शुक्रवार, अप्रैल 06, 2012

Parveen Babi...अकेले हैं तो गम है?

   परसों यानि 4 अप्रैल को जन्मदिन था परवीन बॉबी का..याद है आपको परवीन बॉबी..बोल्ड, बिंदास, सेक्सी, मॉर्डन परवीन बॉबी....। हिंदी फिल्मों की हीरोइन के स्टाइल को डंके की चोट पर बदलने वाली...बड़ी-बड़ी बोलती आंखें....रेशमी जुल्फें...लंबा कद..गोरा रंग...चेहरे पर खिली रहने वाली रहस्यमय मुस्कुराहट....। परवीन और जीनत वो अभिनेत्रियां थी जिन्होंने हिंदी फिल्मो में ग्लैमर को मुकाम दिलाया। वरना इससे पहले ग्लैमर ज्यादातर वैंप यानि खलनायिका नुमा किसी अभिनेत्री के जिम्मे होता था। सत्तर का दशक हिंदी फिल्मी दुनिया में सौंन्दर्य के मानक बदलने का दौर था। यानि सौंन्दर्य के बदलते दौर में जब वेस्टर्न स्टाइल ने पर्दे पर हलचल मचानी शुरु की..उसी दौर में जूनागढ़ से चलकर हिंदी फिल्मों पर राज करने आईं थीं ग्लैमरस परवीन बॉबी.....।
     उस दौर पर नजर गड़ाता हूं तो मैं दंग रह जाता हूं...आखिर वो कितने परिवर्तन का दौर था। आजादी के बाद का आशावाद दम तोड़ रहा था। राजनीति इंदिरा गांधी के साथ ही पूरी तरह से बदल चुकी थी। समाज करवट ले रहा था। पश्चिम का असर समाज के नए तबके पर पड़ चुका था। भले ही बंगाल में समाजवादी सत्ता में आ रहे थे। पर बाकी सारा देश समाजवाद के आदर्श को दम तोड़ते देख रहा था। बुजुर्ग जयप्रकाश नारायण भष्ट्राचार के खिलाफ जंग फूंक रहे थे।
     इसी समय में फिल्में भी बदल रही थी। यही वो दौर था जब फिल्मी पर्दे पर एंग्री यंग मैन के तौर पर महानायक अमिताभ बच्चन का अवतार हो रहा था...समाज को पर्दे पर नया नायक दिख रहा था…जो विध्वंस से नए निर्माण की इबारत लिखने की बात कर रहा था। इसी दौर में नायिकाएं भी बदल रहीं थीं। नायिकाएं अब स्टार होने लगी थीं...और रोने-धोने और आंसू बहाने वाली नायिकाओं की छवि को तोड़कर बोल्ड एंड ब्यूटीफूल हो रहीं थी।
     दरअसल परवीन जब अहमदाबाद यूनिवर्सिटी की स्टूंडेंट थी तभी उनपर प्रसिद्ध निमार्ता-निर्देशक बी. आर. इशारा की नजर पड़ी...मिनी स्कर्ट पहने और हाथ में सिगरेट ली हुईं परवीन बॉबी...इशारा को परवीन इतनी पंसद आईं कि उन्होंने अपनी फिल्म “चरित्र” में क्रिकेटर सलीम दुर्रानी के साथ उन्हें साइन कर लिया...। भले ही फिल्म और दुर्रानी फ्लॉप रहे..पर परवीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। चरित्र के बाद आई परवीन बॉबी की दूसरी फिल्म धुंए की लकीर भी फ्लॉप रही...पर फिल्म के गाने "तेरी झील सी गहरी आँखों में" ने रंग जमा दिया..।
     इसे भी इत्तफाक कहें कि केरियर के शुरु में ही 1974 में परवीन बॉबी की अमिताभ के साथ आई फिल्म मजबूर..जिसने ग्लैमरस परवीन बॉबी को हिट हीरोइन का तमगा भी दिला दिया। अब इसे किस्मत ही कहना होगा कि अपने शुरुआत में ही परवीन बॉबी इस यंग एंग्री मैन को उसी के स्टाइल में टक्कर दे रही थी..बैलोस, बैख़ौफ..बेबाक। यानि ट्रैंड बदल रहा था।
