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Wednesday, March 14, 2012

द्रविड़ के बहाने..अब भी हैं जवां

भारतीय क्रिकेट के फेव फाइव में से तीसरे खिलाड़ी राहुल द्रविड़ ने पैड हमेशा के लिए खोल दिए हैं।....यानि भारतीय क्रिकेट टीम का सबसे संयमित खिलाड़ी..मैदान के अंदर भी मैदान के बाहर भी..संन्यास ले चुका है। नब्बे के दशक में भारत की खेल की दुनिया में एक से एक खिलाड़ी चमके..जो धुमकेतु नहीं थे...बल्कि धुव्र तारे की तरह स्थायी से हो गए...पर उनका तेज सूरज से कम नहीं। क्रिकेट में तेंदूलकर, द्रविड, गांगुली, कुंबले, लक्ष्मण, शतंरज में विश्वनाथ आनंद, टेनिस में लिएंडर पेस..फुटबॉल में बाइचुंग बुटिया..। आप चाहें तो कुछ और नाम भी जोड़ सकते हैं..पर इन सितारों की ख्याति और सफलता अपने खेल के अंतिम समय में भी पूरी चमक के साथ है। भले ही राहुल द्रविड़ का ऑस्ट्रेलिया दौरा खराब रहा..पर इंग्लैंड में सिर्फ द्रविड़ ही चले। एक ऑस्ट्रेलियाई दौरा राहुल के चमकदार सफर पर कोई भी धब्बा नहीं लगाता। कहने वाले कहते हैं कि राहुल सचिन से बड़े खिलाड़ी हैं। वो आखिरी तकनीकि खिलाड़ी थे जो बुक रुल के हिसाब से खेलते रहे..वगैरह वगैरह..पर अब सब सिर्फ बातें हैं.। असल में ये सभी खिला़ड़ी इस तरह की तुलना से परे जाकर अपना खेल दिखाते रहे हैं...तभी ये सब मैदान और मैदान के बाहर आज भी रोल म़ॉडल हैं। 
मैदान के उम्रदराज..पर तेज बरकरार
       अगले एक-दो साल में बाकी बचे ये खिलाड़ी भी मैदान के बाहर होंगे। पेस भी लंदन ओलंपिक के बाद किसी भी समय अपना रैकेट टांग सकते हैं....। सचिन भी अगले एक-दो साल में बल्ला रख देंगे। कुबंले और  गांगुली क्रिकेट को अलविदा कह चुके हैं.....बाइचुंग भुटिया भी फुटबॉल के मैदान से निकल चुके हैं। सिर्फ विश्वनाथ आनंद ही शतंरज के खानों पर अपनी बादशाहत के साथ शह और मात के खेल में जमे रहेंगे।
        राहुल द्रविड़ का संन्यास एक परिवर्तन का हिस्सा है....यानि सत्तर के दशक में जन्मी खिलाड़ियों की ये पी़ढ़ी एक-एक करके मैदान से विदाई की तैयारी में है...खेल के मैदान में ये पीढ़ी बुढ़ौती जा रही है....पर साथ ही सत्तर के दशक में जन्मी ये पीढ़ी के बाकी जगह युवा के तौर पर बागडोर संभाल रही हैं....सत्तर की ये पीढ़ी पचास और उससे पहले की पीढ़ी से विरासत संभालने को पूरी तरह तैयार है...। देश की राजनीति हो...आर्थिक मोर्चा हो...या हो खेल का मैदान..हर जगह अब ये युवा खड़े हो रहे हैं...। पर एक बात माननी पड़ेगी कि पुरानी पीढ़ी अभी चूकी नहीं है...।
राजनीति में नई बयार
