बुधवार, फ़रवरी 06, 2013

My Father...मेरे पिता

दो फरवरी 2011 मौनी अमावस्या वाले दिन पिताजी (पत्रकार रामजी प्रसाद सिंह) ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया था। यानि पूरे दो साल हो गए पिताजी को हमें छोड़कर गए हुए। इन दो सालों में बहुत कुछ बदल गया। संस्कारों में मिले आदर्श और अपनी जिदंगी से मिले सबक के बीच भटकते रहना शायद नियती बन गई है। अभी तो कभी विचारों के इस कोने पर कुछ करता हूं तो कभी उस कोने पर कुछ करता हूं..तो कई बार बीच में ही बैठा रहता हूं। ऐसा कई लोगो के साथ होता है इसलिए मैं अपवाद नहीं। इन दो सालों में इतना ही हुआ है कि फिलहाल भावनाओं के भंवर से बहुत हदतक बाहर निकल गया हूं....पर मानसिक रुप से चिंतन का जो स्तर उपलब्ध था उसकी रिक्तता बुरी तरह सालती है।

लोग कहते हैं कि बरगद के नीचे कोई पेड़ नहीं उगता...परंतु पिताजी ऐसे बरगद न थे। हां दुनिया की नजर में हम बरगद के पेड़ के नीचे उगने वाले पौधे थे....जिसका पेशेवर जिंदगी में खामियाजा भी भुगता। पिताजी ने अपने समय में पत्रकारिता के क्षेत्र में शोहरत की बुलंदियों को छुआ। हिंदी पत्रकार के तौर पर उन्होंने देश की दो सबसे बड़ी समाचार एंजेसियों में से एक हिंदुस्थान समाचार के जनरल मैनेजर तक का सफर किया। IIMC यानि जेएनयू के भारतीय जनसंचार संस्थान में भी दो साल (1987-89) तक पढ़ाया। पिताजी के साथ काम कर चुके पत्रकारों का कहना है कि अदालती कार्रवाईयों को जिन चंद लोगो ने हिदी खबरों कि दुनिया में प्रमुखता से जगह दिला...उनमें पिताजी भी एक थे। रेडियो से लेकर देश भर के हिंदी अखबारों में उनके लेख हमेशा प्रमुखता से छपते रहे। टीवी पर संसद की कार्रवाई बरसों तक पिताजी ने लिखी।

ईमानदारी इतनी की देश के हर बड़े नेता से निजी पहचान के बाद भी कभी व्यक्तिगत फायदा नहीं उठाया। हां कई लोगो की नौकरियां लगीं..कई लोगो के संकट हल हुए। पर अपने लिए या अपने बच्चों के लिए कभी कुछ नहीं कहा। जबकि पिताजी के नाम का सहारा लेकर कई लोगों ने अपना काम निकाला। एक बेशर्म शख्स तो ऐसे निकले जिनको पिताजी बेटा कहते थे उन्होंने एक केंद्रीय मंत्री से अपनी पत्नी को पिताजी की बहु बताकर उनकी नौकरी पक्की करा ली। जबकि हम दोनो भाई आज की तारिख में भी अविवाहित हैं।  

देश के लगभग हर राज्य के बड़े या मझोले नेता से पिताजी की निकटता रही। उस दौर के नेता ईमानदार लोगो की कद्र भी किया करते थे। एक दौर ऐसा था कि लोकसभा के 150 से ज्यादा सांसद पिताजी को जानते थे। देश के राष्ट्रपति रहे स्वर्गीय शंकरदयाल शर्मा ने इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के वक्त पिताजी के कंधे पर पीछे से हाथ रखकर पूछा था कि रामजी बाबू आप कहां रहते हैं...आते नहीं....न बुलाते हैं। पिताजी उनकी काफी इज्जत करते थे। पिताजी उस वक्त सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए थे। ऐसी ही स्थिती अक्सर संसद में भी पैदा हो जाती थी। एक बार नालंदा जिले के सांसद ने पिताजी को संसद में पीछे से आवाज लगाई। पास आकर उन्होंने बड़ी ही निश्छलता के साथ अपना परियच देते हुए कहा कि रामजी बाबू "मैं" आपके जिले का सांसद हूं। जबकि दस साल पहले वो हमारे घर आ चुके थे। इस तरह की निश्छलता अब नेताओं में कम ही देखने को मिलती है। या कहें कि समाज के हिसाब से वो भी बदलने लगे हैं।

