सोमवार, नवंबर 26, 2012

होश न खो दे, कहीं जोश न खो दे, ये जवानी

(मैं जाने क्यों शानदार हाइवे पर चलते हुए पाबंदी के बावजूद कार पार्क कर देता हूं...फिर देखता हूं तरक्की के सोपान बने हाईवे के किनारे पीछे छूट गए गांव....कई बार उल्टा चलने लगता हूं उन पखडंडियों के उद्गम की ओर...जो हाइवे तक आते-आते कहीं खो जाती हैं...जाने क्यों जब हरे-भरे दरख्तों को देखता हूं तो नजरें घूम जाती उसके आसपास चारों तरफ की सूखती घास पर।।....जाने क्यों इस बार भी बनती आप पार्टी और अन्ना टीम की ओर देखते हुए मेरी नजरें निस्वार्थी कार्यकर्ताओं पर जा रही हैं )
       नहीं होना था.....नहीं होना था...हो गया.....हो गया...आखिर हो गया....टीम शुरु होते ही सिर फुटौव्वल हो गया...फिलहाल तो टीम अन्ना से टीम केजरीवाल..औऱ दोनो से निकल कर टीम वालिंटियर पर यही गाना बैकग्राउंड में बज रहा है। पहले दो टीम के पास कई बड़े नाम, कई बड़े चेहरे हैं, तो तीसरी टीम का दावा कि उसके पास हिम्मत है। पार्टी बनते ही दिल्ली में जमीन पर नए औऱ पुराने वांलिटियर की आपसी लड़ाई शुरु हो गई, मगर इन सबसे पहले काफी पहले ही पार्टी बनने की संभावना के साथ ही शुरु हो था महत्वाकांक्षी लोगो का टिकट का जुगाड़ बिठाने का सिलसिला। पार्टी के गठन के साथ ही ऐसे लोगो ने मीडिया के सामने चेहरा चमकाना तो शुरु कर ही दिया है।
आदर्शवाद में निराशा का घुलना
      नौकरी छोड़छाड़ कर, घरवालों को नाराज़ करके जनलोकपाल आंदोलन शुरु होते ही देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग दिल्ली दौड़े चले आए थे। ऐसे कुछ लोग अब भी दिल्ली में जमे हुए हैं, पर ये मायूस हैं। राजनीति मे आदर्श औऱ लोकव्यवहार के बीच के अंतर को न समझने वाले ये सभी हैरान हैं। ये आए थे बिना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के, सिर्फ देश के सिस्टम में सुधार लाने के आंदोलन के वास्ते, पर आज इन लोगो के दिल और दिमाग में भारी उथल-पुथल है।
     सवाल ये है कि ऐसे युवाओं का भविष्य क्या होगा? आज कुछ जमापूंजी और घरवालों के सहयोग से इन लोगो का काम चल रहा है, पर आने वाला कल कैसा होगा, ये इनमें से कोई नहीं जानता। कुछ प्रोफेशनल लोगो से मिलने पर ये तो दिखा कि ये लोग अंदरुनी तौर पर फिर से रोजगार की तरफ मुड़ना चाहते हैं, मगर अभी तक ये बिना जनाधार वाले नेताओं के चक्कर में फंसे हुए हैं। जबकि इस आंदोलन से जुड़ने के लिए कई युवा आज भी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ रहे हैं...।

मंडल का दौर
     जमीन पर ऐसे लोगों से मिलकर मुझे याद आ गया मंडल का दौर। जब स्कूलों से बिना किसी नेतृत्व के हमने क्लास छोड़नी शुरु कर दी थी। पढ़ने के बाद भी नौकरी नहीं मिलेगी ये समझ कर पढ़ाई से किनारा भी कर लिया। कईयों ने बसों में आग लगाई, तोड़फोड़ मचाई। हममे से राजीव गोस्वामी जैसे कुछ युवाओं ने आत्मदाह किया। कई युवाओं की जान गई, मगर नतीजा सिफर निकला। न तो आरक्षण बंद हुआ, न उसकी तार्किक परिणीति हुई। इसके बाद कई युवाओं में निराशा भर गई थी, कई लोगो ने सबकुछ छोड़छाड़ कर अपनी तरक्की की राह पकड़ ली थी। अधिकतर ये समझ गए थे कि राजनीतिक नेतृत्व सिर्फ युवाओं का खून पीना जानता है, समस्या को उलझाना और लोगो के बीच मतभेद कायम रहने देना चाहता है।

बेहतर है पैचअप हो
      हालांकि जनलोकपाल का आंदोलन मंडल आंदोलन से भिन्न है। इसमें नेतृत्व मौजूद है। युवा से बुजुर्ग सभी मौजूद हैं। हर पार्टी के कार्यकर्ता इस आंदोलन से जुड़ रहे हैं। बस सवाल ये है कि अगर जमीनी स्तर पर इस तरह से निराशा होगी, जुगाड़ू लोग इस तरह से अफरातफरी का माहौल मचाएंगे, तो आंदोलन की नींव ही कमजोर होगी। अगर ऐसा चलता रहा तो ये न तो समाज के लिए, न ही देश के लिए अच्छा होगा। बेहतर है कि टीम अन्ना और टीम केजरीवाल इसे समझे और एक हो।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...