उनके जीवन में कोई फिल्म टीवी पर नहीं आई थी। बॉबी भी इमरजेंसी के दिनों में या उससे थोड़ा पहले टीवी पर आई थी..और चर्चाओं के मुताबिक किसी बंद को विफल करने के अनेक उपायों मे से एक उपाय के तौर पर बॉबी दूरदर्शन पर आई थी....यानि कोई राजनीतिक दवाब। 
     फिल्म आह...बरसात....आवारा....श्री 420....बूट पॉलिश... बताइए कौन सी ऐसी फिल्म है जिसमें नेहरुवादी समाजवाद नहीं है....कौन सी ऐसी फिल्म है जो तमाम दुश्वारियों के बाद सबकुछ ठीक होने की आशा नहीं जगाती...संविधान के पहले पन्ने की पहली लाइन...हम भारत के लोग...क्या नजर नहीं आती इन फिल्मों में। हम भारत के लोग..गरीबी..गुरबत में....समाज के खिलाफ बागी होते तेवरों के बाद भी..क्या वापसी नहीं करते?.....जापानी जूता...इंगलिस्तानी पेंट और रुसी टोपी के बाद भी खालिस हिंदुस्तानी दिल नहीं रखते। हो सकता है कई लोगों को यह अतिश्योक्ति लगे.....पर ये सच हमने अपने आसपास से सिखा...भले ही हालात बदतर होते जा रहे हों....पर प्रयास जारी रखने चाहिए..कौन जाने किस भेष में नारायण मिल जाए.....
     उम्मीदों का दिया ज्यादातर भारतीय हमेशा ही पकड़े रहते हैं..भले ही कोई हमें भाग्यवादी कहकर हमारा मजाक उड़ाए...पर भले की उम्मीद हमें भले की तरफ कदम बढ़ाने कि सोच देती है...यही इस जोकर ने किया....परदे पर कमर्शियल होने के बाद भी...मंनोरंजन के ताने-बाने में भी समाज को नहीं भूला....
      आज भी “प्यार हुआ इकरार हुआ” गीत जब बजता है अपना दिल तो बस धड़कने लगता है....आंखों में कोई न कोई...कुछ न कुछ तैरने लगता है। खैर जिंदगी का फलसफा तो मैं सीखता रहा कई लोगों से....ठीक गुरु दत्तात्रेय के चालीस गुरु की तरह...तो मेरे जैसे मामूली इंसान को कुछ समझाने वालों में....हंसाने वालों में....कुछ बताने वालों में...एक यही जोकर है...यही छलिया है...यही अनाड़ी है....यही ग्रैट शौमेन है।

Saturday, May 19, 2012

जय मां, जय सिनेमा...जय संसद..Rohit

       दिन गुजरते हैं..लोग आते हैं...जाते हैं और इतिहास बनता जाता है। संसद सत्र के साठ साल पूरे हुए.....सिनेमा भी सौ साल का हो गया....मदर्स डे भी गुजर गया...हर तरफ इन तीनों चीज की धूम थी....साठवें सत्र में हर सांसद बोलना चाहता था....कोई ज्यादा...तो कोई कम...ख्वाहिश ऐतिहासिक मौके के सत्र में अपना नाम दर्ज कराने की...सिनेमा के सौ साल भी पूरे हुए...और सिनेमा से ही चलकर एक और दिग्गज अभिनेत्री रहस्यमयी रेखा सांसद मनोनित हुईं...हर जगह माताओं को याद किया..सिनेमा के पर्दे की मां की हर तरफ धूम नजर आई...याद संसद ने भी किया...एक सासंद बोले...""हमने दिवंगत महान लोगो को श्रद्धांजलि दी..पर जिंदा लीजेंड को हम याद नही करते""....कितनी सही बात कही सासंद महोदय ने...सौ साल पहले दादा साहब फाल्के ने पहली फिल्म रिलिज की..पर जीतेजी ही भूला दिए गए....40 के दशक में जब दादा फाल्के चिर निद्रा में सोए तो चंद लोग ही साथ थे....किन हालात में मरे ये तब कई सितारे जानते तक न थे....आज उनके नाम पर फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा सम्मान दिया जाता है...यही समय का चमत्कार है।

