शनिवार, जून 30, 2012

पाकिस्तान में हैं कहां हुकुमत ?

"सरबजीत रिहा होगा, अरे नहीं सरबजीत नहीं, सुरजीत रिहा होगा...नाम की वजह से गलती हुई”
ये उल्टबांसी पाकिस्तान सरकार की है,,,पाकिस्तानी हुकुमत के पीछे का सच जानने वाले पाकिस्तान की पलटबाजी पर हैरान नहीं है। हकीकत ये है कि आप लाख सिर पटक लें समझ नहीं पाएंगे कि पाकिस्तानी हुकुमत किसे कहें। ऐसे में हमारे देश के हुक्मरान करें भी तो क्या करें। जिस तरह से  सरबजीत की रिहाई की खबर आते ही पाकिस्तानी सेना और इस्लामी कट्टरवादी संगठन और आतंकवादियों के हिमायती उछलकूद मचाने लगे...उससे जरदारी साहब की हुकुमत की सांस हलक में अटक गई और मजबूरन उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़ गए। सरकारी की इस पलटबाजी से खुद पाकिस्तानी मीडिया हैरान हो गया। वैसे शुरु में इस खबर के आते ही भारत में पाकिस्तान का सच जानने वाले हैरान थे..कि आखिर ये इतनी आसानी से कैसे संभव हो गया...पर जब पाकिस्तानी कट्टरवादियों और आतंकवादियों की नौटंकी शुरु हुई तब कोई हैरान नहीं हुआ। सबको पता था कि जरदारी साहब चाह कर भी भारत से रिश्ते सुधारने की मुहिम को इतनी आसानी से पटरी पर नहीं ला सकते।

कठिन है डगर लोकतंत्र की

पाकिस्तान में आज भी सेना ही सबकी माईबाप है। भले ही सेना अमेरिका के दवाब की वजह से खुलेआम जरदारी हुकुमत पर दवाब नहीं बना पा रही...लेकिन वास्तव में पाकिस्तान के लोकतंत्र की गाड़ी के पीछे सेना बैठी हुई है। पिछली सीट पर बैठी सेना ही तय करती है कि लोकतंत्र की गाड़ी का स्टेयरिंग किधर मुड़ेगा। लोकतंत्र की जो बची-खुची धीमी रफ्तार है...उसपर पाकिस्तानी अदालत अड़ंगा लगाने पर तूली हुई है। वैसे कहा जाता है कि पाकिस्तान की अदालतें सेना के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं। ये सेना ही है जिसकी शह पर आतंकवादियों ने पाकिस्तान का बेड़ा गर्क किया हुआ है..और  आज पाकिस्तान दुनिया भर के आतंकवादियों की पनाहगाह बना हुआ है..इन इस्लामी कट्टरवादियों ने पाकिस्तान को आतंकिस्तान बना रखा है।

पाकिस्तान पर भरोसा करना बेवकूफी

जब पाकिस्तान में जनता का नुमांइदा वजीरे-आजम यानि प्रधानमंत्री संविधान कि दुहाई देते-देते थक जाए..पर न्यायालय न माने को इसे क्या कहेंगे। लोकतंत्र में जनता ही अपने चुने हुए प्रतिनिधी को हटाती है...मगर पाकिस्तान में अदालत ने निर्वाचन आयोग को वजीरे-आजम गिलानी साहब को पद से धक्का देने का आदेश दे दिया है। लोकतंत्रिक सरकार सेना और न्यायालय के आगे लाचार दिखती है। ऐसे में भारत में कोई जब पाकिस्तान पर भरोसा करने की बात करता है तो कलेजा कलस जाता है। शायद वो मुंबई हमला भूल जाते हैं।
       मुंबई पर हमले के वक्त पाकिस्तानी विदेशमंत्री भारत में थे..हमले की खबर से वो हक्केबक्के से थे। उन्होंने तुरंत कहा था कि आईएसआई प्रमुख पाशा को भारत भेजा जाएगा..। इस बयान के आते ही लोग हैरान भी हो गए थे। आईएसआई के सर्वेसर्वा पाशा लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधि का आदेश मानंगे..इस पर सबको शक था। हुआ भी वही...पाकिस्तान पहुचते ही मंत्री महोदय की गुद्दी पर बंदूक रख दी गई और उनकी घिग्घी बंध गई। बाद के दिनों में भारत की बातचीत बहाल करने पर यही विदेशमंत्री चीखने लगे थे भारत को उनकी जरुरत है न कि पाकिस्तान को भारत की। जब ऐसे लोग लोकतंत्र में होंगे तो पाकिस्तान में लोकतंत्र जड़ जमा ही नहीं सकता। वैसे भी कट्टरवादियों पर लगाम लगाना ऐसे लोगो के बस की बात नहीं है। ऐसे में जो लोग पाकिस्तान पर भरोसे की बात करते हैं उनको लानत है।

पाकिस्तानी नागिरक संस्थाएं

पाकिस्तान में लोकतंत्र की सांस किसी तरह चल रही है..लेकिन पाकिस्तानी आवाम और नागरिक संस्थाएं इतनी ताकतवर नहीं जो मिस्र की तरह सेना के खिलाफ खुलकर सड़क पर आ सकें। इन हालात में जो नागरिक संस्थाएं औऱ मानवाधिकार संगठन पाकिस्तान में मर-मर कर चल रही हैं उन्हें चलाने वालों के साहस को सलाम है। वैसे इतना तो तय है कि कट्टरवादियों कि वजह से निक्कमे और जाहिल लोग पाकिस्तान में अमनपंसद लोगों को आसानी से कामयाब होने नहीं देंगे।

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