बुधवार, अक्तूबर 03, 2012

Mahatma Gandhi...हर वक्त सहमत नहीं पर जाने क्यूं

कब बदलेगी बरसों पुरानी आदत
अक्सर हम किसी की अच्छाई या बुराई करते हैं तो उसके एक ही पक्ष को सामने रख कर बात करते हैं। जिस कारण हमारे तर्क सतही हो जाते हैं। हम अपने से असहमत किसी भी मत को सुनने को राजी नहीं होते। महात्मा गांधी के संदर्भ में ये बात ज्यादा ही नजर आती है। अक्सर बापू के विरोधी 1945 से 1948 के बीच के समय को सामने रख कर ही महात्मा गांधी पर वार करते हैं...तो बापू के अंधभक्त उन्हें पूरी तरह से राष्ट्रपिता कहकर विरोध करने वालों को गरियाने लगते हैं।
     हमारी समस्या ये है कि हम खुद कुछ जानने की जहमत नहीं उठाते। सदियां गुजर गई...पर हमारी आदत बदली नहीं है। ठीक उसी तरह जब सदियों पहले पंडितों ने कहा कि समुद्र पार जाने से धर्म भ्रष्ट होता है..हमने मान लिया औऱ समुद्र की लहरों पर राज करने वाले हम लोग समुद्र के रास्ते ही आए व्यापारी अंग्रेजों के गुलाम बन गए। वर्षों पहले संसार को माया कहने वाले महर्षियों ने धर्म से ताकत पाए राजदंड की वकालत की थी औऱ राजदंड औऱ धर्मदंड के लिए कुछ नीतियां बनाई थीं। नीतियों में समय के साथ परिवर्तन के लिए चिंतन की परंपरा बनाई थी। पर बाद के दिनों हम चिंतन की जगह धर्म की रक्षा की चिंता करने लगे...बहस करने लगे औऱ नतीजा ये हुआ कि अऱब के जंगली कबिलों के आगे हमें घुटने टेकने पड़े।
     ये वर्षों पुरानी आदत बेताल की तरह भारतवासियों पर सवार है। इसी आदत का शिकार गांधी जी भी होते रहते हैं। दरअसल गाधीजी को समझने के लिए हमें दक्षिण अफ्रिका से हमारे देश में आने तक..औऱ उसके बाद 1915 के बाद से लेकर 1945 तक के गांधीजी के जीवन को फिर से पढ़ना होगा। पहले हमें मानना होगा कि बापू एक सधारण मानव से महामानव बने थे न कि भगवान। जाहिर है जब हम उन्हें मानव मानेंगे तो ये भी मानना होगा कि उनसे भी मानवीय भूल हुईं थीं। जब हम ये मानेंगे तो गांधीजी को हम नए सिरे से पहचान पाएंगे। अपने आखिरी समय में मानवता में हद से ज्यादा विश्वास रखने वाले महात्मा गांधी अपने ही लोगो के हाथ हाशिए पर धकेले जाने लगे थे। बावजूद इसके कि अधिकांश जनता बापू पर ही विश्वास करती थी। ये कटू सच है कि अगर बापू भारत के बंटवारे पर अंत तक राजी नहीं होते तो तमाम खून-खराबे के बाद भी भारत का बंटवारा नहीं होता। इतिहास गवाह है कि बापू के बंटवारे को मानने के बाद ही दोनो ही तरफ से पलायन तेज हुआ था।
     बची खुची कसर आजादी के बाद महात्मा गांधी की मूर्तियां बनाकर उनके चेलों ने पूरी कर दी। आज मूर्ती बनाने के पीछे की भावना उलटी हो चुकी है। आज हम मूर्ती बने शख्स की इज्जत जुबान से तो करते हैं पर उनकी नीतियों को..उनकी बातों को समझने औऱ जीवन में उतारने को तैयार नहीं। यानि जो काम बापू को गरियाने वाले लोगो ने किया वही काम उलट तरीके से उनके अनुयायियों ने किया। जबकि बापू व्यक्ति पूजा के सख्त विरोधी थे।
      महात्मा गांधी को गए आधी से ज्यादा सदी गुजर गई है…पर अब तक हम उनके विचारों को आजमा कर या नए सिरे से ढाल नहीं पाए हैं। आज भी हम उस अंतिम लक्ष्य से कोसो दूर हैं जिसमें हर आंख से आंसू पोंछने का संकल्प था। जाहिर है विचारों में परिवर्तन होता है ये गांधीजी भी मानते थे। इसलिए उनके विचारों को एक बार फिर से पढ़कर हमें ये सोचना होगा कि आखिर हम उन रास्तों पर चलने औऱ उन रास्तों को नए सिरे से बनाने से कतरा क्यों रहे हैं? क्या कमी है जो हमें रोक रही है?  क्या बात है जो हम गांधी को नए सिरे से समझने की कोशिश नहीं करते?

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