गुरुवार, अक्तूबर 25, 2018

वो रात चांदनी वाली....


आज शरद पूर्णिमा है, सुना है चांद बहुत बड़ा होता है, बहुत चमकीला भी आज के दिन, बड़ा दिल भी होता है उसका, हर किसी के ख्वाब और दिल की बातों को अपने में समेट के रखता है, साक्षी होता है हर मासूम मोहब्बत का, हर दिल टूटने पर उसका दिन भी छलनी होता है, फिर भी अपने काम में लगा रहता है, सबके प्रेम का गवाह बनने को तैयार हो जाता है... तभी तो तमाम गढढों के बाद भी वो चमकता है, हमारी खातिर, तुम सब की खातिर। सुन रही हो उस चांदनी की छन-छन, जो बरस रही है चारों ओर, मेरे आंगन में, तुम्हारे छज्जे पर, खिड़की से अंदर बेरोकटोक। इतनी धवल, इतनी उजास है आज। तुम्हारा वो रूप पता है, आज भी जस का तस है मेरे अंदर। क्रीम कलर की साड़ी पर, पड़ती चांदनी, ऊपर खिला चांद, कंक्रीट के उस दो जंगल के बीच खाली जगह पर, पिघली हुई चांदनी तुम पर पड़ रही थी। आधी रात से ज्यादा समय बीत चुका था, तुमने आते ही पूछा था, मेरा इंतजार कर रहे हो न, मैंने न कहा था, पर मेरे चेहरे पर हां थी, तुम खिलखिला कर हंसी थी, तुम्हारी हंसी में वो खनखनाहट थी, जो कई बार तुम कहती थी कि मेरे साथ रहने पर आ जाती है, वरना जाने कहां खो जाती है...
   
अब तो तुम ही जाने कहां खो गई हो? पता है, उस चांदनी रात में खिली तुम अब भी वहां हो, जिसे जब चाहता हूं अंदर झांक कर देख लेता हूं...पता है तुम्हें फिर कभी, कहीं टिका नहीं मैं, कहीं किसी के पास...बरसों बाद वो खनकदार हंसी फिर सुनाई दी किसी के पास, पर कदम अब ठिठके हुए हैं.... शायद .....रहने दो ..छोड़ो जाने दो...क्या कहूं...वादा तो था ही नहीं .....फिलहाल विचरने जा रहा हूं...इसी चांदनी में, बाहर पार्क में, डॉक्टर ने भी कहा है, विचरते रहो...मधुमेह है मुझे, कहते हैं उसमें टहलने से आराम मिलता है, नेह न सही, मधु का मेह ही सही, कुछ तो है न...पर एक बात कहूं... चांदनी रात में, विचरना अब नहीं हो पाता, क्या करूं? जब भी जाता हूं, चांद दूर ऊपर पेड़ पर लटका रहता है, उतरता ही नहीं, या कहूं उतरने को राजी नहीं होता, पेड़ पर ही टंगा रहता है, इसलिए पार्क में टहलता कम ही हूं, खासकर जब चांद की चांदनी नीचे उतरी होती है। आज तो शरद पूर्णिमा है, आगे शरद का आगमन है। अब धुंध भरी शामें होंगी, उस धुंध में धऱती तक का रास्ता खोज कर, कभी न कभी चांदनी पसर ही जाएगी, उस वक्त फिर विचरूंगा, फिर टहलूंगा।
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अभी लौटा हूं आवारगी कर के, और देखो वो चांद, अब भी वहां पेड़ों की डाली में ही उलझा हुआ है। उतरने को राजी नहीं, टहल कर लौट कर कई बार मन करता है, छत पर जाकर पसर जाउं, पर ऐसा नहीं हो सकता। अब न तो छत है, न तारों भरा आसमान, न वो खाट, जो मन से न सही, पर तन से दर्द तो खींच ही लेती थी।...खैर अब तो कहना है क्या, शिकवा क्या, शिकायत क्या करें, न तुम हो पास, न वो चांद उतरने को राजी...।

