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खतरनाक राजनीतिक परिदृश्य दिसंबर 18

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वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य बड़ा अजीब सा है। सत्ता पक्ष विपक्ष को निर्मूल करने के मिशन पर है। जाने कैसे उसे भ्रम हो गया है कि लोकतंत्र में विपक्ष नेस्तनाबूद हो सकता। वहीं विपक्ष शैतान से दोस्ती की हद तक जाकर अपना अस्तित्व बचाने में लगा है। जीत के लिए कोई हथकंडा नहीं छोड़ रहा विपक्ष। खासकर कांग्रेस खंभा नोच रही है। सत्ता और विपक्ष को ये समझना चाहिए कि उनकी क्षणिक और तत्कालिक लाभ के चक्कर में देश में लोग पिस रहे हैं। सियासी दलों की गलतियां देश के लिए भारी मुसीबत बन रही हैं। 2014 की हार ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया था। कांग्रेस तीन साल तक वो कोमा में थी। 2016 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जाकर उसमें जान आई। वो भी इसलिए की देश में निर्मूल होने के कगार पर पहुंच चुकी वामपंथी और बाकी अराजक धाराएं उससे जुड़ गई। वामपंथी धारा को शोर शराबा करना खूब आता है। बरसों इन लोगों ने सत्ता के साथ हाथ से हाथ मिलाकर खूब मलाई बटोरी। ये अलग बात है कि जमीन पर उसके कार्यकर्ता तब भी नुक्कड़ नाटक करते थे, अब भी नुक्कड़ नाटक ही करते हैं। बिन पैंदे के लोटे की तरह, अपनी जड़ों से कटकर, दूसरे वातारवण की आबोहवा में जीन…

वो रात चांदनी वाली....

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आज शरद पूर्णिमा है, सुना है चांद बहुत बड़ा होता है, बहुत चमकीला भी आज के दिन, बड़ा दिल भी होता है उसका। हर किसी के ख्वाब और दिल की बातों को अपने में समेट के रखता है। साक्षी होता है हर मासूम मोहब्बत का। हर दिल टूटने पर उसका दिन भी छलनी होता है, फिर भी अपने काम में लगा रहता है, सबके प्रेम का गवाह बनने को तैयार रहता है। तभी तो तमाम गढढों के बाद भी वो चमकता है, हमारी खातिर, तुम सब की खातिर। सुन रही हो उस चांदनी की छन-छन, जो बरस रही है चारों ओर, मेरे आंगन में, तुम्हारे छज्जे पर, खिड़की से अंदर बेरोकटोक। इतनी धवल, इतनी उजास है आज। तुम्हारा वो रूप पता है, आज भी जस का तस है मेरे अंदर। क्रीम कलर की साड़ी पर पड़ती चांदनी, ऊपर खिला चांद। कंक्रीट के दो जंगल के बीच खाली जगह पर, पिघली हुई चांदनी तुम पर पड़ रही थी। आधी रात से ज्यादा समय बीत चुका था। तुमने आते ही पूछा था, मेरा इंतजार कर रहे हो न, मैंने न कहा था, पर मेरे चेहरे पर हां थी, तुम खिलखिला कर हंसी थी, तुम्हारी हंसी में वो खनखनाहट थी, जो कई बार तुम कहती थी कि मेरे साथ रहने पर आ जाती है, वरना जाने कहां खो जाती है...    खैर, अब तो तुम ही जाने कह…

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो, एक गोली देता था, या इंजेक्शन लगाता था और बीमारी छूमंतर हो जाती थी। कितनी भी गंभीर हालत हो, फैमली डॉक्टर एकदम आखिर में ही जाकर अस्पताल में भर्ती करने को कहता था। इन फिल्मों के डॉक्टर भले, मृदभाषी और नि:स्वार्थ भाव से काम करते थे। कई केस में तो डॉक्टर दवा लिखते वक्त कहता था, कि अगली बार बिना पैसे के वो दवा नहीं लिखेगा, फिर भी लिखता था। सबसे मस्त बात ये होती थी कि जिस बीमारी का इलाज भारत में संभव नहीं होता था, उस मर्ज का दुनिया का नंबर वन डॉक्टर एकदम मौके पर उसी शहर में होता था। वो भी तुरंत-फुरत सफल ऑपरेश्न कर देता था। मरीज जिस भी शहर में होता था, वहां सबकुछ उपलब्ध भी हो जाता था। या फिर कहें, कि ये डॉक्टर का चमत्कार होता था, कि वो जो उपलब्ध होता था, उससे चमत्कारिक ऑपरेशन कर डालता था।     कितना आसान होता था फिल्मों में। इन्ही फिल्मों ने डॉक्टर को भगवान बनाया। डॉक्टर को कभी गलती न करने वाला इंसान बनाया। मानवता के लिए हर हाल में, हर जगह पहुंचने वाला फरिश्ता बनाया। फिल्मों में डॉक्टरों के दो-तीन चिरपरिच…

