सोमवार, दिसंबर 10, 2012

आइए संसद की चर्चा भी देखें

courtsey-Loksabha TV
      हमारे राजनेता क्या सोचते हैं...पार्टी के तौर पर उनके विचार क्या होते हैं..इन सब बातों को जानने के लिए लोगो को लोकसभा और राज्यसभा में होने वाली बहस को जरुर देखना चाहिए। फायदा ये होगा कि एक तो उन लोगो की शिकायत दूर होगी जो ये सोचते हैं कि राजनेता कुछ नहीं जानते। दूसरा, उनकी आंखें भी खुलेंगी जो बिना कुछ जाने-समझे हर बात पर बहस करते हैं। इसके अलावा उन राजनीतिक कार्यकत्ताओं को भी सोचने का मौका मिलेगा जो आंखे बंद कर अपने नेता के कुतर्कों का साथ देते हैं। चौथा, उन लोगो की जुबान पर भी लगाम लग सकती है जो किसी तरह की स्वस्थ बहस को भी आपसी झगड़ा बताकर राजनीतिक पार्टियों के लोकतांत्रिक स्वरुप को तोड़ने में लगे रहते हैं।

    संसद की कार्यवाही देखते वक्त हमें पता चलता है कि संसद युवा और बुर्जग भारत का सही प्रतिनिधित्व करती है। ऐसे में पुराने और युवा नेता चाहे जो बोले उनसे कम से कम इतना तो समझ आ जाता है कि वर्तमान और भविष्य के लिए देश को लेकर उनकी सोच क्या है। ऐसे में हमें किसी विषय के पक्ष-विपक्ष पर अपनी भी राय कायम करने में मदद मिलती है।

   जैसा कि इस बार एफडीआई के मुद्दे पर हुआ। एफडीआई को लेकर जनता के बीच जो डर औऱ हायतौबा मची हुई थी वो संसद में भी चर्चा के दौरान साफ दिखी। संसद में बहस में जनता को एफडीआई के पक्ष-विपक्ष और इसके बारे में मिलीजूली राय देखने समझने को मिली। अब तक पानी पी-पी कर बिचौलियों को कोसने वाले मध्यवर्ग को समझ आ गया होगा कि बिचौलिये क्यों नहीं खत्म हो पाए हैं। साध ही उन्हें ये भी पता लग गया होगा कि बड़े स्टोर भारत में उसी तरह फायदा कमाने के लिए आ रहे है जैसे हमारे टाटा या इंफोसिस दूनिया के दूसरे देशों में अपने कदम जमा रहे हैं।

    संसद में एफडीआई पर वकीलों का बोलबाला रहा। कपिल सिब्बल दो बार लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद भी वकीलों की तरह बोले। विपक्ष में सुषमा स्वाराज वकील रह चुकी हैं पर पूरी तरह से राजनेता की तरह बोलीं। राज्यसभा में वकील अरुण जेटली पूरे रंग में थे। इन बहस में मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे क्षत्रप भी थे जो आम जनता से जुड़े नेता हैं औऱ उन्हें जमीनी सच्चाई का ज्ञान है। साथ ही महत्वपूर्ण विषयों पर ऐसे क्षत्रपों की कितनी उथली या गहरी पकड़ है ये भी लोगो ने साफ देखा। जाहिर है कि इस बहस से हम जान पाए हैं कि हमारे पुराने नेता जाति, धर्म और क्षेत्रवाद से उपर नहीं उठ पाए हैं....वोट बैंक कि चिंता उनकी सोच पर हावी है। वहीं युवा  बडों औऱ पार्टी लकीर के आगे लाचार दिखे। हालांकि वो इस मकड़जाल से निकलना चाहते हैं।

   यानि संसद में हुई चर्चा ये बताती है कि हमारे समाज को काफी सुधरना होगा। संसद कि चर्चा ये बताती है कि अभी हमारे समाज में काफी विषमता है। संसद की चर्चा हमें बताती है कि हमें किस तरह का नेता चाहिए। संसद की चर्चा बताती हैं कि हमें जागरुक होना होगा और अपनी सोच स्पष्ट करनी होगी ताकि हम सही नेता चुनकर संसद में भेज सकें। ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी ने डरा दिया तो हमारी सोच बदल गई..किसी ने समर्थन कर दिया तो हमारी सोच बदल गई। संसद में इस तरह की चर्चाएं हमें सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि हमें समाजिक औऱ राजनीतिक तौर पर अपने दिमाग को लगातार सक्रिय रखना होगा ताकि हम सही प्रतिनिधी चुन सकें। समाज की सक्रियता जनप्रतिनिधियों को मजबूर करेगी कि वो चर्चा में भाग लें। जब चर्चा होगी तो हमें पता लगेगा कि कौन सा नेता कितने पानी में है। इससे राजनेताओं पर काम करने का दवाब भी बनेगा...औऱ जब काम होगा तो जनता से जुड़े फैसलों पर कुडंली मार के बैठ गई सरकारों से छुटकार भी मिल जाएगा।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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