गुरुवार, अक्तूबर 11, 2018

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते


   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो, एक गोली देता था, या इंजेक्शन लगाता था और बीमारी छूमंतर हो जाती थी। कितनी भी गंभीर हालत हो, फैमली डॉक्टर एकदम आखिर में ही जाकर अस्पताल में भर्ती करने को कहता था। इन फिल्मों के डॉक्टर भले, मृदभाषी और नि:स्वार्थ भाव से काम करते थे। कई केस में तो डॉक्टर दवा लिखते वक्त कहता था, कि अगली बार बिना पैसे के वो दवा नहीं लिखेगा, फिर भी लिखता था। सबसे मस्त बात ये होती थी कि जिस बीमारी का इलाज भारत में संभव नहीं होता था, उस मर्ज का दुनिया का नंबर वन डॉक्टर एकदम मौके पर उसी शहर में होता था। वो भी तुरंत-फुरत सफल ऑपरेश्न कर देता था। मरीज जिस भी शहर में होता था, वहां सबकुछ उपलब्ध भी हो जाता था। या फिर कहें, कि ये डॉक्टर का चमत्कार होता था, कि वो जो उपलब्ध होता था, उससे चमत्कारिक ऑपरेशन कर डालता था।
    कितना आसान होता था फिल्मों में। इन्ही फिल्मों ने डॉक्टर को भगवान बनाया। डॉक्टर को कभी गलती न करने वाला इंसान बनाया। मानवता के लिए हर हाल में, हर जगह पहुंचने वाला फरिश्ता बनाया। फिल्मों में डॉक्टरों के दो-तीन चिरपरिचत डॉयलॉग भी होते थे। “मेरे हाथ में जो था, वो मैं कर चुका हूं, अब सबकुछ ऊपर वाले के हाथ में है”, या फिर “सॉरी, हम मरीज को बचा नहीं सके। ये डॉयलॉग हर फिल्म में होते थे। आज भी कई फिल्मों में होता है, हम फिर भी इन डॉयलॉग को लेकर बोर नहीं होते, शिकायत नहीं करते।
   जानते हैं क्योंक्योंकि मौत ही एक ऐसी चीज है, जिसपर कोई प्रश्न चिन्ह लगाना हमारे वश में नही है। डॉक्टर इस रंगीली दुनिया और मौत के बीच जिन्दगी की जंग लड़ने वाला यौद्धा का प्रतीक। जब ये यौद्धा सॉरी कह देता था, तो फिल्म करुणा के सागर में डूब सी जाती थी। 
   काश असल जिन्दगी में भी ऐसा ही होता। कई मसलों पर फिल्मी डॉक्टर सरीखे फरिश्ते, सही वक्त पर मिल जाते। जिन्दगी कुछ नहीं, बहुत आसान हो जाती। खैर जिन्दगी तो रील नहीं, रियल होती है। हकीकत की जमीन पर मखमली घास की चादर नहीं होती।
 आदर्श और लोकव्यवहार जिन्दगी को संचालित करते हैं। इसलिए कहते हैं कि आदर्श और लोकव्यवहार अलग-अलग होते हैं। जिन्दगी में हर कुछ स्याह या सफेद नहीं होता। हर किसी कि जिन्दगी इसी तरह होती है। अपने मूल्य, अपनी सहूलियत, अपनी इच्छा, अपनी खुशी, ये ही जिन्दगी में सबसे आगे है। जबतक आपके मूल्य, आपकी जीवन जीने का तरीका, दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप न करे, तबतक सब  सही होता है। पर दुनिया है, ये दुनिया दूसरों के सुख से ही ज्यादा दुखी होती है। ऐसे में जब आप दुख में होते हो तो आप ही दुखी होते हैं, दुनिया सुखी होती है। 
   नवरात्र के दिन शुरु हो गए हैं। माता के 9 रूपों का दिन। आज दूसरा दिन है। माता का हर रूप पूज्नीय है। माता शक्ति का प्रतीक है। जगतजननी माता से आप सभी के लिए शांति, समृद्धि, अच्छाई करते रहने की ताकत और स्वस्थय जीवन की कामना करता हूं। साथ ही मां दुर्गा से प्रार्थना करता हूं कि असल जिन्दगी में वो फिल्मी फरिश्ते आपसे, मुझसे हर मोड़ पर मिलते रहें। आमिन



