सोमवार, नवंबर 19, 2012

Bal Thakrey...अलविदा मुंबई के टाइगर


अलविदा हे प्रखर राष्ट्रवादी
       मुंबई का टाइगर अलविदा कह गया...पीछे छोड़ गया लाखों दुखी लोग...जिस दशहरा ग्राउंड में पिछली आधी सदी से अपने मानुष से ये टाइगर रुबरु होता आया था..उसी मैदान में लाखों लोगो ने आंसूओं से भरी आंखों के साथ बाला साहेब ठाकरे को आखिरी विदाई दी...। मातोश्री–ठाकरे का घर- पिछली आधी सदी से मुंबई की धड़कन था। मुंबई का शायद ही कोई शख्स होगा जिसने बाला साहेब के दर पर दस्तक न दी हो...वजह थी उनके लिए दिलों में आदर। सियासतदां हों या कलाजगत के लोग...उद्योगपति हों या फिर आम जन.....ठाकरे की हर कोई दिल से इज्जत करता था....इसकी बानगी उनकी आखरी यात्रा में भी दिखाई दी।

   बाला साहेब ठाकरे की खासियत थी कि वो जिस बात से इत्तफाक नहीं रखते थे उसका खुलकर विरोध करते थे। उनकी ये खासियत आखिरी समय तक बरकरार रही। उनके प्रखर राष्ट्रवाद से सभी सहमत रहे....यहां तक कि उनके विरोधी भी...चाहे वो किसी भी धर्म को मानने वाले रहे हों....हां हर कोई उनकी उग्रता के साथ तालमेल नहीं बैठा पाता था...पर बाला साहेब ने कभी इसकी परवाह नहीं की.....मामला चाहे पाकिस्तान से रिश्ते को लेकर रहा या फिर राष्ट्रविरोधी ताकतों के खिलाफ बुलंद आवाज में विरोध करने का...। अपने आखिर समय तक बाला साहेब ठाकरे उस राजनीति का विरोध करते रहे जो तुष्टीकरण की हिमायती रही है। उन्होंने समझौते की राजनीति कभी नहीं की। बाला साहब ठाकरे खरा बोलने वाले नेता रहे। भले ही इससे कई बार उनके मित्रों को भी असहज स्थिती का सामना करना पड़ा हो। 

       चाहे उनकी गठबंधन सहयोगी भाजपा हो या फिर कोई शख्सियत...उन्होंने पूरी दबंगता के साथ लोगो को आईना दिखाया। उनके जैसा साफ बोलने वाला नेता आज की सियासत में कहीं नहीं है.... अगर है तो वो बाला साहेब ठाकरे जितना लोकप्रिय नहीं रहा। आम मानुष उनसे दिल से प्यार करता था...औऱ यही प्यार आज उस मानुष की आंखों में आंसू बनकर झलक रहा था.....जब मुंबई का ये दंबग पंचतत्व में विलिन हो रहा था....। ये विंडबना रही की ठाकरे महाराष्ट्र तक सीमित रहे। हालांकि एक दौर था जब देश के कई इलाकों में शिवसेना का गठन हुआ था....लेकिन बिहार औऱ उतर प्रदेश के लोगो का विरोध कर रहे राज ठाकरे के खिलाफ खुलकर बाल ठाकरे के न बोलने से राष्ट्रीय स्वरुप लेने जा रही शिवसेना फिर से अपने क्षेत्र में ही सिमट कर रह गई। 

     ठाकरे ने पाकिस्तान प्रायोजित आंतकवाद का कड़ा विरोध किया...पर किक्रेट से प्यार किया..इसलिए क्रिकेटर मियांदाद को अपने यहां आमंत्रित करने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई। भारतीय संस्कृति के पक्षधर रहे..पर माइकल जैक्सन से उन्हें कोई बैर नहीं रहा। लोग उन्हें मुस्लिम विरोधी ठहराते रहे..पर तीन साल तक एक मुस्लिम डॉक्टर ही अंतिम समय तक उनकी देखभाल करते रहे। विरोधी अक्सर इसे ठाकरे का विरोधाभाष कहते हैं....पर हकीकत में ये बाल ठाकरे का विरोधाभाष नहीं...उनकी स्पष्टवादिता थी।

""ये कटु सच है कि जो शख्स खरा औऱ सच बोलता है उसे अवसरवादी लोग हमेशा विरोधाभाषी कहते हैं।"

     मगर इस सबसे बेपरवाह 86 साल के ठाकरे की दहाड़ आखिरी सांस तक बरकरार रही। कुछ दिन पहले केंद्रिय गृहमंत्री शिंदे के असंवेदनहीन बयान पर यही दहाड़ गूंजी थी। न कोई ऐसा हुआ था न होगा....कुछ इसी अंदाज में इस टाइगर ने जीवन जिया....आज की तारिख में ऐसा कोई नेता दूर-दूर तक नजर नहीं आता...जो बेख़ौफ हो...बिदांस हो...दबंग हो...और खुलकर तुष्टीकरण की राजनीति का विरोध करता हो। बाला साहेब ठाकरे का जाना महाराष्ट्र की राजनीति के लिए ही नहीं बल्कि भारत की राजनीति के लिए एक धक्का है।

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