मंगलवार, सितंबर 11, 2012

Book Fair vs साइबर पन्ने.....Rohit

पिछले हफ्ते बुक फेयर में जाना था पर जा नहीं पाया। नौ तारिख तक लगातार आफिस ही जाना था। रविवार को एक दिन की छुट्टी  मिली तो शाम की पहले से ही तय मीटिंग के कारण छुट्टी वाले दिन भी जा पाना संभव नहीं था। मेरे लिए बुक फेयर में जाने का सिर्फ एक ही मतलब होता है-सबकुछ भूल कर विचरना-खरीदना। जब इतना समय नहीं मिलता तो मैं अमूमन बुक फेयर नहीं जाता। आज भी वही हाल था। इन सब के बीच नेट पर कुछ मेल चेक करते-करते ब्लॉगिंग की दुनिया में जा घुसा। किस्मत शायद कुछ मेहरबान थी इसलिए दिल में बुक फेयर न जाने की जो हल्की सी कसक  थी..वो ब्लॉग की दुनिया में खत्म होनी लिखी थी।
    आज जाने कैसे शुद्ध राजनीतिक या कहें करेंट अफेयर से जुड़े ब्लॉग लापता से हो गए थे। साइबर की अजब दुनिया आज कुछ अलग ही रंग लिए हुए थी....ब्लॉग में जाने कैसे कहानी..किस्से...कविताएं..आपबीती..डायरी के कई बंद पन्ने...बतकही...यादें...जैसे .जीवन के अनेक पन्ने खुल गए। एक पन्ने को पढ़ते-पढ़ते दुसरे...दूसरे से तीसरे..जाने कितनी जिदंगियों में झांक आया। जाने कितनो का बीता कल साझा कर लिया...पता ही नहीं चला। कहीं टिप्पणी कर दी....तो कहीं सिर्फ आंगुतक यानि विजिटर के तौर पर रहा....जो पन्ना दिल को दर्द की गहराईयों की तरफ ले जाता दिखा..उसे कुछ पंक्तियों में ही महसूस कर आगे बढ़ चला....आज शायद हर ग़म को धुंए में उड़ाते चलना था....सो रुका नहीं। 
     ये कितना अजीब होता है कि अक्सर किसी का बीता कल...जाने कैसे कई लोगो से टुकड़ों में जुड़ा होता है। कुछ इस तरह लगा जैसे कई अलग-अलग पन्नों में खुद जी रहे हों हम....नमी चाहे आंखों में रुकी हों...या उन चिठ्ठियों में...जो पोस्ट हुई हो या न हुई हों....भिंगोती चली गई..। कहीं करीने से सहेजे रखे वेंलेटाइन कार्ड मिले..तो कहीं चिंदी-चिंदी होकर साइबर में तैरती चिठ्ठियां...हर कहीं अपना या किसी का जानापहचाना बीता कल झांक रहा था....मुस्कुराते हुए...आंखों में पहचान लिए...।
     बाहर से सब अलग-अलग....डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, शिक्षक, व्यापारी, नौकरीपेशा, बेरोजगार...जाने कितने पेशे में बंटे जीवन....पर सबके अंदर दर्द सामान सा..। बाहर से सभी पत्थर..पर अंदर कहीं न कहीं अकेलापन....कहीं पर्वत सी पीर..कहीं हंसकर दर्द से छुटकारा पाने की जद्दोजहद...कैसी अद्भूत समानता है..गज़ब....।
    इस साइबर संसार में जाने कितने खुले जख्म दिखे....जाने कितने सीलन भरे दिल के कोनों में साइबर की दुनिया की ताजी हवा के झोंके दिखे....जाने बंद डायरी के पीले पड़े पन्ने खुले दिखे...किस-किस कोने...किस-किस पन्ने का नाम लूं....किस-किस को याद करुं....दर्द का..किसी अहसास का...कोई एक चितेरा हो तो न.....कोई एक दिल के पन्ने खोले बैठे हो तब न....वैसे भी हर नाम याद नहीं रहता।
      जैसे हिमालय की हर चोटी का नाम याद नहीं रहता...पर हिमालय कहते ही सभी चोटियां महिमामंडित हो जाती हैं...वैसे ही ये सभी नाम हिंदी साहित्य के महासागर की लहरें हैं.....वो लहरें जिनका नाम नहीं होता...पर सागर से....साहिल से जिनका अट्टू रिश्ता रहता है.....वो लहरें जो कभी सागर में अठखेलियां करती हैं....तो कभी साहिल पर आकर सिर पटकती हैं...पर रुकना नहीं जानती थमना नहीं जानती..। यही है साइबर संसार की वो दुनिया...जो कोई बुक फेयर नहीं....सिर्फ पन्नों की दुनिया है....या कहें Life's Pages या कुछ भी...

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...