      दादा फाल्के के साथ ही याद आ गए...हिंदी के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद...आज भी सबसे ज्य़ादा बिकने वाले हिंदी लेखकों में शुमार....जब उनकी मौत हुई तो कांधा देने के लिए...कहते हैं चार लोग भी नहीं थे....दुर्भाग्य देखिए उनके साथ रहने वाले वो चंद नाम भी भूल रहा हूं....प्रेमचंद जब तक जिंदा थे..आर्थिक स्थिती खराब रही...फिल्मी दुनिया रास नहीं आई..सो छोड़ दी....पर उनके स्वर्गारोहन के बाद....उनकी किताबों की बिक्री से कई लोगो ने कमाया....शायद मां लक्ष्मी भी लेखकों पर जल्दी मेहरबान नहीं होतीं...खासतौर पर हिंदी लेखकों पर..लंदन में शेक्सपीयर का मकान देखिए.....फ्री में अंदर जाने की इजाजत नही....मगर हिंदुस्तान में प्रेमचंद के मकान में जाने की सोचिए मत...

      मदर्स डे...माताओं का दिन....आजाद है भारत माता....ये सौभाग्य है...पर वो त्रस्त है भ्रष्टाचार से....जाहिर है जब सबसे बड़ी मां बदहाल है तो भारत की माताओं कि दशा के बारे में क्या सोंचें। आज भी वो कुपोषित है...ऐसे में बचपन कैसे स्वस्थ होगा....जब बच्चियो से जीने का हक गर्भ में आते ही छीन भी लिया जाता हो...तो आने वाली नस्लें अकेले रहने के लिए अभिशप्त होगीं हीं..क्या करें...जब मां ही स्वस्थ नहीं...शिक्षित नहीं...तो बागडोर संभालने वाला भविष्य कैसे तैयार होगा...विचारणीय है..

    संसद....सभी कानूनों की जननी है...यानि कानून जन्म देने वाली मां......हाल क्या है..बदहाल है....खैर...सिनेमा की हर मां याद है.....करगिल के शहीदों की मां कुछ को ही याद हैं...जाहिर है संसद मे कुछ नेता बढ़िया बोलते हैं.....बिंदास बोलते हैं.....पर वो भी क्या करें...नक्कारखाने में तूती की तरह उनकी बात रह जाती है....हम सुनते भी तो नहीं..पर हां हल्ला मचाते जरुर हैं..

       चलिए सिनेमा के सौ साल के बहाने सही....नींव के पत्थरों को याद तो किया...साठ साल संसद के सत्र होने की वजह से पता तो चला कि हर सांसद सिर्फ शोर नहीं मचाता.....मदर्स डे ने याद तो कराया कि घर में भी मां हैं.....सिनेमा में भी मां है...कई मां कुपोषित हैं....और इन सबसे भी बड़ी स्वर्ग से भी बढ़कर जन्मभूमि भारत मां भी परेशान हैं....जब याद किया है तो शायद कुछ कर पाएं....हम औऱ आप...जय हिंद

