सोमवार, जून 18, 2012

आमसहमति के बहाने ? .... Rohit

जाने क्यों हम लोग हर बार ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि हमारे बीच सबकुछ ठीकठाक है। ऐसे में कई बार सहज चीजों पर भी सवाल उठने लगते हैं। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। लोकतंत्र में चुनाव लड़ना एक सहज प्रक्रिया है। ऐसे में राष्ट्रपति पद की गरिमा के नाम पर आमसहमति बनाने का ढोंग हम क्यों कर रहे है। लग ऐसे रहा है जैसे ये कोई जोड़तोड़ हो। लोकतंत्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनाव का होना उसके जीवंत होने की निशानी है। ऐसे में खासकर मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी का पसोपेश समझ से परे है। ये ठीक है की राजनीतिक समीकरण कांग्रेस या बीजेपी के पक्ष में नही है। दोनों ही राष्ट्रीय पार्टीयां सहयोगियों के आगे मजबूर सी हैं। वोटो का गणित कांग्रेस या बीजेपी गठबंधन के पक्ष में नहीं है।
      हालात ये है कि आम सहमति के राग से उल्टा राष्ट्रपति पद की गरिमा घट रही है। इससे जनता में गलत संदेश जा रहा है। लग रहा है कि विपक्ष उपराष्ट्रपति पद पर अपना आदमी बैठाना चाहता है, इसलिए खुलकर यूपीए यानि कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुख़र्जी का समर्थन नहीं कर रहा है। तो क्या जनता में ऐसा संदेश जाना इस पद गरीमा को बढ़ाएगा? वैसे इस चुनाव में कोई व्हिप जारी नहीं होता। यानि किसी पार्टी का सांसद या विधायक पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं देता तो भी उसपर दलबदल कानून लागू नहीं होता।
      देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए चुनाव का होना पद की गरीमा को बढ़ाएगा ही, न की घटाएगा। अगर चुनाव हो जाएगा तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा। कुछ लोगों का कहना है कि आम सहमति से चुनाव का खर्च बच जाएगा। बात कुछ हद तक ठीक है...पर बड़े-बड़े घोटाले, लेट होते प्रोजेक्ट से बढ़ती लागत, अनावश्यक विदेशी दौरे और अवैध खनन से जो चूना जनता के खजाने पर लग रहा है...क्या उसकी तुलना में राष्ट्रपति पद के चुनाव का खर्च ज्यादा है? अगर इनसब घोटालों से आधा पैसा भी बच जाए...तो देश की स्थिती सुधर जाए। राजनीतिक दलों को इस पद के लिए चुनाव के होने न होने के सवाल को अहम का सवाल नहीं बनाना चाहिए।  उलटा उनके इस राग से जो बवाल मचा हुआ है, वो कई सवाल खड़े कर रहा है। लग रहा है जैसे आम सहमति की आड़ में अपनी बात मंगवाने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसे में है की चुनाव होने दिया जाए।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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