कहने वाले कहते हैं कि कांग्रेस औऱ आरएसएस या अब भाजपा की "जो हमारी पार्टी में नहीं वो हमारा दुश्मन टाइप की सोच" ने पिताजी जैसे अनेकों ईमानदार पत्रकारों को उचित सम्मान से वंचित रखा जिसके वे हकदार थे। यानि एक पत्रकार जो कहीं भी काम करे पर जिसकी आस्था पत्रकारिता की तरफ हो वो हमेशा मिसफिट ही रहेगा। पिताजी ने अपने गांव में स्कूल, अस्पताल तक बनवाया। वो भी तब जब वो कोई खास नौकरी नहीं करते थे। सिर्फ अपनी ढृंढ इच्छाशक्ति से अपनी जमीन पर हाई स्कूल बनवाया। स्कूल का नाम चीन के साथ नेफा में हुई जंग में शहीद हुए सैनिकों के नाम पर नेफा बलिदान स्माकर रखा। फिर स्कूल सरकार के हवाले कर दिल्ली चले आए। यहां तक की आखिरी दिनों में भी पिताजी गांव में कॉलेज बनवाने की योजना पर विचार कर रहे थे। यानि अंतिम दिनों तक कर्मयोगी बने रहे।

पिताजी दहेज प्रथा के सख्त खिलाफ थे। लड़की का पिता अपनी पुत्री को देना चाहे दे..पर लड़के वाले की तरफ से किसी तरह की मांग पर काफी नाराज हो जाते थे। लड़कियों के  ब्याह जैसी समाजिक जिम्मेदारी को पिताजी ने पूरी तल्लीनता से ताउम्र निभाया।  पिताजी मानते थे कि जो लड़की की शादी में किसी तरह का अडंगा लगाता है उससे बड़ा पापी नहीं।

ये कड़वा सच है कि इतने ईमानदार औऱ कर्मठ लोगो की संताने विरासत में मिले आदर्श और हकीकत के अंतर को झेलने के कारण काफी परेशान रहती हैं। एक तरफ इतना ईमानदारी भरा जीवन औऱ उच्च चरित्र  औऱ दूसरी तरफ उससे मिली परेशानी को देखते ऐसे रास्ते से बचकर चलने की कोशिश अक्सर दुविधा में डाल देती है। पिताजी से फायदा उठाने वाले लोग उनके अंतिम दर्शन तक में नहीं आए। पिताजी के नाम पर टिकट लेकर विधानसभा से लेकर मंत्रीपद तक पहुंचने वाले लोग नहीं पहुंचे...। उनके आसरे नौकरी में लगे लोग कहीं नजर नहीं आए।

कहना आसान होता है कि प्रेरणा लें....पर विरासत को संभाल कर रखना इतना असान नहीं होता। वो भी तब जब ऐसे जीवन में आने वाली कठिनाईयां आंखों देखी औऱ खुद झेली हों। समाज जब कर्मयोगियों को भूलने लगता है..उनका उचित सम्मान नहीं करता है..तो वो किस मुंह से उम्मीद करता है कि इन लोगो की संताने उस विरासत को निर्वाध तरीके से संभालेंगी। वैसे ये हिंदी संसार औऱ हिंदी पत्रकारिता की पुरानी आदत है कि वो ज्यादातर अपने कर्मयोगियों को भूल जाता है।

मुझे आज अपने एक बड़े भाई साहब की बात शिद्दत से सही महसूस हो रही है। जो उन्होंने पिताजी के अंतिम संस्कार के वक्त कही थी....
"रोहित ...चचा की बात चचा के साथ गई....अपनी सोचो...क्या कर रहे हो.....कोई नहीं देगा साथ....एक ही बात याद रखो...रुपया जो पल्ले...हुक्म जो चले....समझे."

कितना सही कहा था उन्होंने...।  आज ये बात पूरी तरह से समझ आ रही है।

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