Tuesday, April 24, 2012

हर हाल में घर आना होगा लाडो(2)_...Rohit

"भय बिन न होत प्रीति"
     ...अबतक हम लोग पाशाचात्य, प्राचीन भारतीय और गुलामी के 1000 साल के बीच उपजे समाजिक विचारों के बीच झूल रहे हैं। अगर सूक्ष्मता से देखें तो प्राचीन भारतीय परंपरा कई जगह पाशाचात्य विचारों को पछाड़ देती है। फिर ऐसा क्या हो गया जो आदिशक्ति को पूजने वाले समाज में अचानक बच्चियो के हत्यारे पैदा हो गए? वैसे ये जानने के लिए किसी बड़ी भारी रिसर्च की जरुरत नहीं है। हर आम शख्स जो अपने देश को जानता है वो भी इसका उत्तर जानता है। मगर इस वक्त सबसे बड़ा सवाल ये है कि इन सब पर फिलहाल काबू कैसे पाया जाए? इसका पहला उत्तर ये है कि कड़े कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाए। अपराधी को त्वारित दंडित किया जाए।
   अंग्रेजों के बने कानून से उनके ही राज में सती प्रथा बंद हुई या नहीं। हालांकि न्यायालय इस मसले पर काफी सख्त हैं। पर जबतक न्य़ायालयों पर काम का बोझ रहेगा....अपराधी को दंडित करने में देरी होती रहेगी। एक कहावत है कि देरी से मिला न्याय न्याय नहीं रह जाता। तो इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार है? अदालतें इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। न्यायालयों में पहले से ही केसों की भरमार हैं। न्यायाधिशों के कई पद खाली हैं। ऐसे में जल्दी न्याय कई बार सपना सा रह जाता है। अब ये काम पूरी तरह से सरकार का है। मगर सरकारी कि प्राथमिकता की लिस्ट में इसका नंबर नहीं है।
   रामायण में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है भय बिन न होए प्रीति। मगर आज राजदंड का भय कम होता जा रहा है। जब कानून का भय कम होता है तो अपराध तो बढ़ेंगे ही। लोकतांत्रिक देश में कानून का समान राज ही समाज को दिशा दे सकता है औऱ अपराध पर काबू पा सकता है। मगर अभी अपराध के सिद्द होने में ही इतना समय लग जाता है कि कोई और बच्ची तब तक लड़के की चाहत में मार दी जाती है या कूड़े के ढेर में फेंक दी जाती है।
    कानून के काम में तेजी और समाज की विचारधार बदलने के लिए युद्धस्तर पर कोशिश की जानी होगी। आखिर कानून के भय के कारण सती प्रथा बंद हुई...विधवा विवाह के लिए युद्धस्तर पर कोशिशों का नतीजा है कि फिलहाल विधवा विवाह होने पर अब बवाल नहीं मचता। विधवाओं की तीर्थस्थानों में भीड़ एक अलग मसला है। कुछ ऐसा ही जैसा की बुजुर्गों के आश्रम शहरों में ज्यादा बनने की तरह ही। समाज इक्सवीं सदी में जा रहा है। मगर दिमाग मध्यकाल से निकल नहीं पा रहा है। सनातन परंपरा को लेकर असमंजस की स्थिती है। जाहिर है कि मंथन के इस दौर में वो तरीके निकालने होंगे जो दिमाग में जमी धूल को साफ कर सके..(क्रमश:..जारी है)