यूपी के राजनीतिक मैदान में मुलायम सिंह यादव लोकतंत्र के सहारे जबरदस्त चुनावी जीत दर्ज करके अपनी विरासत अपने बेटे अखिलेश यादव को सौंप चुके हैं....। उधर लोकतंत्र के महासमर में कांग्रेस की जो हालत हुई है, उसे देखकर लगता है कि अब राहुल गांधी पार्टी की बागडोर खुलकर अपने हाथ में ले लेंगे..और पुरानी राजनीतिक पीढ़ी के छाये से अपने को मुक्त करने की कोशिश करेंगे।  यानि राजनीति के मैदान में घात-प्रतिघात...साम-दाम-दंड-भेद के वार नई उर्जा के साथ होंगे..। कॉरपोरेट जगत भी बदलाव से गुजर रहा है..देश के प्रतिष्ठित टाटा उद्योग के सर्वेसर्वा रतन टाटा इस साल के आखिर में रिटायरमेंट ले लेंगे..। यहां एक बदलाव होगा...इस बार टाटा की बागडोर टाटा परिवार से बाहर के युवा के हाथ में होगी...। पर परिवार से बाहर हो या परिवार की अगली पीढ़ी...नए चेहरे..ताजी ताकतवर उर्जा के साथ अब अलग-अलग क्षेत्र में बागडोर संभालने वाले हाथ आने का समय हो गया है।
         यानि राहुल द्रविड़ का संन्यास एक तरह से उसी परिवर्तन का हिस्सा है जो नई पीढ़ी के लिए जगह बनाता है....अगर इसमें कोई देरी होती है..तो कई बार नियती खुद ये काम करती है...पर ये भी सच है कि क्रिकेट में कोई विरासत नहीं संभाली जाती.....बल्कि जगह भरी जाती है....राहुल के बाद विराट कोहली द्रविड़ की जगह लेने की कूवत दिखा चुके हैं....पर दोनों का अंदाज जुदा है...होता भी यही है...हर कोई परछाई नहीं होता हर बार...कहीं खानदान की विरासत होती है.....कहीं अपने से सीनियर की विरासत का जिम्मा कंधों पर आता है.....। अमिताभ की विरासत अभिषेक नहीं संभाल पाएंगे....हरिवंश राय बच्चन की विरासत अमिताभ ने नहीं संभाली...। तो ये होता रहता है..।
हैं तैयार हम..
        लब्बोलुबा ये कि राहुल द्रविड़ के साथ सत्तर के दशक की हमारी पीढ़ी का एक हिस्सा एक पिच से रिटायर हो रहा है...तो दूसरा हिस्सा दूसरी पिचों पर जबरदस्त जलवा दिखाने को तैय़ार है...। नफासत-शराफत की कहानी एक जगह से  खत्म हुई हो ...तो दूसरी जगह तैयार है....यानि जरुरी ये नहीं कि विराट कोहली राहुल द्रविड़ की तरह क्लासिकल प्लेयर बन पाते हैं या नहीं..बस देखना ये होगा कि विराट द्रविड़ की तरह इतिहास रच पाते हैं या नहीं...इसका जवाब भी हर बार की तरह आने वाला वक्त ही देगा...तब तक इंतजार तो करना ही होगा...। कहने का मतलब ये कि एक पिच पर भले ही हम नवयुवा न रहें हों... पर दूसरी पिचों पर अभी हम जवां हैं.....। तो अब नए सफर पर आपका स्वागत है...आप किस तरह कहां-कहां नई शुरुआत करते हैं..ये अब आप पर है...और इसके लिए....हैं तैयार हम...!!!!

