गुरुवार, सितंबर 06, 2012

सचिन के पाछे काहे पड़े हो भाई....Rohit

सचिन के बोल्ड होते ही फिर से हायतौब मच गई है। बेकार की लफ्फाजी शुरु हो गई है। ये भी उन सचिन के खिलाफ जो पिछले 22 साल से लगातार दवाब के बीच खेल रहे हैं। इतना दवाब तो हमारे देश के प्रधानमंत्री को भी नहीं झेलना पड़ता। जनता की उम्मीदों का दवाब नेताओं पर होना चाहिए, लेकिन हकीकत उलट है। अधिकतर नेताओं को सिर्फ कुर्सी छीनने या किसी चेले से धोखा खाने का डर होता है। उन्हें जनता का डर सिर्फ पांच साल में एक बार होता है। हो सकता है ये अतिश्योक्ति लगे..पर सच है कि इतने सालों से सचिन से ज्यादा किसी ने भारत में इतना दवाब नहीं झेला। 
     सचिन रमेश तेंदुलकर नाम का ये शख्स पिछले 22 साल से लगातार जनता की उम्मीदों का बोझ उठा रहा है। फिर भी सवालों की बरसात उसे घेरे रहती है।
...“आज शतक तो लगा नहीं..शतक लगा तो क्या..दोहरा तो नहीं लगा..दोहरा शतक मार दिया तो तो क्या तीर मार लिया..तिहरा तो आज तक नहीं लगा.....लारा तो दो बार 400 बना चुके हैं...उम्र हो गई है...मुंबई का छोरा था इसलिए जल्दी मौका मिला....देखो फिर बोल्ड हो गया....पेड से गेंद लगकर विकेट में गई तो क्या हो....अगर फुटवर्क अच्छा होता तो पैड पर गेंद लगती ही नहीं..“
.....भगवान जाने कितने सवाल। अनेक सवाल औऱ घेरे में सिर्फ एक सचिन तेंदूलकर।
     फिर भी ये योद्धा टिका हुआ है मैदान में, सिर्फ अपने जुनुन और क्रिकेट से प्यार की वजह से। पिछले दस साल में संन्यास को ही लेकर जितने सवाल सचिन ने झेले हैं, उतने शायद ही किसी ने झेले हों...वो भी पूरी शालीनता से। जबकि नेता तो दो-तीन सवाल में ही भड़क जाते हैं। पहले नेता के चेल-चपाटे और उसके बाद नेता खुद गाली-गलौज से लेकर हाथापाई तक करने लगते हैं। यही हाल बाकी खिलाड़ियों और अभिनेताओं का है। अक्सर खिलाड़ी और अभिनेता या तो प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर चले जाते हैं..या फिर पहले शर्त रख देते हैं कि उनसे कौन-कौन से सवाल पूछे जाएं। कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें सफलता पच नहीं पाती। काबंली की याद है न। कांबली न याद हों तो सानिया मिर्जा को ही ले लीजिए..फेमस होते ही वो प्रेस कांफ्रेंस छोड़कर चलती बनीं थी। भले ही उनकी सफलता में प्रेस का योगदान नहीं था..पर ऐसा तो सचिन के साथ भी है। बावजूद दवाबों को झेलते हुए भी सचिन ने हमेशा शालीनता बरती है। यहां तक की न्यूजीलैंड के खिलाफ आखरी टेस्ट में, मैदान में अपनी खीझ उतारते-उतारते अचानक संभल गए थे सचिन। हालांकि ये भी 22 साल में पहली बार हुआ। वरना जाने कितनी पारी में वो गलत आउट दिए गए...खासतौर पर तब जब पारी को संभाल रहे होते थे। किसी और क्रिकेटर को इतनी बार गलत आउट नहीं दिया गया है जितना सचिन को। 
     सचिन पर ये आरोप भी लगता है कि वो अब पैसे के लिए खेलते हैं। ये आरोप कुछ खिलाड़ी भी लगाते हैं। मजेदार बात ये है कि ये वो खिलाड़ी हैं जिनका करियर लंबा नहीं चला। इनमें तो कई चेहरे सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण जाने-पहचाने बने हैं, न कि अपने खेल के कारण। ये लोग शारजहां भूल गए..जब अंशुमन गायकवाड़ को रात में फोन आया कि मैच फिक्स हो गया है..भारत के इतने खिलाड़ी इतने रन बनाएंगे...इतने खिलाड़ी रन आउट होंगे..वगैरह..वगैरह। तब रात में परेशान गायकवाड़ सचिन के पास गए औऱ उन्हें ये बात बताई। तब सचिन ने कहा था कि आप चिंता न करें। फिर उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है। पहले सेमिफाइनल..फिर फाइनल..दोनों में शतक लगाकर सचिन ने जीत दिला दी। सोचिए उस वक्त एक छोर से रन आउट होते अन्य खिलाड़ियों को देखकर क्या बीत रही होगी इस शख्स पर...लेकिन सीमा पर खड़े सैनिक कि तरह सचिन डिगे नहीं औऱ भारत की लाज रख ली।
     चलिए एक बार मान लेते हैं कि सचिन पैसे के लिए खेल रहे हैं..तो जरा बताइए इसमें गलत क्या है? हकीकत ये है कि जब कोई खिलाड़ी गरीबी में मर रहा होता है, तो कोई उसकी सुध नहीं लेता। सरकार तो रहने दीजिए प्रशंसक तक लापता हो जाते हैं। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की याद है न। आज जितना उन्हें भारत रत्न देने को लेकर बयानबाजी चल रही है, उसका आधा भी यदि जिंदा रहते ध्यानचंद की चिंता की गई होती तो दिल्ली के एम्स के जनरल वॉर्ड में वे अंतिम सांस नहीं लेते। एम्स भी ध्यानचंद को तब लाया गया था, जब प्रेस ने हल्ला मचाया। तब ध्यानचंद की याद न तो उनके शहर के धनाढ्यों को आई और न ही सरकारी बाबूओं को। जब हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को जीते-जी ये देखना पड़ा तो बाकी कि बिसात क्या है?
     वैसे भी अगर पैसे कमाने की कूव्वत आप में है, तो क्यों नहीं कमाते। कोई रोक तो नहीं रहा न। सचिन जितना कमाते हैं उससे भी लोगो को जलन होती है। वो चाहते हैं कि वो सारा पैसा दान कर दें। भई क्यों करें दान। उनका पैसा है..दे न दें उनकी मर्जी। उनके अनाथालय में 200 से ज्यादा बच्चे हैं जिनका खर्च वो खुद उठा रहे हैं। दान वो होता है जो पता न चले..औऱ यही सचिन करते हैं।
       कहने का मतलब ये है कि 22 साल से लोगों का दवाब ये शख्स अकेला झेल रहा है..अब तो कम से कम उसे छोड़ दो। जनता की नजरों में कलाम साहब के साथ सचिन ऐसे ही कई सालों से आदर्श के रुप में पहले पायदान पर नहीं टिके हैं। ये दोनों ही शख्स न तो राजनीति से हैं औऱ न ही सिनेमा से। फिर भी दोनों सबसे बडे आदर्श बने हुए हैं। इसलिए आलोचनाएं जितनी करनी है करें, पर इतनी भी नहीं कि संदर्भ विशेष में आलोचना अपने अर्थ ही खो दे।
    विश्वास रखिए उम्मीदों पर खरा उतरना सचिन को आता है। चाहे कितना भी दवाब हो, औऱ हर बार कि तरह वो जवाब अपने बल्ले से ही देंगे। इतना याद रखिए।

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