Tuesday, April 17, 2012

हर हाल में घर आना होगा लाडो..रोहित

     एक के बाद एक बच्चियों के साथ बर्बरता भरा व्यवहार समाज की आंख खोलने के लिए काफी है। दो बच्चियों को सिर्फ इसलिए जान देनी पड़ी की वो लड़के की जगह पैदा हो गईं। बंगलूरु की बच्ची आफरिन को उसी के बाप ने सिगरेट से दागा। महज इसलिए कि उसे लड़का चाहिए था। कल ही गुड़गांव में महज डेढ़ महीने की बच्ची अस्पताल में कोई छोड़ गया।
      वैसे इस तरह की घटनाएं पहले कम प्रकाश में आती थी। अगर आती भी थीं तो लोग इसे भूल जाते थे। पहले इस तरह की घटनाएं दबी रह जाती थीं या एक इलाके की घटना पूरे देश की खबर नहीं बन पाती थी....मगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार की वजह से अब लोगो को जल्दी पता चला जाता है।
      ये सारी घटनाएं इस तरफ इशारा कर रही हैं कि अभी भी अधिकतर लोगों की सोच में बदलाव नहीं आया है। डेढ़ सदी से भारत में हो रहे समाजिक और राजनीतिक प्रयास अब तक उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाएं हैं जहां खड़े होकर हम गर्व से कह सकें की हम पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। बच्चियां सिर उठा कर कहे सकें कि वो गार्गी औऱ मैत्रयी के देश से है। देश के किस प्रदेश की बात करें ओर किसकी नहीं, हर जगह यही हाल है, कहीं ज्यादा तो कहीं कम।
     आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी तक के प्रयासों ने असर तो किया, पर अभी भी आमूलचूल परिवर्तन बहूत दूर है। जिन कारणों से ये सब भारत में शुरु हुआ वो अब तक पूरी नहीं गायब नहीं हुए हैं...और यह कुरीतियाँ तब तक दूर नहीं होंगी जब तक खुद महिलायें खुल कर इसके खिलाफ जंग नहीं करेंगी      “दूधो पूतो फलों” के आशिर्वाद में लड़कियों को जगह देनी होगी। इस सबके लिए सिर्फ आदमी ही दोषी नहीं है। बंगलुरू की बच्ची आफरीन की मां के अनुसार उसे सास ने कह दिया था कि अगर बेटा पैदा नहीं हुआ तो वो उसे घर से निकाल देगी। अब ऐसी मानसिकता में पले आदमी से उम्मीद क्या की जा सकती है।
    देश में आज भौतिक रुप से स्त्री आगे बढ़ रही है...राजनीति हो..सेना हो..प्रशासनिक सेवा हो..या कोई भी फील्ड हर जगह स्त्री परचम फहरा रही है। सब जगह हर कोई अपनी योग्यता से आगे बढ़ रहा है..पर आज जरुरत है मानसिक स्वतंत्रता की। शारीरिक और आर्थिक स्वतंत्रता ही नारी मुक्ति का आखिरी मार्ग नहीं है। अगर ऐसा होता तो आफरिन को मरना नहीं पड़ता और न ही किसी अस्पताल, मंदिर-मस्जिद में कोई बच्ची फेंकी हुई मिलती।
     हर वर्ग में बदलाव आया है..मगर उसकी सच्चाई क्या है, ये सब जानते हैं। दरअसल बदलाव सिर्फ इतना है कि अब लड़की होने पर खुलकर मातम नहीं मनाया जाता। अगर किसी के यहां पहली लड़की होती है तो उसका स्वागत तो होता है....मगर दूसरी संतान के तौर पर सब आशा करते हैं कि लड़का ही हो। यहां तक कि इसके लिए गर्भपात कराने से भी कोई बाज नहीं आता। इस मामले में कई जगह औऱतें भी कम नहीं होती। सास को पोता चाहिए...पोती नहीं। मां को बूढ़ापे का सहारा चाहिए....पराया धन नहीं। ...(क्रमश:...यानि जारी है)

Friday, April 06, 2012

Parveen Babi...अकेले हैं तो गम है?