  कोई शक ? अगर किसी को शक हो तो हो...हमें क्या ?.....भई हम तो तैय़ार हैं धमाल के लिए......नई शुरुआत के लिए...। जय हिंद

Monday, March 05, 2012

....क्या होगा रामा रे ??

होली दरवाजे पर है....खासकर शहरों में...कान्हा की नगरी में तो होली पहले ही शुरु हो गई है....लोकतंत्र भी अपने रंग बिखेर रहा है। चुनाव आयोग ने सफलता पूर्वक चुनाव कर औऱ लोगो ने भारी तादाद में वोट डाल कर लोकतंत्र के रंग को और गहरा कर दिया है।
     नेताओं के चेहरे पर भी रंग ही रंग है...पर कोई एक रंग नहीं है...चेहरे पर एक रंग आता है दूसरा चला जाता है। किसके चेहरे पर क्या रंग होगा ये तो कल पता चलेगा...दरअसल देश के सबसे बड़े सूबे में लोगो ने भारी तादाद में वोटिंग करके नेताओं के चेहरे का रंग अजीबोगरीब कर दिया है.....कुछ ऐसा ही जैसे बच्चों के चेहरे पर होली में रंगों का कोलॉज बन जाता है। अब आमजन बिना टेंशन के होली मनाने की तैयारी में हैं....। अब वीवीआईपीज़ की होली के रंग फीके होंगे या नहीं....ये कल ईवीएम खुलने के बाद दोपहर होते-होते पता चल ही जाएगा....।
     वैसे इस बार यूपी चुनाव इतने ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए थे कि  गोवा औऱ मणिपुर के चुनाव तो पूरी तरह से हाशिये पर चले गए...औऱ पंजाब चुनाव तक को मुख्य मीडिया में कम जगह बना पाए। दरअसल इसकी वजह ये रही कि यूपी में देश की सबसे बड़ी दोनो पार्टियां यूपी में ज़ड़ों को दुबारा जमाने की कवायद में है। इस बार सभी पार्टियों के दिग्गजों ने पूरा जोर यूपी में लगा दिया था। वैसे भी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने तो अपना पूरा ध्यान ही मिशन यूपी पर लगा दिया था। ऐसे में बीजेपी कैसे पीछे रहती...। गडकरी की अगुवाई में पूरी भाजपा लग गई अपनी खोई जमीन पाने में। सभी जानते हैं कि बिना यूपी फतह किए दिल्ली पर ठसक के साथ राज नहीं किया जा सकता। वैसे भी राष्ट्रीय पार्टियों का कमजोर होना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है...। वहीं स्थानीय क्षत्रपों का बड़ा कद लोकतंत्र की ताकत दिखाता है।     
इस बार राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी समेत स्थानीय दिग्गज समाजवादी पार्टी भी नए चेहरों के साथ चुनाव में उतरी हैं। जिससे ये तो साफ हो चला है कि अब पुराने नेताओं के जाने की बारी है। राहुल गांधी, अखिलेश यादव और नीतिन गडकरी ने पार्टी के चेहरों को बदल दिया है। खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस युवा नेताओं को आगे कर कर चुनाव लड़ रहा है। राहुल गांधी कांग्रेस के खैवनहार हैं तो अखिलेश को आगे करके मुलायम सिंह यादव ने भी परिवर्तन के संकेत स्पष्ट तौर पर दे दिए हैं। इससे इतना तय हो गया है कि इस विधानसभा में सत्ता किसी भी पार्टी की हो... 2014 के लोकसभा चुनाव तक मुख्य पार्टियों के चेहरे बदल जाएंगे।

     बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने इस बार चुनाव में पूरा जोर लगा दिया है। स्थानीय कद्दावर नेताओं का जलवा इस बार इतना नहीं दिखा जितना पहले दिखता था। यानि ये मान लेना गलत नहीं होगा की बीजेपी भी अब युवा चेहरों पर दाव लगाने को तैयार है। वहीं बीएसपी सुप्रीमो मायावती को दो दशक बाद भी थका हुआ या चुका हुआ मानना सबसे बड़ी भूल होगी।
सौजन्य...eci.nic.in
      परीक्षा इस बार वोटरों की भी कम नहीं थी....पर जनता तो 60 से 80 प्रतिशत तक वोट डाल कर एक परीक्षा लगभग पास कर चुकी है..और दूसरी परीक्षा का रिजल्ट ईवीएम खुलने के बाद पता चलेगा। चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि स्थानीय मुद्दों और राष्ट्रीय हित के मद्देनजर वोट लोगो ने डाला है या नही...क्योंकि इसबार भी यूपी के चुनाव में हर पार्टी ने अल्पसंख्यक वोटों को भुनाने के लिए आरक्षण कार्ड जमकर खेला। आरक्षण के आगे सब मुद्दों फीके पड़ते नजर आए।

   अब इंतजार इस बात का है घर से निकले जागरुक और युवा वोटरों ने क्य़ा हाशिये पर पड़े असली मुद्दों के अधार पर वोट डाला है या फिर पुरानी ढर्रे की राजनीति की ही जीत होगी ?

Thursday, February 16, 2012

ये इश्क और मेरा आवारापन

इस वैलेंटाइन पर काफी अवारागर्दी की...क्या देखा..क्या पाया..ये तो बता नहीं सकता..पर प्यार के आवरण में ढका मैं अवारगी करता रहा...औऱ जो रंग दिखा...उसे कुछ कुछ आपके संग बांटने चला आया........................