रविवार, सितंबर 16, 2018

शादी के प्रपोजल ने ली प्रेमिका की नौकरी

प्रेमी ने प्रपोज किया और प्रेमिका ने मान लिया। नतीजा प्रेमिका की नौकरी चली गई। है न प्यार का साइड इफेक्ट। आप सोच रहे होंगे ऐसा कैसे हो सकता है। कंपनी को प्रेमिका की निजी जिन्दगी से क्या लेना देना? बात सच है, लेकिन इस केस में ऐसा हो न सका। प्यार का इजहार और शादी के लिए प्रपोज तो प्रेमी ने बड़े रोमांटिक अंदाज में किया। अंदाज भी वो, जो अनेक बार, अनेक लौंडों ने अपनी गर्लफ्रैंड को प्रपोज करने के वक्त अपनाया होगा। वो ही सदियों पुराना, पर सबसे रोमांटिक अंदाज में शुमार, घुटनो के बल बैठकर, प्रेमिका का हाथ पकड़ कर उसे शादी का प्रपोज करना। जनाब ने उसी अंदाज में अपनी प्रेमिका को शादी का प्रपोज किया। भला ऐसे रोमांटिक अंदाज पर कौन प्रेमिका मर नही मिटेगी?
          अब इसमें गड़बड़ ये हो गई कि प्रेमी ने जिस वक्त प्रपोज किया, उस वक्त बेचारी प्रेमिका अपनी नौकरी बजा रही थी। प्रेमिका असल में एय़र होस्टेज है, यानि व्योमबाला। प्रपोज के वक्त वो फ्लाइट में थी। जहाज के टेकऑफ करने के 30 मिनट बाद प्रेमी घुटने के बल बैठ गया। उसके बाद उसने शादी के लिए प्रपोज कर दिया। ऐसे में एयरहोस्टेज न नहीं कर सकी, और उसने हां कर दी। बस इसके बाद प्यार के इजहार का साइड इफेक्ट शुरू हो गया। एयलाइंस को ये अंदाज पंसद नहीं आया और उसने व्योमबाला की छुट्टी कर दी। 
         एयरलाइंस ने तर्क दिया की इससे यात्रियों में हलचल मच गई थी। जिससे उनकी सुरक्षा को खतरा हो गया था। देखा जाए तो बात सही, एयरलाइंस को यात्रियों की सुरक्षा का ख्याल रखना होता है। यहीं पर सवाल खड़ा होता है। जब ऐसा ही कोई कार्यक्रम एयरलाइंस अपनी फ्लाइट में करती हैं, तो क्या सुरक्षा में खलल नहीं पड़ता क्या? यानि मार्केटिंग के लिए कोई भी ट्रिक एकदम सही हैं? यही काम अगर कोई प्यार का मारा करे तो हाय-तौबा। यार कम से कम तर्क तो कोई ऐसा देते जो पचता। 
    खैर चलिए इससे ये तो सबक मिला की प्रपोज करना हो तो, कहीं सार्वजनिक जगह पर करने से बेहतर है कि अपने अधिकार वाली जगह पर प्रपोज करने के फंडे इस्तेमाल करें। चाहे तो पूरा जहाज खरीद लें, चाहे पूरा रेस्टोरेंट बुक कर लें, पर प्रेमिका की नौकरी वाली जगह पर प्रपोज न करें।
इस घटना से आशिकों के लिए सबक
  1. घुटने के बल बैठकर आजकल प्रेमिकाएं भी प्रपोज करती हैं। तो वो भी गांठ बांध लें कि प्रेमी को इस तरह उसकी नौकरी करने की जगह पर प्रपोज न करें। 
  2. लौंडों तुम तो खास ध्यान रखना, कहीं तुम्हारी बेरूखी से गुस्साई कोई छोरी भड़क गई तो तुम्हारी नौकरी की ऐसी-तेसी फेर देगी। वैसे भी बरसों पहले ही जीनत अमान जी तुम्हारी नौकरी को दो टकिया कह कर सबको भड़का चुकी हैं, वो दिन गए जब बेचारी आशा पारेख जी ने गाया था नौकरी छोड़ के न जाइयो बालमा, 
  3. आजकल की छोकरियों का गुस्सा आव देखता न ताव, वो तुम्हारी नौकरी लेकर ही मानेंगी, और हां, ये मत सोचना की बाद में पछताएंगी, 
  4. तो भईया, टाइम देना अपनी प्रेमिकाओं को, वरना....समझ ही गए होगे,...लिखा कम है, समझना ज्यादा...
तो भाईय़ों बोलना मत, कि हमने समझाया नहीं। हां, ये पोस्ट पढ़कर शादीशुदा लोगो को जोश चढ़ रहा हो, तो मुझे बता सकते हैं कि उनके प्रपोज के बारे में और कैसे वो रिजेक्ट हो गए थे। भले ही नाम इनबॉक्स में बताना। यानि जख्म को कुरेद देना।

बुधवार, अगस्त 29, 2018

दद्दा ध्यानचंद हम तो बेशर्म हैं !!

दद्दा का जन्मदिन है...उनके बारे में हर कोई जानता है भारत में...दिमाग में ख्यालात वही हैं जो इस दो साल पुरानी पोस्ट में है...दोबारा पोस्ट कर रहा हूं

दद्दा हम तो बेशर्म हैं..
https://boletobindas.blogspot.com/2016/08/blog-post_31.html

