गुरुवार, सितंबर 27, 2012

देवानंद के बहाने ..Rohit

     कई सपने ऐसे होते हैं जो आंखों में पलते हैं औऱ तब तक आपको थकने नहीं देते जब तक वो हकीकत नहीं बन जाते..तो कुछ ऐसे सपने होते हैं जो आप पूरा करना चाहते हैं पर उसमें इतनी देर कर देते हैं कि उनके पूरे न हो पाने की टीस जीवन भर सालती रहती है। ऐसे ही कुछ सपने होते हैं अपने समय की पहचान बन चुके लोगों से मिलने की..बतियाने की। ऐसे मौके अक्सर मीडिया में रहने वालों लोगों को मिलते रहते हैं..मगर चाहकर भी जब ये मौके निकल जाते हैं तो इसका मलाल हमेशा के लिए रह जाता है। कुछ ऐसा ही मलाल हिंदी फिल्मों में रोमांस के सरताज रहे देवानंद को लेकर मेरे लिए जीवन भर रहेगा।
     वैसे इस तरह के मौके की इच्छा या उनके पूरे होने की खुशी का खुलकर सार्वजनिक तौर पर इजहार करना आमतौर पर मीडिया में अच्छा नहीं माना जाता है। असल में हर पेशे की कुछ खास खासियत की तरह मीडिया की खास पहचान में एक पहचान ये भी होती है। दरअसल मीडिया में कार्यरत लोगो से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐसे किसी भी मौके पर संयम का परिचय दें..क्योंकि अगर वो संयम नहीं बरतेंगे तो उनके काम में पक्षपात भी हो सकता है। इसलिए दशक पहले तक आमतौर पर पत्रकार किसी भी नेता या अभिनेता का कितना भी करीबी या फैन हो..उसपर कलम चलाते वक्त तटस्थ हो जाता था...औऱ उसके लिखे पर नेता या अभिनेता कभी खुलकर नाराजगी का इजहार नहीं करते थे।
       हालांकि अब समय काफी बदल चुका है। जाहिर है कि पत्रकारिता के एथिक्स में कई नए आयाम जुड़े हैं तो कई धूमिल हो चुके हैं। आज पत्रकार समाज से कम औऱ स्कूलों से गढ़कर ज्यादा आते हैं। जिसके कई फायदे भी हैं तो कई नुकसान भी हुए हैं। उसी तरह नेता भी बदल गए हैं अभिनेता भी। फिल्मी खबरें फिल्मी पत्रिकाओं औऱ पीछे के पन्नों से उठकर अब पहले पन्ने से लेकर पहली खबरों तक आ गए हैं। सो अभिनेता-अभिनेत्री भी बदल गए हैं। अब वे मीडिया से अपने हिसाब से बात करना पंसद करते हैं। एक वो दौर था जब राष्ट्रीय अखबारों कि सुर्खियों में अभिनेता बड़ी मुशिकल से आते थे....पर अब अभिनेता का हर कदम सुर्खियों का हिस्सा बन गया है। ये बदलाव समाज के खबरों को देखने औऱ पढ़ने के तरीकों में आए बदलाव की वजह से भी हुआ है..।
       इसी नए-पुराने की उलझन में देवानंद से मिलने औऱ उनसे बातचीत का मौका मेरे हाथ से पहले निकल चुका था। मैं दत्तात्रेय के 40 गुरु की तरह अनेक लोगों से प्रभावित रहा। 2011 की शुरुआत में मैं उन तैयारियों में लगने लगा था जिसमें ये तय किया था कि 2012 की शुरुआत से उन सभी गुरुओं से मिलूंगा.....पर शायद किस्मत को ये मंजूर नहीं था। पिता, शम्मी कपूर, देवानंद एक-एक करके इस फानी दुनिया से रुखसत हो गए...औऱ मैं जीवन भर का मलाल लिए रह गया। इसलिए कहते हैं अगर अच्छा सोचा जाए तो जितनी जल्दी हो उसपर अमल करें। इसके उलट ये भी सच है कि "मैं देर करता नहीं देर हो जाती है"। मतलब ये कि जितना जल्दी हो उतना बेहतर। अपने शौक के लिए समय निकाला जाए.....कुछ बेहतर भी किया जाए।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...