गुरुवार, अक्तूबर 25, 2012

जरुरत है धनुर्धर राम की...जय हो.....

           आज विजयदशमी है....नवरात्र का आखरी दिन...आज ही भगवान राम बुराई के प्रतीक रावण का अंत करते हैं और मर्यादा की स्थापना करते हैं। ये सदियों से होता आय़ा है। हमारी नजरों में लाखों सालों से औऱ आधुनिक इतिहास के पन्नों में दर्ज साक्ष्यों के अनुसार 5000 साल से। ज्ञात इतिहास के इन पांच हजार साल में भारत दुनिया का सिरमौर रहा। दुनिया को सबसे महानतम सम्राट अशोक दिया। बाद में इन्हीं सदियों के आखिरी के एक हजार साल में धर्म का अनुसरण करने वाली सभ्यता के लोगो का आध्यात्मिक-भौतिक पतन भी देखा।

          सालों तक अरब से उठने वाली हुण..मंगोलों और जंगली कबीलों की फौज को हमने तहस-नहस किया था। दसवीं सदी के अंत तक सागर की लहरों पर हम राज करते थे। दक्षिण में राजराजा चोल औऱ उनके बेटे राजेंद्र चोल ने समुद्र की लहरों पर हुकुमत की। उससे पहले मगध सम्राट समुद्रगुप्त की ताकत का ये आलम था कि समुद्र पार करके जिन देशों मे मगध की सेनाएं गई भी नहीं वहां के शासक उन्हें सालाना तौर पर नियमित कररुपी भेंट दिया करते थे। फिर हमने पतन की इंतिहा देखी..पहले अरब के लुटेरों से हारे.....नतीजा 700 साल की गुलामी मिली। अरब से आए लुटेरे बाद में भारत में ही बस गए....जिसका हमपर व्यापक असर हुआ। सत्ता के भय से हमारी काफी आबादी ने धर्म बदला। अंत में 1947 में विभाजन झेला। दरअसल पोगा पंडितों ने दुनिया के सबसे उन्नत लोगों को बर्बाद कर दिया। पोगा पंडितों के कारण ही सागर यात्रा को पाप माना जाने लगा। नतीजा ये निकला की समुद्र के रास्ते ही आए अंग्रेजों ने 300 साल तक भारत को गुलाम बनाए रखा।

         पहली बार इस गुलामी की छाती पर 1857 में शहीद मंगल पांडे ने पहली गोली दागकर भगवान राम के वंशजों की तरफ से ऐलान किया कि अब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ चुकी है। उसी सोते भारत की आत्मा को जगाने के लिए महात्मा गांधी ने राम नाम का सहारा लिया। जब भारत की आत्मा में जगी...तो बिस्मिल, अशफाक उल्ला, आजाद, शहीदे-आजम औऱ नेताजी सरीखे जाबांज भगवान राम के धनुष से छुटे अचूक बाणों की तरह गुलामी की छाती को भेदकर ही थमे।

         तमाम दुश्वारियों से भरी इन सदियों में अगर कुछ नहीं बदला तो वो है हमारी आस्था...औऱ उसी का एक प्रतीक है रामलीला। भारतीय धर्म की मर्यादा के आधार भगवान राम के जीवन पर अधारित रामलीला। गुलामी भरे हजार साल में यही मर्यादा की कथा थी जिसने हमारे अंदर की आस्था को मरने नहीं दिया। सात समुद्र पार वेस्ट इंडिज तक...एशिया में टाइगर देशों तक..आज भी भगवान राम विद्ममान है। दो दिन पहले ही रामलीला में दर्शकों की भीड़ ये साबित कर रही थी की अंतरमन में अब भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम जीवित हैं।
         आज आजादी के 65 साल गुजर चुके हैं...औऱ हमें उसी भगवान राम की जरुरत है जो शांति के लिए रावण का वध करते हैं। आज का रावण भ्रष्टाचार और आतंकवाद और गद्दारों के भेष में छिपा हुआ है। इस रावण का अंत कर शांति की स्थापना के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम धनुर्धर राम की जरुरत है।  भगवान राम के आदर्शों को अपनाने के लिए उनका जीवन चरित्र हमें अपने जीवन में उताराना होगा। याद रखिए धर्म की रक्षा भी तभी हुई जब भगवान राम ने धनुष उठाया। इसलिए पूजिए उन मर्यादा पुरुषोतम भगवान राम को जिन्होंने मर्यादा की स्थापना तो की..पर धनुष कभी नहीं छोड़ा। यही विजयादश्मी है...यही देशभक्ति है। यही विजयादशमी का संदेश है........। जय हिंद

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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