मंगलवार, जुलाई 24, 2012

हां मैने काका का क्रेज देखा है....Rohit

1994 की गर्मियों की एक दुपहरिया….नई दिल्ली की सरोजनी नगर मार्किट....स्वीट शॉप-कम-रेस्टोरेंट खाली-खाली सा....19 वर्षीय नवयुवक यानि मैं मैगजीन में मग्न था।

“एक्सक्यूज मी” .. लगा जैसे हल्की घंटी बजी हो...
खूबसूरत आवाज की मल्लिका को देखने के लिए मैने कांउटर पर बैठे-बैठे नजर उठाई.....नजरें हल्के मैरून रंग की कॉटन साड़ी से होते हुए एक खूबसूरत चेहरे पर जा टिकी....खूबसूरत चेहरे पर दो खूबसूरत आंखें....आंखों में शराफत और कुलिनता का मिलाजुला भाव....और गोद में मुस्कुराता चंद महीने का मासूम....।
“जी कहिए...” मैंने पूछा..।
“एक मसाला डोसा.....” उसने कहा....
मैंने इधर-उधर देखा...दोनो वेटर गायब थे....। शायद खाली दुपहरिया देख निकल लिए थे बाजार घूमने...।
“बाबा....एक मसाला डोसा”...मैने आर्डर देकर उस सुंदरी को थोड़ा इंतजार करने की गुजारिश करते हुए बैठने को कहा।
“ओके” कहकर वो टेबल की तरफ बढ़ी...लगा जैसे कोई राजहंसनी चल रही हो।
चंद सेंकेड गुजरे थे....फिर घंटी सा मधुर स्वर गूंजा....”
सुनिए ये डोसा तो ठंडा है....” सुंदरी के स्वर में हल्की सी नाराजगी का पुट था...।
मैं तुरंत किचन की खिड़की की तरफ घूमा....”बाबा डोसा ठंडा क्यों है?”
“नहीं अभी बनाया ही था..जब मैडम आईं थीं...” डोसा बनाने वाले बुजुर्गवार बोले।
”क्या बाबा....डोसा ठंडा होने में कितनी देर लगती है, बनाकर रखना नहीं चाहिए था न...चलिए दूसरा बनाकर दीजिए” आर्डर देकर मैं सुदंरी की तरफ घूमा....। वो बच्चे को टेबल पर बैठा कर खड़ी हो गई थी।
“बस दो मिनट” मैंने खेद भरे शब्दों में कहा।
कोई बात नहीं“ उनके मुस्कुराते हुए जवाब के बीच अनारदानों सी सुदंर दंतपंक्तियां चमकीं।
अभी मैं उसकी तरफ देख ही रहा था कि बाहर शोर मचा...सबका ध्यान उधर गया....वो सुंदर महिला भी बाहर की तरफ देख रही थी। उसकी आंखों में शोर की वजह जानने की उत्सुकता थी।
“निगम का तोड़फोड़ दस्ता मार्किट में आया हुआ था....” मैं बोला।
समझने वाले अंदाज में सुंदरी का सिर हिल रहा था। तभी बाबा ने गर्म डोसा सर्व किया...। ये देखकर वो राजहंस सी गर्वीली सुंदरी बैठ गई। अचानक दुबारा शोर के साथ-साथ नारे की आवाज भी सुनाई दी..।
“राजेश खन्ना जिंदाबाद.....”
“राजेश खन्ना जिंदाबाद.....”
नारे की आवाज सुनते ही उस सुंदर महिला के चेहरे का रंग तेजी से बदला....अविश्वास से उसकी आंखें औऱ बड़ी हो गईं....उसने पलट कर दुकान के बाहर देखा....उसकी देखादेखी मेरी नजरें भी दुकान के बाहर चली गई। सामने से राजेश खन्ना गुजर रहे थे...उस इलाके के सांसद...मैंने देखा राजेश खन्ना का चेहरा गर्मी की वजह से पूरा लाल टमाटर सा हो गया था। ..उधर वो खूबसूरत महिला सकते की हालत में थी....पर दूसरे ही क्षण उसके गले से दबी-दबी सी चीख निकली.....""""राजेश खन्ना...."""""....पलभर में वो सुंदर महिला सुध-बुध खोकर बावली होकर बाहर दौड़ी....।
मैं हैरान था...इसे क्या हुआ...बच्चा छोड़कर कहां भागी....। तभी बच्चे कि किलकारी मेरे कानों में पड़ी...उसकी खिलखिलाहट ने मां के पैरों को भी रोका..पर सिर्फ पलभर के लिए...वो सुदंरी तेजी से पलटी....बच्चे को गोद में उठाकर बाहर लपकते हुए बोली...”बेटा देख राजेश खन्ना....”