   परसों यानि 4 अप्रैल को जन्मदिन था परवीन बॉबी का..याद है आपको परवीन बॉबी..बोल्ड, बिंदास, सेक्सी, मॉर्डन परवीन बॉबी....। हिंदी फिल्मों की हीरोइन के स्टाइल को डंके की चोट पर बदलने वाली...बड़ी-बड़ी बोलती आंखें....रेशमी जुल्फें...लंबा कद..गोरा रंग...चेहरे पर खिली रहने वाली रहस्यमय मुस्कुराहट....। परवीन और जीनत वो अभिनेत्रियां थी जिन्होंने हिंदी फिल्मो में ग्लैमर को मुकाम दिलाया। वरना इससे पहले ग्लैमर ज्यादातर वैंप यानि खलनायिका नुमा किसी अभिनेत्री के जिम्मे होता था। सत्तर का दशक हिंदी फिल्मी दुनिया में सौंन्दर्य के मानक बदलने का दौर था। यानि सौंन्दर्य के बदलते दौर में जब वेस्टर्न स्टाइल ने पर्दे पर हलचल मचानी शुरु की..उसी दौर में जूनागढ़ से चलकर हिंदी फिल्मों पर राज करने आईं थीं ग्लैमरस परवीन बॉबी.....।
     उस दौर पर नजर गड़ाता हूं तो मैं दंग रह जाता हूं...आखिर वो कितने परिवर्तन का दौर था। आजादी के बाद का आशावाद दम तोड़ रहा था। राजनीति इंदिरा गांधी के साथ ही पूरी तरह से बदल चुकी थी। समाज करवट ले रहा था। पश्चिम का असर समाज के नए तबके पर पड़ चुका था। भले ही बंगाल में समाजवादी सत्ता में आ रहे थे। पर बाकी सारा देश समाजवाद के आदर्श को दम तोड़ते देख रहा था। बुजुर्ग जयप्रकाश नारायण भष्ट्राचार के खिलाफ जंग फूंक रहे थे।
     इसी समय में फिल्में भी बदल रही थी। यही वो दौर था जब फिल्मी पर्दे पर एंग्री यंग मैन के तौर पर महानायक अमिताभ बच्चन का अवतार हो रहा था...समाज को पर्दे पर नया नायक दिख रहा था…जो विध्वंस से नए निर्माण की इबारत लिखने की बात कर रहा था। इसी दौर में नायिकाएं भी बदल रहीं थीं। नायिकाएं अब स्टार होने लगी थीं...और रोने-धोने और आंसू बहाने वाली नायिकाओं की छवि को तोड़कर बोल्ड एंड ब्यूटीफूल हो रहीं थी।
     दरअसल परवीन जब अहमदाबाद यूनिवर्सिटी की स्टूंडेंट थी तभी उनपर प्रसिद्ध निमार्ता-निर्देशक बी. आर. इशारा की नजर पड़ी...मिनी स्कर्ट पहने और हाथ में सिगरेट ली हुईं परवीन बॉबी...इशारा को परवीन इतनी पंसद आईं कि उन्होंने अपनी फिल्म “चरित्र” में क्रिकेटर सलीम दुर्रानी के साथ उन्हें साइन कर लिया...। भले ही फिल्म और दुर्रानी फ्लॉप रहे..पर परवीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चरित्र के बाद आई परवीन बॉबी की दूसरी फिल्म धुंए की लकीर भी फ्लॉप रही...पर फिल्म के गाने "तेरी झील सी गहरी आँखों में" ने रंग जमा दिया..।