http://tomodacy.com/views/love-pictures-for-valentines-day.html
’सर हम दिया तो रोज ही जला सकते हैं...फिर दिवाली पर ही खास क्यों...जैसे दिवाली खास दिन होता है न...बस सर ऐसे ही आज प्यार का खास दिन है....”.कुछ ऐसा ही था संवाद यानि डॉयलॉग ..सोनी टीवी के सीरियल ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ में....कितना आसान कितना सिंपल.....अक्सर ऐसे ही जवाब मिल जाते हैं कई बेसिर पैर सवालों के...। प्यार कितना पवित्र औऱ आसान होता है....जो आसानी से खुद की व्याख्या कर देता है....पर हम समझ कर भी समझने को तैयार नहीं होते....वैसे इस डॉयलॉग को सुनकर लगा जैसे मेरी उस सारी कवायद का उपसंहार हुआ जो अनायास शुरु हो गया था...
      वेलेंटाइन से एक दिन पहले अखबार में एक खबर पढ़ी...एक समारोह में ४० ऐसे जोड़े बुलाये जा रहे थे...जिन्होंने अपने जीवनसाथी को अंगदान किया हो। मगर एक अजीब सा संयोग था इन सभी जोड़ों में...इन सभी जोड़ों में पत्नी ने ही लीवर या किडनी देकर अपने पति का जीवन बचाया था...। खबर के मुताबिक कार्यक्रम से जुड़े डायरेक्टर डॉक्टर सिंह का कहना था कि पत्नियां हमेशा पहल करती हैं अपने पती को बचाने के लिए।.....जाने क्यों ये खबर औऱ डॉक्टर के कहे शब्दों को दिल ने कबूल नहीं किया। लगा जैसे वेंलेटाइन डे पर अनजाने में पती का प्यार नज़रअंदाज हो गया हो....। लगा की इस खबर में प्यार को लिंगभेद में बांट दिया गया है.....ख़ैर  मैने सोचा जरा वैलेंटाइन डे पर देंखूं कि कौन करता है प्यार सबसे ज्यादा...।
        पहली बार संयोग से प्यार के दिन छुट्टी थी। सो दिन में बारह बजे तक बिस्तर तोड़ता रहा... लेकिन दुपहरिया की गुनगुनी धूप में निकल पड़ा बाजार कि तरफ कुछ किताबें खरीदने के लिए...या शायद जवाब तलाशने.....। बाहर हर तरह का जोड़ा था..हर समय का जोड़ा था....आज का जोड़ा...होने वाले कल का जोड़ा...बीते कल का जोड़ा..। जोड़ों के बीच मस्ती से टलहता हुआ....मैं कभी किसी रेस्तरां में बैठा..तो कहीं बाहर पार्क में...। हर तरफ प्यार फैला था...जिनको ठीक से पता नहीं था वो भी आज सेलिब्रेट कर रहे थे..। इसी तरह टलहते हुए एक जोड़े से टकराया....ऐसा जोड़ा जो उम्र के बंधन को तोड़कर साथ हुआ। दस साल पहले 20 साल की लड़की और 33 साल का पुरुष...हमराही बने...आज भी 13 साल का फासला नजर नहीं आता। मेरी अवारगी रवानगी पर थी..सो मैं आगे चल पड़ा....शाम गहराने लगी था...और प्यार के जोड़े हर जगह छाने लगे थे।
     प्यार की इस बयार के बीच पहली बार ऐसा हुआ जब पूरे समाचार जगत से दूर रहा। कहां प्यार पर पहरा पड़ा..कहां प्यार पर हमला हुआ..इससे कोई मतलब नहीं रखा। खजुराहो और मदोनोत्सव के देश में पोगापंडितों और कट्टरवादियों का जोर..कैसा विरोधाभाष। ये संयोग था या नियति... जो मैं दूर की खबरों से दूर रहकर अपने आसपास की बयार के बीच टहल रहा था।
         मैं टहलता रहा..चलता रहा...इस बाजार से उस बाजार..एक रेस्तरां से दूसरे रेस्तरां...। कहीं कोई टकराया..कहीं कोई...इसी अवारगी में  मैं मुस्कुराती नाज़िया और उसके पति हेमंत से टकरा गया....ये जोड़ा आज से चार साल पहले धर्म के बंधन को तोड़कर एक हुआ था..औऱ जल्दी ही दोनो के परिवार ने इस रिश्ते को मंजूरी दे दी। मैं सोच रहा था कि इस जोड़े में पति-पत्नी दोनो ही मध्यमवर्गीय...छोटे शहर से निकले हुए। फिर कैसे इनके परिवारों के दिल इतने बड़े निकले। मुस्लिम लड़की के माता पिता को हिंदू दामाद अपनाने में कोई समस्या नहीं। आगे स्कूल और कॉलेज के प्यार को देखते हुए बढ़ता रहा...तभी दिखा प्यार का एक नया रंग.....पारिवारिक प्यार....एक रेस्तरां में बैठा हुआ था...तभी साथ के टेबल से अचानक थोड़ी तेज लेकिन हैरत भरी आवाज आई ‘’’सर आप’’’’...देखा तो चमकीली आंखों वाली दीप्ती थी.....पूरे परिवार के साथ....पती, बच्चे, सास-ससुर..सभी...पता चला सब मिलकर वेलेंटाइन डे सेलिब्रेट करने आए हैं....बैठे-बैठे ही ये प्यार मुझे भी बांटने लगे...मुझे अकेला समझ कर अपने साथ खाने की दावत में शामिल होने का न्यौता दे बैठे...पर अपन तो अवारगी में रमे थे...। 
        दिन बीता..रात गई..सुबह हुई...फिर समायार पत्र हाथ में.....एक नई खबर से रुबरु हुआ। एक दिन पहले अंगदान करने वाले जोड़ों की खबर को छुटा हुआ हिस्सा नजर आ रहा था अखबार के पेज पर...दो दिन पहले पढ़ी खबर की कसक दूर होने वाली थी...खबर थी अंगदान करने वाले तीस के लगभग परिवार एक समारोह में जुटने की...। इसमें 16 जोड़ो में पति था जिसने अपनी पत्नी को अंगदान करके प्यार की परिभाषा साकार की।  सच में प्यार करने वाला कोई भी हो सकता है...आदमी-औरत...कोई भी..बस प्यार करना आना चाहिए। चाहे.कितनी भी आधुनिकता आ जाए..सुपर फास्ट प्यार हो जाए....पर बिना किसी आशा के, बिना किसी शर्त के ही प्यार होता है..औऱ यही प्यार होता है जो हर सवाल को बौना कर देता है..हर दीवार को गिरा देता है...।

