मंगलवार, अप्रैल 24, 2012

हर हाल में घर आना होगा लाडो(2)_...Rohit

"भय बिन न होत प्रीति"
     ...अबतक हम लोग पाशाचात्य, प्राचीन भारतीय और गुलामी के 1000 साल के बीच उपजे समाजिक विचारों के बीच झूल रहे हैं। अगर सूक्ष्मता से देखें तो प्राचीन भारतीय परंपरा कई जगह पाशाचात्य विचारों को पछाड़ देती है। फिर ऐसा क्या हो गया जो आदिशक्ति को पूजने वाले समाज में अचानक बच्चियो के हत्यारे पैदा हो गए? वैसे ये जानने के लिए किसी बड़ी भारी रिसर्च की जरुरत नहीं है। हर आम शख्स जो अपने देश को जानता है वो भी इसका उत्तर जानता है। मगर इस वक्त सबसे बड़ा सवाल ये है कि इन सब पर फिलहाल काबू कैसे पाया जाए? इसका पहला उत्तर ये है कि कड़े कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाए। अपराधी को त्वारित दंडित किया जाए।
   अंग्रेजों के बने कानून से उनके ही राज में सती प्रथा बंद हुई या नहीं। हालांकि न्यायालय इस मसले पर काफी सख्त हैं। पर जबतक न्य़ायालयों पर काम का बोझ रहेगा....अपराधी को दंडित करने में देरी होती रहेगी। एक कहावत है कि देरी से मिला न्याय न्याय नहीं रह जाता। तो इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार है? अदालतें इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। न्यायालयों में पहले से ही केसों की भरमार हैं। न्यायाधिशों के कई पद खाली हैं। ऐसे में जल्दी न्याय कई बार सपना सा रह जाता है। अब ये काम पूरी तरह से सरकार का है। मगर सरकारी कि प्राथमिकता की लिस्ट में इसका नंबर नहीं है।
   रामायण में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है भय बिन न होए प्रीति। मगर आज राजदंड का भय कम होता जा रहा है। जब कानून का भय कम होता है तो अपराध तो बढ़ेंगे ही। लोकतांत्रिक देश में कानून का समान राज ही समाज को दिशा दे सकता है औऱ अपराध पर काबू पा सकता है। मगर अभी अपराध के सिद्द होने में ही इतना समय लग जाता है कि कोई और बच्ची तब तक लड़के की चाहत में मार दी जाती है या कूड़े के ढेर में फेंक दी जाती है।
    कानून के काम में तेजी और समाज की विचारधार बदलने के लिए युद्धस्तर पर कोशिश की जानी होगी। आखिर कानून के भय के कारण सती प्रथा बंद हुई...विधवा विवाह के लिए युद्धस्तर पर कोशिशों का नतीजा है कि फिलहाल विधवा विवाह होने पर अब बवाल नहीं मचता। विधवाओं की तीर्थस्थानों में भीड़ एक अलग मसला है। कुछ ऐसा ही जैसा की बुजुर्गों के आश्रम शहरों में ज्यादा बनने की तरह ही। समाज इक्सवीं सदी में जा रहा है। मगर दिमाग मध्यकाल से निकल नहीं पा रहा है। सनातन परंपरा को लेकर असमंजस की स्थिती है। जाहिर है कि मंथन के इस दौर में वो तरीके निकालने होंगे जो दिमाग में जमी धूल को साफ कर सके..(क्रमश:..जारी है)

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...