सोमवार, अगस्त 20, 2018

शहीदों के हत्यारे से मिलते शर्म नहीं आई मिस्टर सिद्धू

तो सिद्धू साहब आप गावस्कर और कपिल देव से भी बड़े क्रिकेटर हो गए। जो तालिबान खान से दोस्ती निभाने पहुंच गए पाकिस्तान। दोस्ती भी इस हद तक कि वाजपेयी साहब को आखिर तक विदाई भी न दे सके। वाजपेयी साहब के सिपाही थे तुस्सी तां। फेर की हो गया? या खास मणिशंकर अय्यर वाला पट्टा पाकिस्तान खींच ले गया। आपको तो मणिशंकर अय्यर की तरह पाकिस्तान से मोहब्बत हो गई है? सिद्धू साहब वैसे तो आपको कहावतें बहुत याद रहती हैं। हैरत है कि सरहद पार जाकर आपको 'भेड़ की खाल में छुपे भेड़िए' वाली कहावत याद नहीं आई। खासकर गले मिलते हुए। 
  सिद्धू साहब ऐसा क्या हो गया है, जो पाकिस्तानी जनरल के आप कसीदे पढ़ने लगे। चलिए मान लेते हैं कि वो आपसे गले मिलने आ गया, तो आपको गले मिलना पड़ा। फिर भी, आपको उस वक्त वो दिन याद नहीं आया, जब वाजपेयी साहब ने हाथ मिलाने को बढ़ रहे पाकिस्तानी जनरल मुशर्रफ की तरफ से मुंह फेरकर बाकियों सार्क देशों के प्रमुखों से दुआ सलाम की थी। चलिए एक बारगी मान लेते हैं कि ये पाकिस्तानी जनरल आपके गले पड़ गया था। तो उससे गले मिलने की सफाई देते वक्त उसकी तारीफ करने क्यों लगे हैं आप। क्या नापाक परस्त नेताओं से ये सीखा है?
   वैसे सिद्धू साब, पाकिस्तानी जनरल ने कह दिया कि वो शांति चाहता है, और आपने विश्वास कर लिया। वाह असि तां वारे जाएं त्वाडे भोलेपन ते। जो हरामी जनरल रोज सरहद पर गोलाबारी करवा रहा हो। जो रोज आतंकवादियों की घुसपैठ कराता हो। जिसकी वजह से हमारे सैनिक शहीद हो रहे हों, उसकी बात पर त्हाणु विश्वास किवें हो गया? दस्सोगे कदी?
  सिद्धू साहब वो जनरल एक तरफ एक तरफ तीर्थ यात्रा के रास्ते खुलवाने की बात करता है। दूसरी तरफ आतंकवादियों की घुसपैठ कराता है। उस हरामी जनरल की बात का भरोसा कर रहे हो आप? उस हत्यारे दरिंदे की बात का प्रचार करते वक्त आपको जरा भी शर्म नहीं आ रही?
    सिद्धू साहब आपका कहना है कि आप दोस्त होने के नाते गए। तो जनाब जरा बताएंगे कि आपके दोस्त क्रिकेटर इमरान खान ने कब आपको न्योता भेजा? वहां तो इमरान तालिबान खान शपथ ले रहा था। तालिबान खान ने कह दिया एक कदम उठाओ तो, आप गद्गद हो गए। ऐसा ही शांति का पुजारी है आपका ये दोस्त, तो कश्मीर के बॉर्डर पर आतंकवादियों की घुसैपठ क्यों नहीं रुकवाता? क्यों नहीं सीजफायर को रोकता? कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकियों की करतूत आपके दोस्त को क्यों नहीं दिखाई देती? वड्डे आए तुस्सी दोस्ती दी मिसाल देण वास्ते। वैसे भी इन तालिबान खान के हाथ तो बंधे हुए हैं।
   एक बता बताऐं सिद्दू साब, वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह और मोदी साहब ने शांति के लिए जो कई कदम उठाए उसका सिला क्या मिला अबतक? कभी करगिल, कभी उरी, कभी पठानकोट। इतना भी समझ नहीं आता आपको कि नफ़रत की बुनियाद पर बने उस देश की बागडोर आतंकियों के रहनुमाओं के हाथ में है। ये वो लोग हैं जो भारत से नफरत करते हैं, हिंदूओं से नफरत करते हैं, सिखों से नफरत करते हैं। ये बात आपको मालूम न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता जनाब।    
    असल बात ये है सिद्धू साहब कि अब आप भी घटिया राजनीति करने लगे हैं। अय्यर ने पाकिस्तानियों से भारत सरकार गिराने की मदद मांगी। आप वहां जाकर पंजाब बॉर्डर खोलने की वकालत करने लगे। वाह कमाल है। याद रखिए सरहद के उसपार उनके हाथ में ताकत है, जो सिर्फ हमसे, आपसे नफरत करते हैं। 47 का दौर आप भूल सकते हैं, सदियों को याद है, और हमेशा याद रहेगा।
  माफ कीजिएगा, मिस्टर नवजोत सिंह सिद्धू, अब आपको सिद्धू साहब कहने का मन नहीं रहा। एक क्रिकेटर होने के नाते जो हमारे दिलों में आपको लेकर इज्जत थी, उसपर खुद आपने पानी फेर दिया है। आज से आप वो सिद्धू हैं, जो अब एक निम्न स्तर का नेता हो गया है। वो सिद्धू हैं, जो हमारे शहीद सैनिकों की लाशों पर चढ़कर सरहद पार उनके हत्यारे के समर्थक के शपथ समारोह में शामिल होने गया। हमारे शहीदों के हत्यारे से बगलगीर होकर मिला। मिस्टर सिद्धू थोड़ी सी शर्म बची हो आपमें, तो अपने पर खुद ही लानत लानत भेज मारिए।

शुक्रवार, अगस्त 10, 2018

बरखूरदार ये इमरान तालिबान खान है तुम्हारा क्रिकेटर नहीं.. रोहित

क्रिकेटर, प्लेबॉय अब है इमरान तालीबान खान

पाकिस्तान में लोकतंत्र का ढकोसला


आखिरकार एक बार फिर साबित हो गया कि पाकिस्तान में सेना की ही चलेगी। नए पीएम बनने जा रहे इमरान खां भी सिर्फ कठपुतली हैं। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में #LOC पर 600 से ज्यादा आतंकवादी जमा कर रखे हैं। कल ही घुसपैठ करते इन आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ में हमारे मेजर राणे समेत 4 जवान शहीद हुए हैं। मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए, बाकि वापस पाकिस्तान भाग गए। कुछ आतंकी गद्दारों के भरोसे अंदर छुपने में कामयाब हुए हैं। ऐसी घटनाएं सबूत हैं कि पाकिस्तान में लोकतंत्र पूरी तरह से खोखला है।

हमारे भांड सेक्युलर बड़े वाले वो हैं
 पाकिस्तान में इमरान के पीएम बनने के आसार होते ही हमारे यहां हवाबाज सेक्युलर भांड ठुमके लगाने लगे थे। इनका कहना है कि पाकिस्तानी जनता ने आतंकियों को नक्कार दिया है। सही मायने में भारतीय सेक्युलर भांड इतने बड़े वाले वो हैं, कि क्या कहना। जबकि हकीकत ये है कि पाकिस्तानी सेना ही आतंकी मानसिकता की है। वहां जनता की क्या औकात जो वो आतंकियों को नक्कार दे। 
    किसी जमाने में हमारे सेक्युलर भांडों ने हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे पर भी मटक-मटक कर कमर लचकाई थी। नतीजा क्या निकला था सबको पता है। पहली बार हिमालय पार से हमें धोखा मिला था। हमारी पीठ में छूरा घोंपा गया, जिसका जख्म आजतक नहीं भरा है। असल में भूखी बिल्ली को देखकर कबूतर की तरह आंखे बंद कर लेना भारतीय सेक्युलर भांडों की फितरत है। 