मैं हक्का-बक्का.....। अरे...बच्चा क्या जाने कौन राजेश खन्ना....। इसे क्या हो गया है...अभी तो गर्वीली हंसनी सी चाल थी...और अब किसी पागल सी लपक ली। अपना पर्स भी छोड़ गई। भई राजेश खन्ना ही तो हैं...उनको तो आना ही था...भले ही सुबह मुंबई में थे...पर सासंद तो नई दिल्ली के थे...। तो कौन सी बड़ी बात हो गई...जो ये सुंदरी पागलों जैसा व्यवहार कर रही है....मैं हैरत में खड़ा सोच रहा था।
    थोड़ी देर में वो सुंदरी वापस आई....चेहरे पर जबरदस्त मुस्कुराहट...और आंखों में गजब कि चमक लिए...उसके पैर जमीन पर टिक नहीं रहे थे..लगा जाने कहां खोई हुई है...। किसी तरह चुपचाप कुर्सी पर बैठी.....बच्चे को फिर से टेबल पर बिठाया...। तबतक डोसा ठंडा हो चुका था....पर वो बिना शिकायत धीरे-धीरे ठोसा खाने लगी। मैं अचंभे में उसे ठंडा डोसा खाते देख रहा था। शायद अब इसकी गलती से डोसा ठंडा हुआ है..इसलिए बिना शिकायत खा रही हो...सोचता हुआ मैं अपनी कुर्सी पर बैठा पत्रिका के पन्ने पलटने लगा।
अभी चंद पन्ने ही पलटे थे कि मेरे जेहन को जोर का झटका लगा...मेरे दिमाग में जैसे धमाका सा हुआ....
""ओह गॉड"" तो ये बात है....ये सुपरस्टार राजेश खन्ना का जादू है...काका का स्टारडम...सुपरस्टार का करिश्मा....जो ये राजहंसनी सब भूलकर हिरणी सी कुलांचे भरती भागी.....। आज उसने पहली बार राजेश खन्ना को देखा....वो भी तब...जब काका स्टारडम से कोसो दूर हैं....और तब भी उनका ये जलवा.....
गजब...मैं अपलक उस सुंदरी को देखे जा रहा था....दीवानगी ऐसी की बच्चे को  भी भूल गई....।
.....मेरी नज़र राजेश खन्ना नेता पर थी....सांसद पर थी..जो बीतेजमाने के सुपरस्टार थे....मगर उसी सुंदरी की नज़र में वो शख्स था..शायद जिसे देखकर उसने पहली बार आहें भरी होंगी...जिसने नाम जाने कितनी रातें पलकों में काटी होगी...शायद ये उसका पहला प्यार भी हो...।
जब ये वाकया हुआ....तबतक तोड़फोड़ दस्ता जा चुका था...और राजेश खन्ना अपनी गाड़ी की तरफ जा रहे थे। उस वक्त उस सुदंरी की आयु होगी 35 साल....उससे भी 20 साल पहले यानि काका के स्टारडम के समय शायद 15 साल के आसपास...। मगर काका का जादू उनके फैन पर कायम था..। जो उन्माद औऱ पागलपन लड़कियों में राजेश खन्ना का था...उसका उदारहण सामने था। 
आज उस घटना को 18 साल गुजर चुके हैं.....पर उसके बाद आज तक मैने सूती साड़ी में इतनी तेजी से कुलांचे भरते किसी को नहीं देखा..।
20 साल पहले चंद सेंकेंडो में वो घटना घटी थी..
पर आज एक पूरी एक पोस्ट है...।

""""उस दिन के चंद सेंकेंड के वाकये को पढ़ने के लिए कुछ मिनट लगेगें...
शायद समझने में आपको एकाध और मिनट लगें....क्योंकि चंद सेंकेंड में हजारों क्षण भी होते हैं...और उन क्षणों के अहसास ऐसे होते हैं जो आसानी से शब्दों में नहीं ढलते...।
शायद इसलिए इस पोस्ट को लिखने में घंटे-दर-घंटे लगे..और सबसे साझा करने में पूरा दिन....."""""

सच काका..आपसे आपके फैन कोई नहीं छीन सकता....।
खुद बाबू मोशाय भी नहीं....
भले काका यू Hate Tears…पर आपके अंतिम सफर में बाबू मोशाय भी खूब रोया....आपके अनगिनत फैन की तरह......।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...