शनिवार, अगस्त 18, 2012

जश्ने-आजादी पर इतनी उदासिनता क्यों....ROHIT?

    आजादी की 65वीं सालगिरह मनाई गई। शहीदों को एक दिन याद कर लिया गया। प्रधानमंत्री का भाषण भी सुन लिया गया। पर वो उत्साह इस बार लोगों में कहीं गायब सा लगा..जो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अक्सर नजर आता था। यहां तक की इस बार प्रधानमंत्री के भाषण से भी ऐसा नहीं लगा जैसे किसी राष्ट्र का मुखिया बोल रहा हो। लगा जैसे संसद में विपक्ष से बात की जा रही हो।
    हम चाहे कितना भी पूर्व प्रधानमंत्रियों को कोस लें...पर जो उत्साह इंदिरा गांधी..राजीव गांधी या अटल जी के भाषणों में होता था वो अब कहीं खो सा गया है। ये नेता कम से कम जनता की नब्ज पहचानते हुए भाषण देते थे। भले ही ये बात ठीक है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लच्छेदार भाषण और लफ्फाजी करना नहीं जानते..पर जिस उत्साह और विश्वास से वे आर्थिक नीतियों पर बोलते हैं..क्या वही उत्साह उन्हें राष्ट्रप्रमुख के तौर पर नहीं दिखाना चाहिए था? अगर लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री पूरे देश में आशा की लहर नहीं जगा पाएंगे तो ये काम कोई नहीं कर सकता।

  जाहिर है देश के जो हालात हैं उससे कोई भी खुश नहीं हो सकता...पर राष्ट्र के तौर पर हमें हमेशा उत्साहित..कुछ बेहतर की आशा से लबरेज रहना चाहिए। इन विषम परिस्थियों में लोगो के विश्वास को कायम रखने औऱ उन्हें उत्साहित करने काम नेताओं का होता है..समाजिक लोगो का होता है..पर लगता है जैसे इस बार सब ठंडे हो गए हैं। जनता हो हो सकता है पिछले दिनों आंदोलनों का जो हश्र हुआ उससे निराशा हो गई हो...लेकिन यहीं से एक नई शुरुआत करने का मौका भी होता है..जो जनता को मिलता है। इन हालात में जनता के पास जब अगुवाई करने वाला न हो तो उसे अपने जोश को कायम रखते हुए किसी भी तरह के.समाजिक आंदोलनों को अपने हाथ में ले लेना चाहिए। आंदोलन के जोश को मरने नहीं देना चाहिए..उसे अपने अंदर रखना चाहिए औऱ स्वतंत्रता दिवस जैसे मौके पर खूलकर दिखाया जाना चाहिए।

   इस बार सबकुछ शांत सा लगा। ये हो क्यों हो रहा है? क्या ये जिम्मेदारी हमारी भी नहीं है कि हम आगे बढ़कर राष्ट्रगान गाएं...झंडा फहराएं? कई लोग शिकायत करते हैं कि इस तरह करने से कोई फायदा नहीं..ये सब रस्म अदायगी सी होती रहेगी। पर वो ये भूल जाते हैं कि इस तरह की रस्म अदायगी कम से कम आपको याद तो दिलाती रहेगी आपके कर्तव्य क्या हैं.? क्या सेना युद्ध न होने पर युद्ध करने का अभ्यास छोड़ देती है..नहीं न। तो हमें भी उत्साह को मरने नहीं देना चाहिए। याद रखिए ये आजादी हमें करोड़ों लोगों ने सदियों तक अपार कष्ट झेलकर अपने वारिसों के तर पर हमें सौंपी है..और अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी संतानों को इससे रुबरु कराते रहें....। ये हम पर हमारे पूर्वजों का कर्ज है जो हमें हर हाल में चुकाना होगा...वरना आने वाली सदियां इस दौर के लोगो को माफ नहीं करेंगी।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...