पाकिस्तान में आतंकवादी चुनाव जीते हैं
पाकिस्तान में इमरान को मिला बहुमत तालिबानी सोच वालों की जीत है। सेना की मदद से वोटों की जमकर धांधली हुई है। आतंकी समर्थकों के वोट इमरान को मिले हैं। हार के बाद भी आतंकवादी हाफिज सईद और उसके जैसे आतंकियों की पार्टियों को 9 फीसदी वोट मिले हैं। ज्यादातर देशों में 9 से 10 फीसदी ही लोग हत्यारे-दरिंदे होते हैं, जो 90 फीसदी शांत रहने वालों को दबा देते हैं। 

किक्रेटर इमरान खां रंगीन थे
इसमें कोई शक नहीं कि इमरान खान बेहतरीन क्रिकेटर रहे हैं। क्रिकेट की दुनिया के द ग्रेट 4 आलराउंडर में से एक। क्रिकेटर इमरान खान ने बिंदास जिंदगी जी है। इमरान के ही शब्दों में उनकी जैसी जिंदगी का सपना कई क्रिकेटर देखते थे। इमरान ही थे जिन्होंने 1992 में पाकिस्तान को अपने दम पर वनडे क्रिकेट का वर्ल्ड कप दिलाया था। हैंडसम पर्सनेल्टी, सफल क्रिकेटर इमरान के पीछे लाखों लड़कियां दीवानी थीं। क्या पाकिस्तान, क्या भारत, दूसरे देशों में भी उनपर जान छिड़कने वाली लड़कियों की कमी नहीं थी। सीधे-सीधे कहें तो इमरान एक शानदार क्रिकेटर होने के साथ ही फेमस प्लेबॉय भी थे। कई लड़कियों से उनके सेक्स रिलेशन थे। बेनजीर भुट्टो, जीनत तमाम से लेकर अनेक विदेशी बालाओं से उनका नाम जुड़ा। कुछ से उनके बच्चे भी हुए, जो डीएनए रिपोर्ट से साबित भी हुए। इतने अफेयर के अलावा इमरान खान ने तीन-तीन शादियां भी की।

राजनीति में बन गए इमरान तालिबान खां
जी हां, राजनीति में आकर इमरान खान कट्टर मुस्लिम का चोला ओढ़ते चले गए। 22 साल की राजनीति में जब वो वांछित कामयाबी न पा सके, तो उन्होंने पाकिस्तानी चोला पहन लिया। यानि उस नफरत का चोला, जिसकी बुनियाद पर पाकिस्तान बना था। वो किक्रेटर और नेता इमरान खां से बदलकर इमरान तालिबान खान हो गए। ये नाम भी उन्हें पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों ने दिया है, न कि किसी मुस्लिम विरोधी सोच वाले ने। जैसा कि हमारे देश के पाकिस्तान परस्त गद्दार सोचते हैं।

क्रिकेटर से तालिबानी बनने का सफर 
ये बदलाव इमरान खां ने सोच समझ कर ही किया। जब क्रिकेटर के तौर पर मिली मशहूरी से इतने साल कामयाबी नहीं मिली, तो उन्होंने रंग-ढंग बदल लिए। पंजाबी न होने के कारण वो पाकिस्तानी पंजाबी प्रभुत्व वाली राजनीति में बाहरी ही लगते रहे। अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए इमरान ने मुस्लिम कट्टरपंथियों का समर्थन करना शुरू किया। फिर सत्ता के लिए पाकिस्तानी सेना की गोद में जा बैठे और सेना की आतंकी हरकतों पर चुप्पी ओढ़ ली।

तालिबानी इमरान के काम
  • इमरान ने 2013 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के कमांडर वली-उर-रहमान को 'शांति समर्थक' कहा
  • उत्तर पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तुनख्वा में इमरान की गठबंधन सरकार ने पिछले साल हक्कानी मदरसे को 30 लाख डॉलर दिए।
  • हक्कानी मदरसा वो मदरसा तालिबान की रीढ़ की हड्डी है। पूर्व तालिबान आतंकी सरगना मुल्ला उमर समेत अनेक आतंकी यहीं की पैदाइश हैं। 
  • आतंकवादियों का खुलेआम समर्थन देकर क्रिकेटर इमरान खां को पाकिस्तान में इमरान तालिबान खान कहा जाने लगा।  
क्रिकेटर इमरान भी भारत विरोधी थे
भले सुनील गावस्कर को इमरान खान अपने अच्छे दोस्तों में मानते हों। भले ही गावस्कर ने पाकिस्तान के वनडे वर्ल्ड कप जीतने और इमरान के वजीर-ए-आजम बनने की भविष्याणी की हो। फिर भी भारतीय टीम से हारना इमरान खां को कभी बर्दाश्त नहीं हुआ। ये कई मौकों पर दिखा भी। एक मैच सबको याद होगा, जिसमें पाकिस्तान भारत से हारा, तो कमेंटरी करते इमरान गुस्से में उठकर मैदान में बैठी पाकिस्तानी टीम के पास चले गए थे। उस टीम में किसी में इमरान की शख्सियत की, उस हरकत की खिलाफत करने की हिम्मत न थी। वो हरकत इसकी तरफ इशारा करती है कि उनकी नजर में उनकी टीम भारत से नहीं, हिंदू भारत से हारी थी।

