Kanpur Yatra यात्रा पुराण(3)........... छात्रों की मजबूरी और चांदी कूटते लोग

आप सभी को क्रिसमस की हार्दिक बधाई  
देश में बहुत कुछ हो रहा है। उस पर फिर कभी। हालांकि हर यात्रा अनेक कड़वी हकीकत औऱ जीवन के रंग से रुबरु कराती है। ऐसी ही एक यात्रा के जरिए मैने जीवन के जो रंग देखे उसे आप भी देखें। 

गतांक से आगे
छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाने की कमीनी सोच
राम-राम करते आंखे खोलते-बंद करते मैं पहुंचा कानपुर। उसके बाद मुज़फ्फर भाई को फोन लगाया, पर उत्तर नदारद। मुझे लगा शायद सो रहे होंगे। सो उनके बताए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए पहुंच गया विजयनगर चोराहे। पर वहां से भी फोन नहीं उठाया गया तो सख्त हैरानी हुई। लगा कि शायद वो रामपुर चले गए होंगे। कुछ देर बाद दुबारा फोन लगाने  का इरादा करके मैं वहीं कोने पर बने ढाबे पर चाय पीने को बैठ गया। मुझे क्या पता था कि जहां सुबह की चाय की चुस्की लेना बैठूंगा, वहीं कोई कड़वी हकीकत मुझसे रुबरू होना चाहती है, शायद इसलिए भी बिरादर का फोन नहीं लगा हो..
थोड़ी देर बाद फिर फोन लगाया, उत्तर फिर नदारद। लगा की फ्री का ठिकाना किस्मत में नहीं है। हार कर दिल्ली फोन लगाया एक जानकार को।
दुकानदार फोन पर मेरी बातचीत पर कान गड़ाए बैठा था। फोन करके चाय पीने बैठा ही था कि वो बोला...
भाई साहब हमारे यहां कुछ कमरे हैं जो छात्रों को किराए पर देते हैं, इस वक्त खाली हैं। आपको एक रात ही बितानी है, आप चाहें तो रुक सकते हैं...आप.कमरे देख लीजिए।"
बोला ऐसे जैसे एहसान कर रहा हो...शुरु में मुझे भी ऐसा ही लगा...हालांकि सुबह-सुबह बैठे-बिठाए ग्राहक मिलने की खुशी वो छुपा नहीं पा रहा था।
दुकानदार के कहने पर मैने कमरे का जायजा लिया। पर जायजा लेते ही दिमाग घूम गया। वो कमरे थे या कबूतरखाने। 
मुश्किल से आठ बाई छह साइज..एक चौकी बिना गद्दे की...एक टेबल-कुर्सी....और सिर पर लटका पंखा। एक ही लाइन से बने एक जैसे छह कमरे। कमरों के एक कोने में एक बाथरुम।
दुकानदार शायद मेरे चेहरे के भाव पढ़ रहा था। बोला..
 भाई साहब छात्रों को पढ़ना ही तो है। उनके लिए इससे ज्यादा कि क्या जरुरत है।
श्वान निद्रा....बको ध्यानम्...श्लोक स्मरण हो आया...
पवित्र श्लोक के ऐसे कलियुगी साक्षात अनुवाद को देख कर मन किया कि उसे वहीं पकड़ कर धो दूं। पर चुप रहना पड़ा। एक तो शहर अपना नहीं..दूसरा ऐसे उदाहरण तो देश भर में भरे पड़े हैं..किस-किस को समझाएं..किस-किस से लड़ें। पहले ही कम मुसीबत मोल नहीं ले रखी है मैने.।
खैर कानपुर पढ़ने के लिए आने वाले छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाने की उसकी घटिया सोच से घिन हो आई। हालांकी वहां इतनी जगह थी कि अगर वो चाहता तो कमरों की चौड़ाई बढ़ सकती थी। दो-तीन एक्ट्रा बाथरुम बन सकते थे। 
पर दूसरे की मजबूरी से फायदा हो रहा हो और बिना कुछ खास किए चांदी कूटने का मौका मिल रहो तो कौन छोड़ता है। ऐसे में किसी को दूसरों के आराम से क्या लेना-देना।
तभी दुकानदार ने पूछा
क्या पास की दुकान से गद्दा मंगा दूं।
"नहीं रहने दो" सोच के दायरे से बाहर आते मैं बोला...
मूड चौपट हो चुका था सो सोचा कि जब एक ही रात ठहरना है तो समझौता क्यॉं करुं।
पर तभी दिमाग में दुकानदार का कलेजा फूंकने का आईडिया उछल-कूद मचाने लगा.....
हमने उस पर अमल किया औऱ उसी से शहर मे ठहरने के ठिकानों के बारे में पूछना शुरू कर दिया। पर हमारे दिमाग में ये नहीं आया कि जहां बारात ठहरेगी, वो भी एक होटल है। वहीं ठिकाना बनाना बेहतर होगा। सच ही है दूसरो को तड़पाने के चक्कर में अपने भले की बात भी खुद के भेजे में नहीं आती। 

फ्री में एक नेक नसीहत 
(सार्वजनिक हित में जारी...ये नेक राय सभी फ्री में ले सकते हैं)
चाय के इंतजार में दुबारा फोन ट्राई किया। इस बार घंटी बजते ही फोन रिसिव होने से मेरी जान में जान लौटी। किस्मत ने एक प्रेमिका के शहर में ठिकाने की खोज में भटकने की लानत से बचा लिया। ये अलग बात है कि उसके बाद भी मैं भटका, पर इत्मिनान से। 
थोड़ी देर में भाईजान आ पहुंचे रिक्शे पर सवार होकर। नमाज वाली ड्रेस पहने ही। हमने बिना देर किए फोन न उठाने का ताना टिका दिया। 
वो मुस्कुरा उठे। बोले....
फोन साइलेंस पर था। उसके बाद नहा धोकर नमाज पढ़ रहा था। पढने के फोन पर नजर गई तो उसे तुरंत रिसिव किया।"
हालांकि उनकी ड्रेस देखकर अपुन समझ ही गए थे।
उसी निश्छल मुस्कुराहट के साथ उन्होंने एक नेक राय दी.....
"कभी भी कहीं भी जाने से पहले जिसके पास जा रहे हों, उन्हें फोन करके एक बार फिर याद दिला देना चाहिए। मान लो किसी जरुरी काम से मेजबान को कहीं जाना पड़े तो..कम से कम कुछ इंतजाम तो हो सकता है न.।"
बात तो मेरी समझ में आ गई थी। पर लाख टके का सवाल ये है कि क्या इस पर अमल कर पाउंगा कभी मैं। आज तक तो अमल हो नहीं सका है।
आदत को देखते हुए कुछ कहना भी मुहाल है। उसपर ये आदत अनुवांशिक हैं, यानि अपने पिताश्री से मुझे विरासत में मिली है। वो काम की वजह से देर करते थे, औऱ मुझे वैसे ही हो जाती है।

खैर उनके यहां टिकने पर ध्यान आय़ा कि हमारे फोन की बैटरी आधी हो चुकी है। मगर उनका फोन देखकर चार्जर मिलने की उम्मीद कम ही थी। सो हमने पूछा ही नहीं। न पूछने का नतीजा बाद में भुगता..उसके बाद तैयार होने के बाद शहर में कितना औऱ कैसे-कैसे विचारों के साथ भटका.....क्या देखा इसका...क्या महसूस किया....वो जिक्र तो अपनी कानपुर की कविता में कर ही चुका हूं..। अब रह गई शादी.तो उसका जिक्र आगे आखिर कड़ी में....  (क्रमशः दो दिन के लिए)

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