रविवार, जनवरी 13, 2013

आइए सच में कहें...Let's Celebrate Lhori..Makar Sankranti

आज लोहड़ी है और कल संक्रांति...दो पर्व एक के बाद एक। सभी को दोनो ही पर्वों की शुभकामनाएं। अच्छी फसल की खुशी की प्रतीक लोहड़ी उत्तर-पश्चिम के शहरों में धुमधाम से मनाई जाती है। वहीं सूर्य के उत्तरायण होने के साथ मकर राशि में प्रवेश पर मकर संक्रातिं देश भर में मनाई जाती है। संक्राति के साथ ही इस बार शुरु हो रहा तीर्थराज प्रयाग में महाकुंभ। एक तरफ त्यौहार है तो दूसरी तरफ समाज में चल रही जोरदार उथल-पुथल। ऐसे दौर में हमें फिर से याद करने की जरुरत है कि त्यौहार आखिर मनाए क्यों जाते हैं? क्योंकि कई लोग बस रस्म के तौर पर त्यौहार मनाते हैं। उनके लिए त्यौहार व्यक्तिगत खुशी का प्रतीक होकर रह गए हैं। हालांकि लोहड़ी औऱ मकर संक्राति पर लोग एकजुट होते हैं। पर ज्यादातर जगह इसमें सिर्फ परिवार या रिश्तेदार ही शिरकरत करते हैं। पहले आसपड़ोस के लोग भी जुटते थे। पर अब सामूहिक तौर पर त्यौहार मनाने की परंपरा कम होती जा रही है। सटे घरों में भी हर घर की लोहड़ी अलग-अलग होती है..,...पहले अलग-अलग होते हुए भी इक्ठ्ठी होती थी। आज कहीं न कहीं समाज में दूरियां बढ़ रही हैं। "हम" की जगह "मैं" का बोलबाला होता जा रहा है, जो हमारे समाज के लिए ठीक नहीं है। जबकि त्यौहारों को मनाने की शुरुआत व्यक्तिगत औऱ सामूहिक खुशी को एक साथ मनाने के लिए हुई थी।
हमारे देश में की ये परंपरा सनातन है..इसलिए आज भी इसके पीछे का उद्देश्य सार्थक है। जैसे की आजकल अपने को तरोताज करने के लिए कुछ दिन...सप्ताह या महीने के बाद पार्टीयां देने का रिवाज है या फिर लोग छुट्टियों के बहाने परिवार के साथ कहीं घूमने जाते हैं। इसांन की इसी जरुरत को हमारे ऋषियों ने प्राचीनकाल में ही समझ लिया था। ऋषि जानते थे कि आम इंसान जीवन की आपाधापी में खुश होने के मौके नहीं ढूंढ पाता है और जीवन की एकरसता उसके अंदर का उत्साह कम कर देती है। इसी दुश्चक्र से बचाने के लिए औऱ समाज को स्थायित्व देने के लिए त्यौहार शुरु हुए, ताकि कम से कम त्यौहार के बहाने लोग खुश हों और समाज में एक-दूसरे से मिलें। इसलिए हमारे यहां इतने त्यौहार हैं जितने दुनिया के किसी समाज में नहीं।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ इंसान के व्यक्तिगत जीवन के लिए ही ऋषियों ने काम किया। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर भी ध्यान दिया। इसलिए लगभग हर त्यौहार खेती से जुडा है या वो मौसम के परिवर्तन वाले दिन मनाया जाता है। इसके साथ ही सारे देश में ऋषियों ने एक सिरे से दूसरे सिरे तक धार्मिक यात्राएं भी शुरु कराईं। ये धार्मिक यात्राएं एक तरफ देशवासियों को जोड़ती हैं वहीं इन यात्राओं में अर्थव्यवस्था को गति देने का नुस्खा भी छुपा होता है। ऋषि-मुनि अध्यात्मिक उन्नति के साथ ही समाज के उत्थान के लिए भी सचेत रहते थे। इसिलए ऋषियों ने गृहस्थ जीवन को काफी महत्व दिया है। सभी ऋषियों ने गृहस्थ व्यक्ति को समाज की रीढ़ माना है और गृहस्थ जीवन को संसार की सबसे कठिन तपस्या। मगर हम ये सब भूल चुके हैं। ज्यादातर लोग या तो ज्यादा जानते नहीं या फिर इसके कारण को भूल चुके हैं।  इसी कारण हमारा पतन हुआ और हमने एक हजार साल की गुलामी झेली।

आज जरुरी है कि हम फिर उन परंपराओं को जिंदा करें। चिंता करने की जगह चिंतन की परिपाटी पर लौंटे। तभी इन त्यौहारों की सार्थकता होगी...नहीं तो त्यौहार घिसी-पीटी परंपरा बनकर रह जाएंगे और हम इसे ऐसे ही मनाएंगे जैसे खुशी मनाने के नाम पर पार्टियां देते रहते हैं। इन पार्टियों में पैसों का दिखावा और जनसंपर्क का बहाना ज्यादा होता है। जिसके बाद हम अक्सर तनमन से थक जाते हैं। जबकि त्यौहार हमें तनमन से तरोताजा करते हैं।

 त्यौहार हमें उन मूल्यों से जोड़ते हैं जो स्वस्थ समाज और शक्तिशाली देश के जरुरी हैं। इसलिए हमें उन परंपराओं पर लौटना होगा औऱ इसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना होगा।  वरना आज जिस दोराहे पर हमारा समाज खड़ा है वो आगे भी इसी तरह दिगभ्रमित बना रहेगा  और आने  वाली पीढ़ी टेप पर भजन की तरह गाना बजाती रहेगी Let's Celebrate Lohri...Let's celbrate sankarnti....Lets celebrate Holi....Ah Holi...Oh holli.....चार ठुमके लगाएगी....प्यूज़न के नाम पर भ्रमित अपने मन का...आत्मा का कचरा करती रहेगी। याद रखिए इसके लिए दोषी वो पीढ़ी नहीं, बलिक आज की पीढ़ी यानि हम लोग होंगे....तो इसलिए देरी  हो जाए...उससे पहले जागिए और सही मायने में कहिए औऱ लोहड़ी मनाएं...मिल बैठ कर मकर संक्रांति मनाएं....Let's celebrate Lohri with indian style....

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...