मंगलवार, अप्रैल 17, 2012

हर हाल में घर आना होगा लाडो..रोहित

     एक के बाद एक बच्चियों के साथ बर्बरता भरा व्यवहार समाज की आंख खोलने के लिए काफी है। दो बच्चियों को सिर्फ इसलिए जान देनी पड़ी की वो लड़के की जगह पैदा हो गईं। बंगलूरु की बच्ची आफरिन को उसी के बाप ने सिगरेट से दागा। महज इसलिए कि उसे लड़का चाहिए था। कल ही गुड़गांव में महज डेढ़ महीने की बच्ची अस्पताल में कोई छोड़ गया।
      वैसे इस तरह की घटनाएं पहले कम प्रकाश में आती थी। अगर आती भी थीं तो लोग इसे भूल जाते थे। पहले इस तरह की घटनाएं दबी रह जाती थीं या एक इलाके की घटना पूरे देश की खबर नहीं बन पाती थी....मगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार की वजह से अब लोगो को जल्दी पता चला जाता है।
      ये सारी घटनाएं इस तरफ इशारा कर रही हैं कि अभी भी अधिकतर लोगों की सोच में बदलाव नहीं आया है। डेढ़ सदी से भारत में हो रहे समाजिक और राजनीतिक प्रयास अब तक उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाएं हैं जहां खड़े होकर हम गर्व से कह सकें की हम पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं। बच्चियां सिर उठा कर कहे सकें कि वो गार्गी औऱ मैत्रयी के देश से है। देश के किस प्रदेश की बात करें ओर किसकी नहीं, हर जगह यही हाल है, कहीं ज्यादा तो कहीं कम।
     आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी तक के प्रयासों ने असर तो किया, पर अभी भी आमूलचूल परिवर्तन बहूत दूर है। जिन कारणों से ये सब भारत में शुरु हुआ वो अब तक पूरी नहीं गायब नहीं हुए हैं...और यह कुरीतियाँ तब तक दूर नहीं होंगी जब तक खुद महिलायें खुल कर इसके खिलाफ जंग नहीं करेंगी      “दूधो पूतो फलों” के आशिर्वाद में लड़कियों को जगह देनी होगी। इस सबके लिए सिर्फ आदमी ही दोषी नहीं है। बंगलुरू की बच्ची आफरीन की मां के अनुसार उसे सास ने कह दिया था कि अगर बेटा पैदा नहीं हुआ तो वो उसे घर से निकाल देगी। अब ऐसी मानसिकता में पले आदमी से उम्मीद क्या की जा सकती है।
    देश में आज भौतिक रुप से स्त्री आगे बढ़ रही है...राजनीति हो..सेना हो..प्रशासनिक सेवा हो..या कोई भी फील्ड हर जगह स्त्री परचम फहरा रही है। सब जगह हर कोई अपनी योग्यता से आगे बढ़ रहा है..पर आज जरुरत है मानसिक स्वतंत्रता की। शारीरिक और आर्थिक स्वतंत्रता ही नारी मुक्ति का आखिरी मार्ग नहीं है। अगर ऐसा होता तो आफरिन को मरना नहीं पड़ता और न ही किसी अस्पताल, मंदिर-मस्जिद में कोई बच्ची फेंकी हुई मिलती।
     हर वर्ग में बदलाव आया है..मगर उसकी सच्चाई क्या है, ये सब जानते हैं। दरअसल बदलाव सिर्फ इतना है कि अब लड़की होने पर खुलकर मातम नहीं मनाया जाता। अगर किसी के यहां पहली लड़की होती है तो उसका स्वागत तो होता है....मगर दूसरी संतान के तौर पर सब आशा करते हैं कि लड़का ही हो। यहां तक कि इसके लिए गर्भपात कराने से भी कोई बाज नहीं आता। इस मामले में कई जगह औऱतें भी कम नहीं होती। सास को पोता चाहिए...पोती नहीं। मां को बूढ़ापे का सहारा चाहिए....पराया धन नहीं। ...(क्रमश:...यानि जारी है)

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...