जैसा कि गालिब.....बुलाते हैं..प्यार वालों को निमंत्रण देते हैं...

ये इश्क नहीं आसां
एक आग का दरिया है
और डूब के जाना है...

औऱ अगर ये प्यार न होता....तो न तो हमारे हाथ में मोबाइल होता...न ही एनी टाइम मनी यानि एटीएम मशीन होती....। कई लोग जानते होंगे इस बात को...। अगर नहीं..तो कोई बात नहीं अगली पोस्ट में दोनो की कहानी ... पढ़ना न भूलना..। यानि प्यार की पोस्ट का सिलसिला जारी है।

Saturday, February 11, 2012

फिर पड़ोस में आग..सावधान


कभी-कभी पड़ोसी देशों की उथल-पुथल मुझे परेशान कर देती है। दरअसल इन पड़ोसी देशों की वजह से हमारे देश में काफी मुसीबतें हैं। आजकल हिंद महासागर में बसे हमारे छोटे पड़ोसी देश मालदीव की हालात खस्ता है। ये भारतीय उपमहाद्वीप कि विंडबना है कि हमारे सभी पड़ोसी देशों में लोकतंत्र से ज्यादा बंदूक की ताकत है। धार्मिक कट्टरता भारत के चारों तरफ खतरनाक तरीके से हावी है...जिसका सीधा असर भारत में भी हो रहा है। हमारी यहां सारी आतंकवादी घटनाएं लगभग इसी का परिणाम हैं। देखा जाए तो श्रीलंका को छोड़कर सभी पड़ोसी देशों में लोकतंत्र की हालत खस्ता है। बांग्लादेश में पिछले महीने ही तख्ता पलट की बड़ी साजिश का पर्दाफाश हूआ था। बेशर्मी तो ये है कि इसमें सेना के कुछ अफसर थे। जो इस्लामी कट्टरवाद के समर्थक हैं।  बांग्लादेश में विपक्षी पार्टी ही लोकतंत्र को कमजोर करने का काम कर रही है। उधर नेपाल अब तक चीन की माओवादियों विचारधारा के चंगुल में फंसा हुआ है। जो न तो उससे निगलते बन रहा है न उगलते। हालांकि बर्मा में लोकतंत्र बंदूक के साये में चलने की कोशिश कर रहा है। पर लोकतंत्र की जड़ को वहां मजबूत होने में समय लगेगा। रह गया पाकिस्तान..तो उसके बारे में कुछ भी कहना बेकार है।
    हमारी सबसे बड़ी मुसीबत ये है कि पड़ोसी देशों से हमारे यहां मुख्यत आतंकवादियों....हत्यारों की टोली और धार्मिक कट्टरवाद की आमद ही अधिक होती है। जिसकी  वजह से हमारे देश के कुछ युवा भी दिग्भर्मित हो जाते हैं और देश से गद्दारी करने से बाज नहीं आते। चिंता की बात तो ये है कि इनमें पढ़े लिखे लोग भी शामिल पाए गए हैं। हालांकि मालदीव से इस तरह के किसी खतरे की गुंजाइश हमारे लिए काफी कम है।
     हिंद महासागर में बसे करीब तीन लाख से अधिक आबादी वाले मालदीव में बहुसंख्यक आबादी सुन्नी मुस्लामों की है। पर इनमें कट्टरपन इस तरह हावी नहीं रहा है। यही इस देश की अबतक की खासियत रही है। पर अब हालात में कुछ बदलाव देखने को मिल रहे हैं..जो अच्छे संकेत नहीं है। खबरों के मुताबिक अरब देशों के पैसे की सहायता से मालदीव में लोकतंत्र पर हमला हो रहा है। चंद दिन पहले ही मालदीव के राष्ट्रपति नाशीद को पुलिस विद्रोह के कारण उपराष्ट्रपती को सत्ता सौंपनी पड़ी है...पर दो दिन पहले ही अपदस्थ राष्ट्रपति नशीद ने ये कहकर दुनिया को चौंका दिया कि उनसे बंदूक की नोक पर इस्तीफा लिया गया है। ये नशीद थे जिन्होंने अब्दूल गयूम की तीस साल पुरानी सरकार को चुनाव में हराया था....औऱ अब यही गयूम नशीद के खिलाफ सक्रिय हैं। खबरों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति गयूम को मालदीव के कट्टरपंथियों का समर्थन है।

