मंगलवार, जून 12, 2012

हर रोटी का सवाल है

  • “एक सरकारी सर्वे की रिपोर्ट-शहरों की शादियों में करीब 58000 करोड़ का खाना होता है बर्बाद”
  • “इससे कहीं ज्यादा सरकारी गोदाम में अनाज सड़ जाता है”
  • “20-30 करोड़ लोग रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं”
  • “गोदाम में सड़ते अनाज को गरीबों तक पहुंचाने की उचित व्यवस्था नहीं है”
  • “दिल्ली सरकार ऐसी योजना बना रही है जहां गरीबों को खाना मिले...और फ्रीजर की व्यवस्था होने   पर होटलों और शादियों में बचे खाना को मंगाया जाएगा”
  • “रिकॉर्ड तोड़ खाद्य उत्पादन होने के बाद भी हर चौथा भारतीय भूखा”
    ये एक ऐसा विरोधाभाष है जिसे पढ़कर न तो हमें शर्म आती है, न ही सरकार को। कुछ मंत्री चिंता जताते हैं, तो बाकी ये सोच कर चुप हो जाते हैं कि ये उनके मंत्रालय का काम नहीं है। उधर जनता का अधिकांश हिस्सा शिकायत करने से ज्यादा कुछ नहीं करता।
       अजीब स्थिती है। जो लोग काम करते हैं उन्हें पूरी ईमानदारी से सरकारी सहायता नहीं मिलती। न ही आम जनता का ज्यादा समर्थन मिलता है और जो लोग पैसा देते भी हैं...वो ये देखने की जहमत नहीं उठाते कि उनका दिया पैसा कहां जा रहा है? हालात ये है कि गली-नुक्कड़ पर पिज्जा-चाउमिन आसानी से मिल रहा है, पर खाने की थाली में खाना कम होता जा रहा है। कुपोषण के मामले में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ्रीका के कुछ देशों से भी बदतर स्थिती में है हमारा देश।
     आखिर हम जा कहां रहे हैं? क्या कुछ देर रुक कर हम सोचेंगे? क्या य़े जरुरी है कि झूठी शान के लिए शादी में जरुरत से ज्यादा लोगो को बुलाया जाए? हम खाना बनवाते वक्त आखिर ये क्यों नहीं सोचते कि बचे खाने का क्या होगा? अगर जरा सा हम सजग हों तो क्या ये खाना सही लोगो तक नहीं पहुंचेगा?
     ये भी एक कड़वा सच है कई बार समाजिक लोगो की शादी में काफी लोग आ जाते हैं। ऐसे में गेस्ट कंट्रोल जैसा कानून भी पूरी तरह से उचित नहीं लगता, लेकिन खाने की बर्बादी को रोकने का कानून जरुर लागू किया जा सकता है। जिसपर हम अमल कर सकते हैं। हमें शादी के बाद के बचे खाने को ले जाने वाली एजेंसियों औऱ एनजीओ का पता मालूम होना चाहिए। हमारी आधी समस्या हल हो जाएगी।
  • तो क्या हम लोग इतना भी नही कर सकते...
  • क्या देश के भूखे लोगो के लिए हमारा कोई कर्तव्य नहीं है?
  • क्या डेढ़ लाख से ज्यादा करोड़पतियों के देश में बीस करोड़ लोगो का भूखे रहना इन करोड़पतियों के लिए शर्म की बात नहीं है? 
   सिर्फ सरकार कुछ नहीं कर सकती। ऐसे मामलों मे जनता का सक्रिय योगदान होना जरुरी है। आंकड़े बताते हैं सरकार की अच्छी योजनाओं में जनता के सहयोग का अभाव होता है। इन योजनाओं में पलीता का कारण सरकारी कर्मचारियों की उदासीनता जितनी जिम्मेदार है, उतनी ही लोगो की वो गलत सोच भी है जो मानती है कि सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज पर ही रहती है। हमें इस सोच से उबरना होगा। एक सामूहिक समाजिक प्रयास भूखे भारत को खाना खिला सकता है। औऱतों को कुपोषण से बचा सकता है। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...