सोमवार, अक्तूबर 29, 2012

बस यूं ही कभी-कभी.....

बस यूं ही कुछ पंक्तियां बन गईं....कच्चे घड़े की तरह....कविता नहीं..गद्य का हिस्सा होती ये पंक्तियां...पर जाने क्यूं बस यूं ही निकल पड़ी ये पंक्तियां...बिना सोच समझे...

boletobindas
सफर बिना किसी तलाश के
बस यूं ही कभी-कभी
मन को उड़ान भरने दो
बस यूं ही कभी-कभी.....
चल पड़ो क्षितिज की ओऱ
हवा को बाहों में बांध लो
या दरिया के संग बह लो......
बस यूं ही कभी-कभी.......
चांदनी रातों को जग लो
किसी को ख्वाब में आने दो
बस यूं ही कभी-कभी.....
किसी को पुकार लो
बस यूं ही कभी-कभी.....
बादलों संग बरस लो
रिमझिम सावन संग भींग लो
बस यूं हीं कभी-कभी.....
चल पड़ो सफर पर
बिना मंजिल की तलाश के
बस यूं ही कभी-कभी
दिल का कहा मान लो...
बस यूं ही कभी-कभी......

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...