     इसे भी इत्तफाक कहें कि केरियर के शुरु में ही 1974 में परवीन बॉबी की अमिताभ के साथ आई फिल्म मजबूर..जिसने ग्लैमरस परवीन बॉबी को हिट हीरोइन का तमगा भी दिला दिया। अब इसे किस्मत ही कहना होगा कि अपने शुरुआत में ही परवीन बॉबी इस यंग एंग्री मैन को उसी के स्टाइल में टक्कर दे रही थी..बैलोस, बैख़ौफ..बेबाक। यानि ट्रैंड बदल रहा था।
    1975 में आई यश चोपड़ा की दीवार...जिसमें अमिताभ के रुतबे को वन टू टैन तक स्थापित कर दिया। परवीन बाबी दूसरी बार सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ नजर आईं इस फिल्म में...और उन्होंने एक झटके में हिंदी फिल्मों की हीरोईन का गेटअप बदल दिया। एक हाथ में जलती सिगरेट...दूसरे हाथ में छलकता जाम...बिना शादी के पार्टनर के साथ फिजिकल रिलेशन बनाती...एक बिन ब्याही मां...। ये बोल्ड रोल करके परवीन बॉबी ने दर्शकों को बोल्ड कर दिया। फिल्म के साथ ही हसीन चेहरे, लंबी छरहरी काया, रेशमी जुल्फों और बड़ी आंखों वाली परवीन बॉबी की रहस्मयी मुस्कुराहट में फिल्म इंडस्ट्री ऐसी मदहोश हुई की पूछो मत।  हिंदी फिल्मों की बदलती इस तस्वीर को इंटरनेशनल मैगजीन टाइम ने भी माना। 1976 में टाइम ने परवीन बॉबी को हिंदी फिल्मों के बदलते चेहरे के तौर पर अपने कवर पेज पर जगह दी.....
       अमर-अकबर-एंथनी...ने अमिताभ और परवीन की जोड़ी को हाटेस्ट जोड़ी बना दिया। फिल्म नमकहाल में हालांकि अमिताभ के अपोजिट परवीन नहीं थी...पर जब फिल्म में परवीन बॉबी ने "रात बाकी,,बात बाकी."...गाते हुए कैबरे किया...तो दर्शकों की सांसे अटक गई थीं..इसी फिल्म के दुसरे गीत "जवानी जानेमन हसीं दिलरुबा" ने भी कम नींदे नहीं उड़ाई थीं...दोनों गीतों का जलवा आज तीस साल बाद भी कायम है..।
     पर कहते हैं न कि ग्लैमर के पीछे की दुनिया की सच्चाई बेहद दर्दनाक होती है। यही परवीन बॉबी के साथ हुआ। काफी पहले ही अपनी सफलता के चरम में ही वो मनोरग का शिकार हो गईं थी..ये भी एक बड़ा कारण था परवीन बॉबी के दुखदाई जीवन का। जितना पर्दे पर वो बिंदास थीं...निजी जीवन में उतनी ही अकेली। यही अकेलापन शायद उन्हें ले डूबा। डैनी, महेश भट्ट, कबीर बेदी जैसे दिग्गजो के साथ लिव-इन में रही परवीन जिंदगी में कभी जीवनसाथी नहीं पा सकीं। ज्यादा लाइम लाइट या सक्सेस परवीन बॉबी की दुश्मन बन गई।
      वैसे भी अपनी शर्तों पर जीते इंसान को...खासतौर पर एक लड़की को समाज इतनी आसानी से पचा भी नहीं पाता। समाज कितना भी आगे बढ़ गया हो...पर हालात जस के तस हैं। भारतीय समाज आज भी पाशाचात्य और भारतीयता के बीच संमन्वय बनाने के लिए जूझ रहा है। ऐसे में अक्सर अपनी शर्तों पर जीते लोग...चाहे वो परवीन बॉबी जैसी सक्सेसपुल स्टार भी क्यों न हों...उसे अधिकतर जीना भी अकेले पड़ता है..जूझना भी अकेले पड़ता है...और मरना भी अकेले ही पड़ता है। 