भारतियों ने दुश्मन को भी इज्जत दी
टीम इंडिया पर पाकिस्तान की जीत पर भारत में पटाखे फोड़ने वाली जमात के लिए इमरान आज भी खुदा ही हैं। उनसे इतर भारतीय खेल प्रशंसकों ने क्रिकेटर इमरान को हमेशा इज्जत दी है। जब भी वो भारत आए हैं, उनका स्वागत ही हुआ। इसलिए भारत में आकर इमरान भारत के खिलाफ बोलते नजर नहीं आए।

चुनाव प्रचार में भारत के खिलाफ जहर उगला  
इस बार चुनाव प्रचार में इमरान खान ने जमकर भारत के खिलाफ जहर उगला। उन्होंने पाकिस्तानी सेना की नापसंद नवाज शरीफ को एक तरह से भारत का पिठ्ठू कहा। नवाज पर लगाए इमरान के इल्जामों की बानगी-
·        इमरान ने कहा कि नवाज शरीफ भारत के खिलाफ बहुत सॉफ्ट हैं। इमरान ने लोगों को उकसाया कि, 'भारत और मोदी को नवाज प्यारे हैं, लेकिन वे हमारी सेना से नफरत करते हैं। अब उन्हें इस बात की चिंता है कि अगर इमरान सत्ता में आया तो पाकिस्तान के लिए काम करेगा।
·        इमरान नवाज शरीफ को आधुनिक मीर जाफर कह चुके हैं।
·        नवाज को इमरान ने मोदी की भाषा बोलने वाला कहा है।
·        इमरान ने अपने प्रचार में काफी उग्र तरीके से कश्मीर का मुद्दा उठाया है।
·        भारत को कश्मीर में हिंसा का जिम्मेदार बताया है।
·        सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इमरान ने काफी तीखे तेवर दिखाते हुए कहा था कि 'मैं नवाज शरीफ को बताऊंगा कि मोदी को कैसे जवाब देना है।
·        2015 में मोदी की अचानक पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ से की गई मुलाकात को इमरान ने 'हितों का टकराव' बताया था।
·        चुनाव नतीजे आते ही इमरान ने कश्मीर में हिंसा के लिए भारतीय सेना को दोषी बताया

तो ये था इमरान का भारत विरोधी चुनाव प्रचार अभियान। नवाज को निशाने पर लेकर पाकिस्तानी सेना और इस्लामिक आतंकी कट्टरपंथियों का चहेता बनने की कोशिशें। जिसमें नेता इमरान खान कामयाब भी हो गया। यानि गद्दार आधुनिक जिन्ना की तरह सत्ता के लिए इस्लामिक कट्टरपन का चोला पहन लिया।

नवाज नापसंद हैं सेना को
असल में नवाज शरीफ हमेशा से ही भारत के साथ बातचीत और शांति के समर्थक
रहे हैं। पाकिस्तानी सेना के न चाहने पर भी नवाज शरीफ ने पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत की थी। पिछली बार नवाज की शांति कोशिश को करगिल में घुसपैठ करके पाकिस्तान सेना ने पलीता लगा दिया था। इसबार नवाज किसी तरह से सत्ता में न आ पाएं, इसका पक्का इतंजाम पाकिस्तानी सेना ने कर दिया। आईएसआई और सेना के दवाब में पाकिस्तानी अदालत ने नवाज शरीफ और उनकी बेटी को जेल में डाल दिया।

चुनाव बाद इमरान और पाकिस्तानी सेना की हरकत
चुनाव बाद इमरान ने कश्मीर में तीस साल से जारी हिंसा के लिए हमारी सेना को जिम्मेदार ठहरा दिया। तालीबान खान का ये बयान ही बताता है कि उनकी औकात नहीं है कि वो शांति के लिए कोई कदम उठा पाएं। कश्मीर में #LOC पर आतंकियों की फौज जमा करके पाकिस्तानी सेना ने भी बता दिया है कोई हो नृप, वो बाज नहीं आएंगे।

पाकिस्तान से बातचीत की नौटंकी बंद हो
गाड़ी की सीट पर खुशी-खुशी हाथ-पैर बंधवा कर बैठे इमरान तालीबान खान से बातचीत करके कोई फायदा नहीं है। पाकिस्तान की बातचीत की पेशकश की किसी भी नौटंकी को हमारी सरकार को मानना नहीं चाहिए। न ही भांड सेक्युलरों पर सरकार ध्यान दे। हमारी सरकार को पूरा ध्यान पाकिस्तानी सेना से निपटने और गद्दरों को फांसी के तख्ते पर पहुंचाने पर होना चाहिए।

चलते-चलते
अब इसके बाद भी कोई भांड सेक्युलर इमरान तालिबान खान से शांति की उम्मीद रखे तो उससे बड़े वाला चू#@या कोई नहीं। बस वो किसी भारतीय को बरगलाने की कोशिश न करे, वैसे भी हम में से ज्यादातर लोग जानते हैं कि भांड सेक्यूलर से बड़ा ..समझ गए न, वही जो ऊपर लिखा है।

#हिन्दी #हिंदी #हिन्दी_ब्लॉग #राजनीति

बुधवार, जुलाई 18, 2018

..हर मिनट ढाई लाख खर्च करने जरूरी है ?

