शुक्रवार, जुलाई 06, 2012

अब बरस भी जाओ महाराज....Rohit

रिमझिम गिरे सावन...सुलग-सुलग जाए मन ....आज फिर लगी सावन की वो झड़ी है....घनघन, घनघन घन बरसे मेघा...डम-डम, डिगा-डिगा ये मौसम भींगा-भींगा...हाय ऐसे जाने कितने गानों के साथ मन में उमंगें उठती है पर तुरंत धड़ाम से गिर भी जाती हैं...हो भी क्यों न ऐसा...दिल्ली के आसमां में बादलों का डेरा नजर आता तो है....पर धोखा दे जाता है...हाय री ये मजबूरी..ये मौसम और ये मजबूरी....सच में सावन में ये मजबूरी....दिल कसक-कसक के रह जाता है...उसपर बेईमान मौसम से भी ज्यादा ये झूठे मौसम विभाग वाले.....रोज भविष्यवाणी कर देते हैं और मन बावरा झुमने की तैयारी करने लगता है..पर शायद बादलों को भी मजा आता है तरसाने में....इतना किसी प्रेमिका ने नहीं तरसाया जितना इस बार बेईमान बादल तरसा रहे हैं....दिल्ली के चारों औऱ आकर रिमझिम की झड़ी लगा चुके हैं..पर लगता है जैसे दिल्ली को तरसाना चाहते हैं..तभी तो आसमां में ऐसी छुपनछुपाई खेल रहे हैं जैसी शायद ही बचपन में हमने खेली हो...। हाय कहीं ऐसा तो नहीं दिल्ली के आसपास के ट्रैफिक में फंस गए हों बेचारे बादल....और हम बेकार में बादलों को कोस रहे हैं....मुआ ये ट्रैफिक भी न....हां नहीं तो...।
    खबरों के बीच रोज सारे देश में बारिश कि रिमझिम से लेकर बाढ़ की खबरें मन को भिंगो देती हैं...पर दिल्ली में हम जैसे ही घर से बाहर निकलते हैं...सूरज चाचा सिर पर सवार हो जाते हैं...वो भी बेचारे क्या करें.....बेईमान बादल आते ही नहीं...आते हैं तो तुरंत रफूचक्कर हो जाते हैं। क्या करें सूरज चाचा। अरे बावरे बादलों असम में तो बरस-बरस कर लोगों की जान ले रहे हो....इससे अच्छा है इधर आ जाओ....आखिर दिल्ली में बरसने में क्या परेशानी है....यहां तो ऐसी झलक भी नहीं दिखलाई....अब कोई सड़क से तो आना नहीं...रेल पर चढ़कर तो पहुंचना नहीं...फिर इतनी बेरुखी क्यों बादल भाई....अपनी सेना के साथ आ ही जाओ.....बरस ही जाओ बिना देर किए...सूरज चाचा कितना तपाएंगे हमें....उन्हें भी तो आराम करना है...उनकी तपती किरणों को अपने उपर लो बादल प्यारों.....आ जाओ...।
  हम भी क्या करें..हम भी तो बावरे ठहरे..कितना भी कहें इंतजार करने की आदत नहीं..फिर भी इंतजार तो रहता है...भले ही बारिश की रिमझिम में, ठंडी हवा के झोकों के उठते ही...कई यादें याद आ धमकती हों। फिर भी हे बादलों न करो ठिठोली....दिल्ली को न तरसाओ....और न सही तो कम से कम हमें तो न रुलाओ....हम तो आम आदमी हैं.....गर्मी, सर्दी का खुली बांहों से स्वागत करते हैं...फिर तुम क्यों अटके-अटके से हो...पहले तो रुठते नहीं थे कभी....फिर अब क्या हो गया है?  काहे को तंग कर रहे हो...हम तो खुले दिल और बांहों को फेला कर तुम्हारा स्वागत करते हैं.....तुमसे निकल कर आती बूंदों को हम अपने आगोश में लेने को आतुर रहते हैं....तो हे बादलों आ भी जाओ...बरस भी जाओ अब......

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...