शुक्रवार, अगस्त 10, 2012

राम बोलो श्याम बोलो.....Rohit

राम बोलो या श्याम..भारत के जीवन के यही दो आधार

आज फिर जन्म है कान्हा का...भारत के सबसे बडे कर्मयोगी का.....कान्हा कहूं या राम...दोनो ही सनातम धर्म के आधार....एक आधी रात को जन्मे और माता देवकी की गोद से निकल कर जा पहुंचे माता यशोदा के यहां....तो एक बाल रुप में मां कौशल्य़ा की गोद में खेले और युवा होते ही निकल पड़े वन....कहते हैं कि दो ऋषियों ने भगवान को अपने यहां पुत्र के रुप में आने का वर मांगा था....उन ऋषियों में से एक त्रेतायुग में बने राजा दशरथ..औऱ दूसरे बने द्वापर में वासुदेव.....एक जन्म में भगवान ने बचपन बिताया ...तो दूसरे के यहां बचपन के बाद का जीवन.....दोनो जीवन ही देखने में अलग-अलग पर....अंदर से एक...एक तरफ मर्यादा स्थापित करने वाले मर्यादा पुरषोत्तम कहलाए....तो अपने दूसरे अवतार में मर्यादा की रक्षा के लिए इतना काम किया कि सबसे बड़े कर्मयोगी कहलाए....एक तरफ मां सीता के साथ एक पत्नी व्रत निभाया...तो दूसरी तरफ सबके प्रेम का आदर किया...वहीं कर्म के पथ पर प्रेम को न्यौछावर भी दिया...। इन्हीं दोनों के जीवन का पथ है भारतीय दर्शन....भारतीय कर्म का आधार....यानि भारत की आत्मा..। जैसे ही भारतवंशियों ने भगवान राम और कृष्ण के कर्म दर्शन को भुलाया....गुलाम हो गया...पहली गुलामी बनी थी मानसिकता की...फिर हालात ये हो गए कि दूसरे देशों से आए लोगो ने हमें गुलाम बना लिया....

आज जब हजार साल की गुलामी तोड़ चुके हैं...तो एकबार फिर बारी है कर्मयोगी की तरह काम करने की....। आज देश में चारों तरफ मंथन चल रहा है..इसी मंथन से अमृत भी निकलेगा...पर अभी उससे पहले जो हलाहल फैला हुआ है... उसे कौन नीलकंठ पिएंगे...ये किसी की समझ में नहीं आ रहा....पर इस बार महादेव तभी आएंगे जब हम सामूहिक रुप से आह्वान करेंगे..अपने कर्म से महादेव को आश्वस्त कर सकें कि ये देश..ये समाज वही है भगवन जो आपने हमें सौंपा था।

  माखनचोर का जन्म जन्माष्टमी यानि प्यार के देवता का जन्मदिन....पर वो प्यार नहीं जो वासना है...बल्कि वो प्यार जो दिल से में बसता है.....वो प्यार जो कुर्बानी देता है कर्तव्य पथ पर....वो प्यार जो दिल में बसता है....। वो प्यार कहां है..इसे आज ढूंढने निकलेंगे तो आसानी से नहीं मिलेगा...ठीक वैसे ही जैसे भगवान नहीं मिला करते...जतन हजार करें तब जाकर नारायण के दर्शन होते हैं...। कृष्ण और राम के ही दर्शन में छुपा हुआ है भारत का सही अर्थ..पर जब तक जनमाष्टमी धर्म की नज़र से ही देखते रहेंगे....तब तक न तो देश का उद्धार हो सकता है और न ही हमारा...।
असल में भारतीय जनमानस त्रिदेव के चारों तरफ परिक्रमा करता है..। इन्हीं त्रिदेवों में सम्माहित एक ही शक्ति के दर्शन भी करता है। त्रिदेव हर कार्य में एक दुसरे से जुड़े नजर होते हैं। लंका पर चढ़ाई से पहले भगवान राम रामेश्वरम में भगवान शिव की अराधना करते दिखें....या फिर कंस का वध करने वाले श्रीकृष्ण महाभारत के युद्ध में शिव के अवतार हनुमान को अर्जुन के रथ पर विराजमान होने को अर्जुन के रथ के बचे रहने की वजह बताते हों। जाहिर है भगवान राम और श्री कृष्ण की जीवनचर्या को समझे बिना कोई भारत को नहीं समझ सकता। अगर कोई इन्हें अलग-अलग समझता है तो वो हमारे दिलों को नहीं समझ सकता।
आज मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम औऱ मर्यादा के लिए हर जंग लड़ने वाले श्रीकृष्ण की तरह कथनी और करनी को अपने जीवन में उतारना होगा..। आज से लगभग 5000 साल पहले श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। आज पांच हजार साल बाद भारत को एक बार फिर जरुरत है श्रीकृष्ण और उनके दर्शन की। श्री कृष्ण के निश्छल प्रेम को समझने की..।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...