उस समय दूरदर्शन पर फिल्में तो आती थीं...पर आर के बैनर की कोई फिल्म नहीं....तब सुना था कि राजकपूर का मानना था कि पिटे हुए डायरेक्टरों की फिल्में टीवी पर आती हैं...औऱ वास्तव में सिर्फ बॉबी को छोड़कर उनके जीवन में कोई फिल्म टीवी पर नहीं आई थी। बॉबी भी इमरजेंसी के दिनों में या उससे थोड़ा पहले टीवी पर आई थी..और चर्चाओं के मुताबिक किसी बंद को विफल करने के अनेक उपायों मे से एक उपाय के तौर पर बॉबी दूरदर्शन पर आई थी....यानि कोई राजनीतिक दवाब।
नीली आंखों का जादूगर..ग्रैट शौमेन...भारतीय फिल्मों में एक से एक नायाब सितारे जुड़े..पर किसी सितारे में इतने रंग नहीं....जितने अकेले राजकपूर में...महज 24 की उम्र और एक स्टूडियो की स्थापना....इकादुका फिल्मों का हीरो....डायरेक्टर, प्रोड्यूसर बनने का जोखिम उठाने से झिझका नहीं.... फिल्मों को लेकर ऐसा जुनून....विरले ही किसी में देखने को मिलता है...इस आवारा को मैंने जाना दूरदर्शन पर आती फिल्मों से...पर उन फिल्मों से नहीं जिनका डायरेक्शन आर के बैनर के तले यानि अपने बैनर के तले राजकपूर ने किया हो... मेरे पिताजी ने जीवन में एक ही फिल्म देखी थी आवारा...वो भी मजबूरी में....दरअसल पटना के रिजेंट हॉल के मालिक के बेटे निर्माता-निर्देशक शिवेंद्र सिन्हा पिताजी के लंगोटिया यार थे...एक दिन शिबू चाचाजी के पिताजी के करना जाने दोनों दोस्तों को हॉल में जा कर बेठना पड़ा...और इस तरह पिताजी ने जीवन की पहली और आखरी फिल्म देखी....तब से राजकपूर के लिए पिताजी के पास सिर्फ एक नाम था....आवारा....और यही नाम सुनकर राजकपूर को पर्दे पर देखना शुरु किया अपन जैसे लोगो ने..
समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, संप्रदायिकता, तुष्टीकरण जैसे बड़े-बड़े शब्द बचपन से ही आंखों के सामने बहस-चर्चाओं में अपने अर्थ बताते....तो कभी उनका अनर्थ कैसे होता है.....ये सिखाते.....ये सब राजकपूर कि शुरुआती फिल्मों में था...शायद ये भी कारण रहा हो राजकपूर से लगाव का.... जाहिर है ब्लैक एंड व्हाइट दूरदर्शन पर नीली आंखें तो नहीं दिखती थीं....मगर पता नहीं कैसे फिल्मों का जादू तो बचपन से ही चल चूका था.....शायद किताबों से..या दूरदर्शन से.....सिनेमा हॉल तो जाना नसीब होता नहीं था....आखिर गांधीवादी पत्रकार पिता को, फिल्में वक्त की बर्बादी ही लगती थी....बचपन में किसी समय यानि 1979 में...जाने किस सिनेमा हॉल में, एक फिल्म देखी थी..जिसमें गीत था..चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा....शायद किसी रिश्तेदार के साथ। तब हम दिल्ली के केनिंग रोड पर रहते थे....शिबू चाचा तबतक फिल्मों से दूर हो गए थे....फिल्म “किस्सा कुर्सी का” फिल्म को जलाने से लगे सदमे की वजह से...रहते कहीं मंडी हाउस के पास ही थे....शायद वो भी एक कारण बने फिल्मों से लगाव के।
उस समय दूरदर्शन पर फिल्में तो आती थीं...पर आर के बैनर की कोई फिल्म नहीं....तब सुना था कि राजकपूर का मानना था कि पिटे हुए डायरेक्टरों की फिल्में टीवी पर आती हैं...औऱ वास्तव में सिर्फ बॉबी को छोड़कर उनके जीवन में कोई फिल्म टीवी पर नहीं आई थी। बॉबी भी इमरजेंसी के दिनों में या उससे थोड़ा पहले टीवी पर आई थी..और चर्चाओं के मुताबिक किसी बंद को विफल करने के अनेक उपायों मे से एक उपाय के तौर पर बॉबी दूरदर्शन पर आई थी....यानि कोई राजनीतिक दवाब। फिल्म आह...बरसात....आवारा....श्री 420....बूट पॉलिश... बताइए कौन सी ऐसी फिल्म है जिसमें नेहरुवादी समाजवाद नहीं है....कौन सी ऐसी फिल्म है जो तमाम दुश्वारियों के बाद सबकुछ ठीक होने की आशा नहीं जगाती...संविधान के पहले पन्ने की पहली लाइन...हम भारत के लोग...क्या नजर नहीं आती इन फिल्मों में। हम भारत के लोग..गरीबी..गुरबत में....समाज के खिलाफ बागी होते तेवरों के बाद भी..क्या वापसी नहीं करते?.....जापानी जूता...इंगलिस्तानी पेंट और रुसी टोपी के बाद भी खालिस हिंदुस्तानी दिल नहीं रखते। हो सकता है कई लोगों को यह अतिश्योक्ति लगे.....पर ये सच हमने अपने आसपास से सिखा...भले ही हालात बदतर होते जा रहे हों....पर प्रयास जारी रखने चाहिए..कौन जाने किस भेष में नारायण मिल जाए.....
उम्मीदों का दिया ज्यादातर भारतीय हमेशा ही पकड़े रहते हैं..भले ही कोई हमें भाग्यवादी कहकर हमारा मजाक उड़ाए...पर भले की उम्मीद हमें भले की तरफ कदम बढ़ाने कि सोच देती है...यही इस जोकर ने किया....परदे पर कमर्शियल होने के बाद भी...मंनोरंजन के ताने-बाने में भी समाज को नहीं भूला....
आज भी “प्यार हुआ इकरार हुआ” गीत जब बजता है अपना दिल तो बस धड़कने लगता है....आंखों में कोई न कोई...कुछ न कुछ तैरने लगता है। खैर जिंदगी का फलसफा तो मैं सीखता रहा कई लोगों से....ठीक गुरु दत्तात्रेय के चालीस गुरु की तरह...तो मेरे जैसे मामूली इंसान को कुछ समझाने वालों में....हंसाने वालों में....कुछ बताने वालों में...एक यही जोकर है...यही छलिया है...यही अनाड़ी है....यही ग्रैट शौमेन है।