        वैसे अपदस्थ राष्ट्रपति नाशीद एक जाने-माने पर्यावरणविद् हैं। उन्होंने बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण मालदीव पर आने वाले संकट पर दुनिया का ध्यान खींचा था। इसके लिए उन्होंने अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ समुद्र के अंदर कैबिनेट बैठक की थी।    बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के कारण मालदीव पर अगले कुछ दशकों में डूबने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में भी इस छोटे से देश में कट्टरपंथी ताकतें और विपक्षी दल अस्थिरता फैलाने से बाज नहीं आ रहे।
    ये वही गयूम हैं जिनको अस्सी के दशक में कट्टरपंथियों ने तख्ता पलट कर लगभग सत्ता से बेदखल कर दिया था। लेकिन उस कोशिश को हमारी फौजों ने नाकाम कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गयूम की गुहार पर सैनिक हस्तक्षेप करते हुए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय ताकत के भारतीय उपमहाद्वीप में दाखिल होने के मंसूबे धराशाही कर दिए थे। हालंकि इस बार हालात को हमारे हुक्मरान मालदीव का अंदरुनी मामला बता रहा है। दरअसल मालदीव के संविधान के तहत राष्ट्रपति के बीच में सत्ता छोड़ने के बाद उपराष्ट्रपति ही बाकी कार्यकाल पूरा करता है। शायद इस वजह से भी हमारी सरकार किसी तरह के सैनिक हस्तक्षेप से बच रही है। परंतु मालदीव के अंदरुनी हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि वहां जो कुछ भी हो रहा है वो लोकतंत्र के हित में नहीं है। इसलिए हमारे देश के लिए जरुरी हो जाता है कि जितना जल्दी हो सके लोकतंत्र की स्थापना के लिए मालदीव में वो सीधे दखल दें। पहले ही कट्टरपंथी ताकतों से घिरा हमारा देश एक और पड़ोसी को कट्टरपंथियों के कब्जे में जाने की इजाजत नहीं दे सकता। देता।
      सभी को याद होगा कि दिल्ली के एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हमारे देश के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायण ने जब सउदी पैसे की वजह से बढ़ते कट्टरपंथ की बात की थी तो सउदी अरब के मंत्री या राजदूत (ठीक से याद नहीं) काफी नाराज भी हो गए थे। जाहिर है ऐसे में हमें अपने देश के अंदर और बाहर दोनों तरफ कट्टरपंथियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। यानि जितने प्रभावी तरीके से हमारी सरकार इस संकट में दखल देगी, उतनी ही हम सभी की चिंताएं घटेंगी। वैसे भी नीति कहती है कि शांति के समय में भी दुश्मनों से सावधान रहना चाहिए।