सोमवार, दिसंबर 31, 2012

आ 2013 आ...झिझक मत, आ, साथ आ

हे 2013, तेरा स्वागत कैसे करुं ये समझ नहीँ आ रहा...जाते-जाते 2012 ने ऐसा झन्नाटेदार तमाचा मारा है हमारे दोगले समाज पर...जिसकी गूंज कब तक हमारे कानों में गूंजेगी...कह नहीं सकता.। हां कुछ कानों को ये गूंज सुनाई देनी बंद हो गई है..कुछ कानों ने अपने अंदर रुई ठूस ली है....हर तरफ तेरे स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए लोग नजर आ रहे हैं....नाचकर....गाकर वो तेरा हौसंला बढ़ा रहे हैं आने के लिए.....मैं जानता हूं कि ये देखकर तू झिझकते हुए आ रहा है...तुझे अपने स्वागत को देख शर्म आ रही है....2012 को देख तू ये सोच रहा है कि कहीं तूझे भी ऐसी ही विदाई न मिले....गले लगने वाले लोग कहीं तेरा दम ही न घोंट दे?

2013 तू नई उम्मीदें जगाना चाहता है...पर तू भी क्या करे..जिनके लिए तुने आना है उन्होंने ही बेड़ा गर्क कर रखा है....2012 से पहले हर बीता साल अपने दामन में कई दबी-कुचली आवाजें और आहें चुपचाप समेट कर ले जाता था..ये अवाजें शराब औऱ शोर के बीच दब जाती थीं...आने वाला बरस सोचता था कि चलो शायद अब लोग उसके आने के बाद इन अवाजों को सुनेंगे......पर ऐसा कुछ नहीं होता था....इस बीच सब ये भी भूल गए कि जब कोई क़ौम इतिहास से सबक नहीं लेती..तो इतिहास अपने को बड़े ही क्रूर तरीके से दोहराता है...इसलिए 2012 ने तो सिर्फ अपना एक नियम निभाया है...इतिहास को दोहराया है...एक करारे झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ।

हे 2013, मैं नाच कर तेरा स्वागत नहीं कर रहा हूं...मैं शैंपेन खोलकर भी तेरा स्वागत नहीं कर रहा हूं.....मैं हजारों रुपये लूटा कर रात की रंगिनियों में डूब कर भी तेरा स्वागत नहीं कर सकता....मैं ये सोच कर कि खुश होने के चंद बहाने है...नहीं नाच सकता..नहीं गा सकता....इसलिए हे 2013 मैं न तो 2012 को छोड़ने गया हूं...न ही कहीं तेरा स्वागत करने पहुंचा हूं....
2013...मेरे नए दोस्त... मैं सिर्फ खाली हाथ तेरे गले लग कर तेरा स्वागत करुंगा....2012 ने इधर-उधर के बीच झूलते समाज को जो लात मारी है उसका असर तूझे दिख रहा होगा....इस बार कई आवाजें उठी हैं..जो दबने को तैयार नहीं...ये अवाजें स्कर्ट से कहीं ज्यादा उंची हैं....जिसकी आवाज तूझे भी सुनाई दे रही है...मैं सिर्फ तुझे बता सकता हूं कि इस बार ये अवाजे औऱ उंची होंगी....जिस हर बार दबाया नहीं जा सकेगा...2013 मेरे दोस्त मैं इतनी संत्वाना दे सकता हूं तूझे कि मैं इतना जरुर करुंगा कि कुछ आंखों में पले सपने मरे नहीं...इसलिए आओ मेरे नए दोस्त 2013...औऱ हमारा हौंसला बढ़ाओ..झिझको नहीं मेरे दोस्त ..आओ

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...