शादी के प्रपोजल ने ली प्रेमिका की नौकरी

प्रेमी ने प्रपोज किया और प्रेमिका ने मान लिया। नतीजा प्रेमिका की नौकरी चली गई। है न प्यार का साइड इफेक्ट। आप सोच रहे होंगे ऐसा कैसे हो सकता है। कंपनी को प्रेमिका की निजी जिन्दगी से क्या लेना देना? बात सच है, लेकिन इस केस में ऐसा हो न सका। प्यार का इजहार और शादी के लिए प्रपोज तो प्रेमी ने बड़े रोमांटिक अंदाज में किया। अंदाज भी वो, जो अनेक बार, अनेक लौंडों ने अपनी गर्लफ्रैंड को प्रपोज करने के वक्त अपनाया होगा। वो ही सदियों पुराना, पर सबसे रोमांटिक अंदाज में शुमार, घुटनो के बल बैठकर, प्रेमिका का हाथ पकड़ कर उसे शादी का प्रपोज करना। जनाब ने उसी अंदाज में अपनी प्रेमिका को शादी का प्रपोज किया। भला ऐसे रोमांटिक अंदाज पर कौन प्रेमिका मर नही मिटेगी?           अब इसमें गड़बड़ ये हो गई कि प्रेमी ने जिस वक्त प्रपोज किया, उस वक्त बेचारी प्रेमिका अपनी नौकरी बजा रही थी। प्रेमिका असल में एय़र होस्टेज है, यानि व्योमबाला। प्रपोज के वक्त वो फ्लाइट में थी। जहाज के टेकऑफ करने के 30 मिनट बाद प्रेमी घुटने के बल बैठ गया। उसके बाद उसने शादी के लिए प्रपोज कर दिया। ऐसे में एयरहोस्टेज न नहीं कर सकी, और उसने हां कर…

दद्दा ध्यानचंद हम तो बेशर्म हैं !!

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दद्दा का जन्मदिन है...उनके बारे में हर कोई जानता है भारत में...दिमाग में ख्यालात वही हैं जो इस दो साल पुरानी पोस्ट में है...दोबारा पोस्ट कर रहा हूं

दद्दा हम तो बेशर्म हैं..
https://boletobindas.blogspot.com/2016/08/blog-post_31.html

शहीदों के हत्यारे से मिलते शर्म नहीं आई मिस्टर सिद्धू

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तो सिद्धू साहब आप गावस्कर और कपिल देव से भी बड़े क्रिकेटर हो गए। जो तालिबान खान से दोस्ती निभाने पहुंच गए पाकिस्तान। दोस्ती भी इस हद तक कि वाजपेयी साहब को आखिर तक विदाई भी न दे सके। वाजपेयी साहब के सिपाही थे तुस्सी तां। फेर की हो गया? या खास मणिशंकर अय्यर वाला पट्टा पाकिस्तान खींच ले गया। आपको तो मणिशंकर अय्यर की तरह पाकिस्तान से मोहब्बत हो गई है? सिद्धू साहब वैसे तो आपको कहावतें बहुत याद रहती हैं। हैरत है कि सरहद पार जाकर आपको 'भेड़ की खाल में छुपे भेड़िए' वाली कहावत याद नहीं आई। खासकर गले मिलते हुए।    सिद्धू साहब ऐसा क्या हो गया है, जो पाकिस्तानी जनरल के आप कसीदे पढ़ने लगे। चलिए मान लेते हैं कि वो आपसे गले मिलने आ गया, तो आपको गले मिलना पड़ा। फिर भी, आपको उस वक्त वो दिन याद नहीं आया, जब वाजपेयी साहब ने हाथ मिलाने को बढ़ रहे पाकिस्तानी जनरल मुशर्रफ की तरफ से मुंह फेरकर बाकियों सार्क देशों के प्रमुखों से दुआ सलाम की थी। चलिए एक बारगी मान लेते हैं कि ये पाकिस्तानी जनरल आपके गले पड़ गया था। तो उससे गले मिलने की सफाई देते वक्त उसकी तारीफ करने क्यों लगे हैं आप। क्या नापाक परस्त ने…

बरखूरदार ये इमरान तालिबान खान है तुम्हारा क्रिकेटर नहीं.. रोहित

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पाकिस्तान में लोकतंत्र का ढकोसला
आखिरकार एक बार फिर साबित हो गया कि पाकिस्तान में सेना की ही चलेगी। नए पीएम बनने जा रहे इमरान खां भी सिर्फ कठपुतली हैं। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में #LOCपर 600 से ज्यादा आतंकवादी जमा कर रखे हैं। कल ही घुसपैठ करते इन आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ में हमारे मेजर राणे समेत 4 जवान शहीद हुए हैं। मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए, बाकि वापस पाकिस्तान भाग गए। कुछ आतंकी गद्दारों के भरोसे अंदर छुपने में कामयाब हुए हैं। ऐसी घटनाएं सबूत हैं कि पाकिस्तान में लोकतंत्र पूरी तरह से खोखला है।
हमारे भांड सेक्युलर बड़े वाले वो हैं पाकिस्तान में इमरान के पीएम बनने के आसार होते हीहमारे यहांहवाबाज सेक्युलर भांड ठुमके लगाने लगे थे। इनका कहना है कि पाकिस्तानी जनता ने आतंकियों को नक्कार दिया है। सही मायने में भारतीय सेक्युलर भांड इतने बड़े वाले वो हैं, कि क्या कहना।जबकि हकीकत ये है कि पाकिस्तानी सेना ही आतंकी मानसिकता की है। वहां जनता की क्या औकात जो वो आतंकियों को नक्कार दे। किसी जमाने में हमारे सेक्युलर भांडों ने हिन्दी-चीनी भाई-भाई के नारे पर भी मटक-मटक कर कमर लचकाई थी। नतीजा क्या नि…