शुक्रवार, अक्तूबर 19, 2012

वाईपी जी अपने की तो न लो जान रे...

अपने तो न साधो निशाना
लगता है कि केजरीवाल को सभी ने नेता तकसीद कर लिया है...और इसकी बानगी कल दिखी मुंबई में जहां दूसरों पर आरोप लगाने वाले केजरीवाल पर निशाना साधा उनके ही सहयोगी पूर्व आइपीएस वाईपी सिंह ने। मुंबई में केजरीवाल पर वाईपी सिंह ने जमकर आरोप लगाए। उन्होंने केजरीवाल पर शरद पवार को बचाने का आरोप लगाते हुए कहा कि गडकरी का मामला पवार की तुलना में छोटा है। वाईपी सिंह केजरीवाल को हिटलर बताने से भी नहीं चुके। उन्होंने आरोप लगाया कि हिटलर ने जैसे कहा कि जर्मनी को बचाने के लिए उसे लाओ....ठीक उसी तरह केजरीवाल भी कह रहे हैं कि भारत खत्म हो जाएगा..देश को बचाने के लिए उन्हें लाओ...वगैरह....वगैरह.....।

      इस सबके बीच जनता भौंचकी होकर आरोपों का ये खेल देख रही है। ये किसी ने सोचा नहीं था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने वाले सिपाही बाद में इस तरह एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल लेंगे। शास्त्रों का मत है या शायद वेद वाक्य...”जितनी मुंडी होगी..उतने भिन्न-भिन्न विचार होंगे..”। तो अगर विचार भिन्न हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा...। यानि दो व्यक्ति हमेशा हर मुद्दे पर एकमत नहीं हो सकते। मगर इस बात को जानकर भी लोग बवाल खड़ा करने से बाज नहीं आ रहे। अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि जैसे-जैसे समय बढ़ा आंदोलन के सिपाही बिखरते चले गए। सबकी अपनी-अपनी ढफली...अपना-अपना राग है। हालात इतने खराब हैं कि ये सभी अपने ही लोगों पर निशाना लगा रहे हैं।

     अगर केजरीवाल ने पवार से पहले गडकरी पर निशाना साध दिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया है....। असल में जिस दिन से केजरीवाल एंड कंपनी ने वाड्रा और सलमान खुर्शीद पर हमला बोला था..उसी दिन से लोग इस बात का इंतजार कर रहे थे कि क्या केजरीवाल औऱ उनके साथी भाजपा पर निशाने साधेंगे या नहीं?..उधर कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही थी कि केजरीवाल एंव उनके साथी भाजपा की टीम बी हैं। ऐसे में लाजिमी था कि गडकरी का मामला पहले उठे......क्योंकि गडकरी पर हमला प्रमुख विपक्षी पार्टी को भी कठघरे में खड़ा करने के बराबर था। यानि गडकरी पर हमला बोल कर केजरीवाल एंड टीम ने सही राजनीतिक चाल चली। इन हालात में वाईपी सिंह जी का केजरीवाल सरीखे अपने ही लोगो पर निशाना साधना गलत है।
       उल्टा चंद उसूलों के नाम पर केजरीवाल को घेरकर पूर्व आईपीएस वाईपी सिंह जी ने नेताओं का काम ही आसान किया है। क्या ये सच नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में उठ रहे अंसतोष की अलग-अलग आवाज को एकजुट कर दिल्ली तक केजरीवाल एंड कंपनी ही आई। ऐसे में केजरीवाल पर निशाना साधना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है।
       जंतर-मंतर से उठे आंदोलन का मकसद जनलोकपाल के माध्यम से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना था....उसके उद्गम पर चोट करना था...औऱ ऐसा सख्त प्रहार सिर्फ संसद ही कर सकती है...औऱ संसद तक पुहंचने का एक ही रास्ता है औऱ वो है कि राजनीति। वाईपीजी की तारीफ की जानी चाहिए कि वो अदालत में लवासा प्रोजेक्ट के मामले में पवार के खिलाफ आखरी दम तक लड़ेंगे। मगर वाईपी सिंह जी को समझना चाहिए कि अगर हर मामला अदालत में लड़ा जाएगा तो न तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग तेज होगी....न ही हम किसी नतीजे पर पहुंचगे। ऐसे में आंदोलन का मकसद अदालतों के बाहर कतार में ही लगा रह जाएगा। ये बात सबको समझनी चाहिए कि बात सिर्फ एक नेता की नहीं है..बल्कि उस परिपाटी पर चोट करने की है जो हमें दीमक की तरह खा रही है।

 भ्रष्टाचार पर दमदार तरीके से वार करने के लिए समाज को झकझोरना होगा...मंजिल तक पुहंचने के लिए संसद के रास्ते पर ही चलना होगा...अदालतें इस रास्ते का एक अह्म पड़ाव जरुर हैं....पर भ्रष्टाचार के शिखर पर प्रहार संसद में बने कानून से ही होगा। मगर सब इसी तरह आपस में लड़ते रहेंगे कैसे काम होगा। ऐसे कदम देश की जनता के आंदोलन को कमजोर ही करेंगे...औऱ आंदोलन का कमजोर होना एक बड़ी त्रासदी होगा। मत भूलिए इस आंदोलन की धमक अमेरिका तक पहुंची थी। सरहद पार भी लाखों लोगों के दिलों में आशा जगी थी कि शायद आतंकवाद के खिलाफ वो जंग लड़ सकें।
    हम सबको यही दुआ करनी चाहिए कि आंदोलन का हर सिपाही सेनापती न बने...सेनापति अपने को एक सिपाही के समकक्ष ही समझे....औऱ मंजिल मिलने तक कोई एक-दूसरे के खिलाफ तलवार नहीं खींचे।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...