आओ संसद का समय बर्बाद करें। लगता है ये लोकतंत्र का मूल वाक्य बन गया है। संसद के अंदर चर्चा होनी चाहिेए, पर विपक्ष उसे हंगामा करने की जगह समझने लगा है।  पिछले कई सालों से कई मौकों पर विपक्ष यही करता आ रहा है।  इस बार तो हद ही हो गई है। कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी ऐसा ही करती थी। इसका मतलब ये हुआ की कांग्रेस हर वो काम करेगी, जिसे सत्ता में रहते वो गलत कहती थी। कल तक सत्ता में साथ रही पार्टी के सांसद आज संसद में लगातार हल्ला मचा रहे हैं। 
   आखिरी बार कब संसद में लंबी चर्चा हुई, ये किसी को याद नहीं पड़ता। संसद के बारे में जनता जब भी कोई सोचती है तो उसे बस हंगामा याद आता है। संसद सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक क्यों होती है? क्या सिर्फ चाय पीने और गप्पे मारने के लिए सर्वदलीय बैठक होती है। क्या इस बैठक में संसद में बहस के लिए मुद्दे तय नहीं किये जा सकते? उल्टा समय बर्बाद करने के लिए विपक्ष हर सत्र में अविश्वास प्रस्ताव ले आता है। जबकि इस प्रस्ताव से पूर्ण बहूमत की सरकार नहीं गिरने वाली। 
    विपक्ष होने का मतलब ये थोड़ी है कि सरकार के हर काम का विरोध करें। चाहे इसके चक्कर में देश के अंदर का माहौल खराब हो जाए। कोई ऐसा मुद्दा याद नहीं आ रहा जिस पर अबतक कांग्रेस ने राजनीति से उठकर सरकार का समर्थन किया हो। चाहे वो सर्जिकल स्ट्राइक रही हो, या जेएनयू में भारत विरोधी गैंग पर कार्रवाई की बात हो। कांग्रेस ने बिना किंतु-परंतु लगाए कुछ नहीं कहा। 
    मानसून सत्र के पहले ही दिन हंगामे के कारण राज्यसभा स्थगित करनी पड़ी। जब हंगामा ही करना है, तो फिर हर मिनट करीब ढाई लाख रूपये खर्च करने की क्या जरूरत है? संसद के पिछले सत्र में ही करीब 144 करोड़ रूपये खर्च हुए थे। इससे अच्छा 144 लोगो को एक-एक करोड़ देकर करोड़पति बना देते। 