    1975 में आई यश चोपड़ा की दीवार...जिसमें अमिताभ के रुतबे को वन टू टैन तक स्थापित कर दिया। परवीन बाबी दूसरी बार सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ नजर आईं इस फिल्म में...और उन्होंने एक झटके में हिंदी फिल्मों की हीरोईन का गेटअप बदल दिया। एक हाथ में जलती सिगरेट...दूसरे हाथ में छलकता जाम...बिना शादी के पार्टनर के साथ फिजिकल रिलेशन बनाती...एक बिन ब्याही मां...। फिल्म के साथ ही हसीन चेहरे, लंबी छरहरी काया, रेशमी जुल्फों और बड़ी आंखों वाली परवीन बॉबी की रहस्मयी मुस्कुराहट में फिल्म इंडस्ट्री ऐसी मदहोश हुई की पूछिए मत।  हिंदी फिल्मों की बदलती इस तस्वीर को इंटरनेशनल मैगजीन टाइम ने भी माना। 1976 में टाइम ने परवीन बॉबी को हिंदी फिल्मों के बदलते चेहरे के तौर पर अपने कवर पेज पर जगह दी.....
       अमर-अकबर-एंथनी...ने अमिताभ और परवीन की जोड़ी को हाटेस्ट जोड़ी बना दिया। फिल्म नमकहाल में हालांकि अमिताभ के अपोजिट परवीन नहीं थी...पर जब फिल्म में परवीन बॉबी ने "रात बाकी,,बात बाकी."...गाते हुए कैबरे किया...तो दर्शकों की सांसे अटक गई थीं..इसी फिल्म के दुसरे गीत "जवानी जानेमन हसीं दिलरुबा" ने भी कम नींदे नहीं उड़ाई थीं...दोनों गीतों का जलवा आज तीस साल बाद भी कायम है..।
     कहते हैं कि कई लोगो की ग्लैमरस जिंदगी के पीछे एक दर्दनाक सच्चाई छुपी होती है। यही तल्ख हकीकत परवीन बॉबी की जिंदगी का सच भी है। परवीन बॉबी अपनी सफलता के चरम में ही मनोरग का शिकार हो गईं थी..ये भी एक बड़ा कारण था परवीन बॉबी के दुखदाई जीवन का। जितना पर्दे पर वो बोल्ड और बिंदास थीं...निजी जीवन में उतनी ही अकेली। यही अकेलापन शायद उन्हें ले डूबा। डैनी, महेश भट्ट, कबीर बेदी जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ उस दौर में वो लिव-इन में रही। मगर परवीन जिंदगी में कभी ऐसा जीवनसाथी नहीं पा सकीं जो हर कदम पर..हर हाल में उनके साथ रहता। ज्यादा लाइम लाइट और सक्सेस परवीन बॉबी की दुश्मन बन गई।
      वैसे भी ये कड़वी सच्चाई है कि अपनी शर्तों पर जीते इंसान को...उसमें भी खासतौर से एक लड़की को समाज इतनी आसानी से पचा भी नहीं पाता। समाज कितना भी आगे बढ़ गया हो...पर हालात जस के तस हैं। भारतीय समाज आज भी पाश्चात्य और भारतीय मूल्यों के बीच संमन्वय बनाने के लिए जूझ रहा है। ऐसे में अक्सर अपनी शर्तों पर जीते लोगों को...चाहे वो परवीन बॉबी जैसी सक्सेसपुल स्टार भी क्यों न हों...अधिकतर जीना भी अकेले पड़ता है....जूझना भी अकेले पड़ता है...और मरना भी अकेले ही पड़ता है। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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