Tuesday, March 27, 2012

ममता दी-ऐसे सत्ता नहीं चला करती


    ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि रेल मंत्री के बजट पेश करके संसद से निकलते-निकलते उसे पद से हटाने की तैयारी हो गई हो। पर ममता बनर्जी सरीखी नेता हों तो ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं। पिछले 36 साल से ज्यादा की राजनीति में ममता बनर्जी इस तरह के कई काम कर चुकी हैं। पर ममता जी क्या सरकार ऐसे चला करती है। रेल को घाटे से उबारने के लिए जो तत्काल हो सकता था वही तो किया था दिनेश त्रिवेदी जी ने। फर्स्ट क्लास का किराया ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता था। रेल की आमदनी का करीब 70 फीसदी हिस्सा पैंसेंजर और द्वितीय श्रेणी के भाड़े से ही आता है। इसलिए उसका किराया बढ़ाया गया। पर आपके दवाब में ये वापस ले लिया गया है। इस चक्कर में हालत ये हो गई है कि फर्स्ट क्लास का किराया हवाई जहाज के समकक्ष औऱ कहीं ज्यादा हो गया है। इससे तो बेहतर है कि फर्स्ट क्लास श्रेणी को खत्म ही कर दिया जाए। रेल को संकट से उबारने के औऱ भी उपाय हैं। पर उनपर अमल करने से पहले रेलवे की माली हालत फौरन सुधारनी जरुरी है।
   आखिर सांसद जब लोकसभा में बैठते हैं तो किसी विशेष जगह के प्रतिनिधी नहीं होते। लोकसभा में पूरे देश की जिम्मेदारी उनपर होती है। वहां वे पूरे देश को प्रभावित करने वाली नीतियों पर विचार करते हैं। जबकि ममता जी आप खुद सांसद रह चुकी हैं। ऐसे में जब गठबंधन सरकार में शामिल हुई हैं. तो उन्हें अपने सासंदों को राष्ट्रीय नीति के हिसाब से कुछ खुलकर काम करने देना चाहिए। तभी गठबंधन की सरकारें जनता में विशवास कायम रख पाएंगी। ये ठीक है कि आपके दवाब में ही यूपीए सरकार को रिटेल क्षेत्र में कदम पीछे खींचने पड़े। जिसके लिए मजदूर संगठन उनकी तारीफ करते नहीं थकते।
Courtsey-aitmc.org
    माना कि ये आपकी राजनीति करने की पुरानी शैली है। ये भी माना की त्रिवेदी साहब कांग्रेस की कठपुतली बने हुए थे, तो भी जिस तरह से ममता ने अधीरता दिखाई है वो एक परिपक्व राजनेत्री की निशानी नहीं हैं। आपको समझना होगा कि अब आप सेनापति न होकर शासक की भूमिका में हैं..औऱ ये आजमाया हुआ सत्य है कि जंग के सारे नियम राजकाज में जस के तस लागू नहीं होते। दरअसल इसमें आपको समय लगेगा..ये सत्य है..दरअसल जिस नेता महज बीस साल की उम्र से ही विरोध की राजनीति करनी शुरु कर दी हो उससे 36 साल बाद लगभग 57 साल कि उम्र में सहसा बदल जाने की अपेक्षा करना गलत होगा। पर ये सत्य जल्द से जल्द ममता बनर्जी को समझ जाना चाहिए कि एक शासक के तौर पर वही राजनेता कामयाब होता है जो अधिरता नहीं दिखाता। क्योंकि सत्ता तुनकमिजाजी से नहीं चला करती।  
   दिनेश त्रिवेदी को किनारे करके ममता जी आपकी तुनकमिजाज राजनेता वाली छवि ही सामने आई है। इस राजनीतिक द्वंद में लोकसभा और संविधान के प्रति निष्ठा की बात करके त्रिवेदी साहब ने आपसे राजनीतिक बढ़त बना ली है। भले ही इसका आप या आपकी पार्टी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। पर इससे ममता बनर्जी की इमेज पर फर्क तो पड़ा है। जबकि इतने राजनीतिक अनुभव के बाद लोग अब आपसे एक परिपक्व नेता की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा करते हैं। 
  आपके निरंतर संघर्ष से बंगाल में 35 साल से काबिज कामरेडों का किला ध्वस्त हुआ है। जनता से आपको इसलिए प्रचंड बहुमत भी मिला है। ऐसे में राज्य में पार्टी और सरकार को पांच साल तक जैसे मर्जी चलाएं..पर राष्ट्रीय राजनीति में हर बार विरोधी तेवर चढ़ाकर रखने की जरुरत नहीं है।जरा उंचा सोचिए ममता जी..आपकी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बनाने की ताकत सिर्फ आपके पास है। जब देश में कांग्रेस औऱ बीजेपी के ग्राफ में गिरावट जारी हो, तो ऐसे में तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट के बीच प्रधानमंत्री पद आपके पास आ गया तो क्या देश भी इसी अंदाज में चलाएंगी? 
     दरअसल देश की दोनों वर्तमान और एक पूर्व महिला मुख्यमंत्री (शीला दीक्षित, मायावती औऱ जयललिता) से इतर आपकी राजनीतिक पूंजी आपकी खुद की बनाई हुई है, जिसे आपने अथक और अनवरत संघर्ष के बाद पाई है। आज बहुत ही कम नेता बचे हैं जिनकी ईमानदारी पर जनता विश्ववास करने लगी है और आप उनमें से एक हैं। ऐसे में अब सत्ता प्राप्त करने के बाद राजकाज के लिए जरुरी धैर्य औऱ राजनीति कौशल वाले राजनेता की छवि आपको बनानी ही होगी। वरना समय की धारा को बदलने का इतिहास बनाने से आप चूक सकती हैं। लेकिन क्या आप बदल पाएंगी?...ये एक बड़ा सवाल है।