शनिवार, मई 19, 2012

जय मां, जय सिनेमा...जय संसद..Rohit

       दिन गुजरते हैं..लोग आते हैं...जाते हैं और इतिहास बनता जाता है। संसद सत्र के साठ साल पूरे हुए.....सिनेमा भी सौ साल का हो गया....मदर्स डे भी गुजर गया...हर तरफ इन तीनों चीज की धूम थी....साठवें सत्र में हर सांसद बोलना चाहता था....कोई ज्यादा...तो कोई कम...ख्वाहिश ऐतिहासिक मौके के सत्र में अपना नाम दर्ज कराने की...सिनेमा के सौ साल भी पूरे हुए...और सिनेमा से ही चलकर एक और दिग्गज अभिनेत्री रहस्यमयी रेखा सांसद मनोनित हुईं...हर जगह माताओं को याद किया..सिनेमा के पर्दे की मां की हर तरफ धूम नजर आई...याद संसद ने भी किया...एक सासंद बोले...""हमने दिवंगत महान लोगो को श्रद्धांजलि दी..पर जिंदा लीजेंड को हम याद नही करते""....कितनी सही बात कही सासंद महोदय ने...सौ साल पहले दादा साहब फाल्के ने पहली फिल्म रिलिज की..पर जीतेजी ही भूला दिए गए....40 के दशक में जब दादा फाल्के चिर निद्रा में सोए तो चंद लोग ही साथ थे....किन हालात में मरे ये तब कई सितारे जानते तक न थे....आज उनके नाम पर फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा सम्मान दिया जाता है...यही समय का चमत्कार है।

      दादा फाल्के के साथ ही याद आ गए...हिंदी के उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद...आज भी सबसे ज्य़ादा बिकने वाले हिंदी लेखकों में शुमार....जब उनकी मौत हुई तो कांधा देने के लिए...कहते हैं चार लोग भी नहीं थे....दुर्भाग्य देखिए उनके साथ रहने वाले वो चंद नाम भी भूल रहा हूं....प्रेमचंद जब तक जिंदा थे..आर्थिक स्थिती खराब रही...फिल्मी दुनिया रास नहीं आई..सो छोड़ दी....पर उनके स्वर्गारोहन के बाद....उनकी किताबों की बिक्री से कई लोगो ने कमाया....शायद मां लक्ष्मी भी लेखकों पर जल्दी मेहरबान नहीं होतीं...खासतौर पर हिंदी लेखकों पर..लंदन में शेक्सपीयर का मकान देखिए.....फ्री में अंदर जाने की इजाजत नही....मगर हिंदुस्तान में प्रेमचंद के मकान में जाने की सोचिए मत...

      मदर्स डे...माताओं का दिन....आजाद है भारत माता....ये सौभाग्य है...पर वो त्रस्त है भ्रष्टाचार से....जाहिर है जब सबसे बड़ी मां बदहाल है तो भारत की माताओं कि दशा के बारे में क्या सोंचें। आज भी वो कुपोषित है...ऐसे में बचपन कैसे स्वस्थ होगा....जब बच्चियो से जीने का हक गर्भ में आते ही छीन भी लिया जाता हो...तो आने वाली नस्लें अकेले रहने के लिए अभिशप्त होगीं हीं..क्या करें...जब मां ही स्वस्थ नहीं...शिक्षित नहीं...तो बागडोर संभालने वाला भविष्य कैसे तैयार होगा...विचारणीय है..

    संसद....सभी कानूनों की जननी है...यानि कानून जन्म देने वाली मां......हाल क्या है..बदहाल है....खैर...सिनेमा की हर मां याद है.....करगिल के शहीदों की मां कुछ को ही याद हैं...जाहिर है संसद मे कुछ नेता बढ़िया बोलते हैं.....बिंदास बोलते हैं.....पर वो भी क्या करें...नक्कारखाने में तूती की तरह उनकी बात रह जाती है....हम सुनते भी तो नहीं..पर हां हल्ला मचाते जरुर हैं..

       चलिए सिनेमा के सौ साल के बहाने सही....नींव के पत्थरों को याद तो किया...साठ साल संसद के सत्र होने की वजह से पता तो चला कि हर सांसद सिर्फ शोर नहीं मचाता.....मदर्स डे ने याद तो कराया कि घर में भी मां हैं.....सिनेमा में भी मां है...कई मां कुपोषित हैं....और इन सबसे भी बड़ी स्वर्ग से भी बढ़कर जन्मभूमि भारत मां भी परेशान हैं....जब याद किया है तो शायद कुछ कर पाएं....हम औऱ आप...जय हिंद

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...