मंगलवार, जुलाई 03, 2018

काट डालो साहब काट डालो ..रोहित

    दिल्ली को गंजा करने की तैयारी के बीच 10 लाख पेड़ लगाने की योजना का पता चला है। कमाल है न। ये ही तो राजधानी की खासियत है। सरकार ने जानकारी दी है कि अकेले डीडीए दस लाख पेड़ लगाएगा। अब बरसों से लाइन में लगे लोगो को मकान नहीं दे पाया डीडीए, तो इसका मतलब ये थोड़ी न है कि वो योजना भी न बनाए। इसके अलावा दिल्ली मेट्रो 20 हजार, सीपीडब्लयूडी 50 हजार पेड़ लगाएगी। अब दिल्ली मेट्रो आधुनिक काल की है, समय की पाबंद है। तो उम्मीद कर सकते हैं कि वो 20 हजार पेड़ लगा देगा। 
    इन सबमें एक बात सबसे मस्त लगी मुझे। दिल्ली में 9 लाख पेड़ों की जरुरत है। योजना के मुताबिक 10 लाख पेड़ अकेले डीडीए लगा देगा। यानि अकेले डीडीए दिल्ली की हवा को शुद्ध कर देगा। वैसे भी वृक्षारोपण नेता और मशूहर लोगो का फेवरेट शगल है। दिल्ली तो देश की राजधानी है। यहां हर बड़ा आदमी और नेता पेड़ लगाना चाहता है। बचपन से अबतक ऐसे अनेक वृक्षारोपण कार्यक्रम देख चुका हूं। नतीजा ये है कि दिल्ली छोटा-मोटा एक हरा-भरा जंगल सा है। मेरी बात पर अगर विश्वास नहीं हो तो, कागजों में देख लें। कागजों में दिल्ली छोटा-मोटा हरा-भरा जंगल,  और धरातल में इसके कुछ इलाकों में जंगल राज न मिले तो कहना।
  दिल्ली के आसपास के इलाकेजिन्हें हम एनसीआर कहते हैं। उनका जबरदस्त विकास हुआ है। गाड़ी लेकर निकल जाइए, दूर-दूर तक नए पेड़ दिखेंगे। खेतों में फसल भले गायब हो, कंक्रीट के जगलों की बहार जरूर दिखेगी। ताल-तलैया, जिनको तालाब भी कहा जाता है, ये भी इसी इलाके में कहीं-कहीं मिल जाएंगे, एकदम अपने ढेठ गंवई अंदाज में। तो यहां से घूमकर वापिस आइए देश क राजधानी में।
    अब दिल्ली में तालाब देखना चाहेंगे आप। तो इसके लिए पुराने आंकड़ों का सहारा न लें। 30-40 साल पुराने बाबा आदम के जमाने के आंकड़ों का भला अब क्या काम? ये कम एहसान है प्रशासन और कॉलोनाइजरों का, जो दिल्ली में अब भी कुछ तालाब हैं। हां तिहाड़ के तालाब की तरह अगर सूखे तालाब मिले तो, देखकर सूखे-सूखे लौट जाना, शिकायत न करना। यहां यमुना नदी का दम निकल चुका है। तालाब वगैरह किस खेत की मूली हैं। वैसे भी दिल्ली देश की राजधानी है। यहां तो दिल्ली वालों की ही कोई नहीं सुनता, तो बाहर वालों की कौन सुनेगा? खैर यहां के लोग ही कहां किसी की सुनते हैं? ये अलग बात है कि यमुना के अंदर घुसकर घर बनाने की घुसपैठियों को पूरी छूट है। 
   दिल्ली में 'राग पेड़' क्यों गाया जा रहा है, समाचारों से पता चल ही गया होगा आपको। सरकार बाबूओं के इलाके और अमीरों की बस्ती दक्षिण दिल्ली में 14 हजार पेड़ काटने की योजना थी। (ये आधिकारिक आंकड़ा है) सरकारी कॉलोनियां काफी पुरानी हो गई थीं, इसलिए उनकी जगह नए मकान का प्लान है। वैसे नियम ये है अगर सरकारी प्रोजेक्ट के कारण 1 पेड़ कटता है, तो 10 पेड़ लगाने होंगे। यानि 14,000 पेड़ काटने पर, 14,00,000 पेड़ लगाने होंगे। 
   दिल्ली के इन इलाकों में ज्यादातर पेड़ काफी पुराने हैं। अब इन पेड़ों की जगह जो छोटे पेड़ लगेंगे वो बरसों में बड़े होंगे, तबतक अगर दिल्ली वासी गैस चेंबर में बीमारियों का शिकार होते हैं, तो उनकी बला से। 
   चलते-चलते एक बात बताता चलूं। 80-90 के दशक में किसी समय दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित महानगरों में तीसरे नंबर पर थी। मस्त बात ये थी कि दिल्ली दुनिया की सबसे हरी-भरी राजधानी की लिस्ट में चौथे नंबर पर थी। (तीसरे-चौथ स्थान में इधर-उधर हो गया होगा, इसिलिए इतनी टेंशन न लेना)

हां पेड़ों के कुछ फायदे पढ़ते चलिए...
1 पेड़ 1 साल में औसतन 118 किलो ऑक्सीजन पैदा करता है
2 भरे-पुरे पेड़, 4 लोगों को ऑक्सीजन देते हैं
पेड़ों के आसपास प्रदूषण के कण 7 से 24% तक कम होते हैं
चलो छोड़ों पेड़ों के ज्यादा फायदा क्या बताना। आप तो जानते ही होंगे। 
वैसे इतने हल्ले के बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले 4 जुलाई तक पेड़ काटने पर रोक लगाई थी। अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानि एनजीटी ने सुनवाई की अगली 19 जुलाई तक पेड़ काटने पर रोक लगा दी है। देखते हैं क्या होता है? तब तक प्रार्थना करिए की कागजों से निकल कर धरातल पर भी हरी-भरी दिल्ली दिखे। 

रविवार, जून 10, 2018

हवा का शोर सुना क्या ?

प्रकृति का, देश की राजधानी पर, जेठ के महीने में एहसान। कल शाम  बाहर जाते वक्त मंद-मंद चलती हवा ने चंद सेकेंड में कैसे रूप बदला, ये देखने लायक था...जब देखने का मंजर था, तो क्यों न देख ही लें...क्या कहते हैं...बस थोड़ी देर के लिए सब छोड़ दीजिए, देखिए हवा को, सुनिए उसकी आवाज, फिर बारिश का शोर....


रविवार, जून 03, 2018

#METOO ही सबकुछ नहीं कहता


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#METOO ने दुनिया में तहलका मचा रखा है। सच्ची-झूठी, हल्की-फुल्की बातों ने इसका मजाक भी बना दिया है। इनसब के बीच मेरे दिमाग में कुछ बातें चल रही थीं। उन्हीं बातों में एक लेख में मुझे दिखा। उसका लिंक नीचे दिया है, पढ़िएगा, जरूर। अंग्रेजी टूटी-फूटी आती होगी, तो भी सब समझ जाएंगे। कुछ नहीं, तो भावनाएं समझेंगे। आप विचलित होंगे, मजाक भी उड़ा सकते हैं, हल्के मूड में। लेकिन बात सच है, तीखी है, पढ़ने के बाद शायद आप अपने आसपास की बैडोल शरीर वाली लड़कियों की बात भी समझे सकें।

#बोले_तो_बिंदास
#और_भी_हैं_बातें
#बोलेतोबिंदास
#दबी_छुपी_बातें



वो रात चांदनी वाली....

आज शरद पूर्णिमा है, सुना है चांद बहुत बड़ा होता है, बहुत चमकीला भी आज के दिन, बड़ा दिल भी होता है उसका, हर किसी के ख्वाब और दिल की बातो...