रविवार, मार्च 03, 2013

1 करोड़ कमाने वाले सिर्फ 42000? वाह क्या बात है...

बजट आ गया..औऱ देशवासियों के हाथ में झुनझुना पकड़ा दिया गया..सरकार के अनुसार देश के हालात टैक्स छूट में बढ़ोतरी की इजाजत नहीं देते। देश की इस हालात के लिए जिम्मेदार कौन है? वित्त की देखभाल करने वाले मंत्री..अधिकारी या हम सब। ताली जैसे एक हाथ से नहीं बजती उसी तरह वित्तिय संकट के लिए सब जिम्मेदार हैं। एक प्रशासक के तौर पर मंत्री देश के लिए सोच नहीं पाते..अफसर जिस मशीनरी का हिस्सा हैं उसे भ्रष्टाचार का दीमक जर्जर करता जा रहा है...जो अफसर ईमानदार होता है वो या तो किनारे धकिया जाता है या नौकरी छोड़ देता है...जो नौकरी में रह जाता है वो ऐसी जगहों पर फेंक दिया जाता है जहां उसकी उपयोगिता नहीं होती या वो ट्रासंफर की मार झेलता रहता है।

    रह गए नौकरीपेशा....सरकारी हों या निजी क्षेत्र के कामकाजी....तो इन लोगो की तनख्वाह मार्च के पहले के महीनों से ही कर काट कर कंपनी या सरकार द्वारा दी जाती है। इस दायरे में आने वाले लोग 500-1000 रुपये भी टैक्स कटने पर सरकार को गालियां देने लगते हैं। दोष इनका भी नहीं। महंगाई के दौर में सालाना 2,00000 या उससे कम की आमदनी में खर्च चलाना मुश्किल होता है....परंतु 100-2000 के बीच टैक्स देने पर इतनी भी हाय-हाय नहीं मचानी चाहिए।

   अब जरा नज़र डालिए एक करोड़ की आमदनी वालों  की संख्या पर...42.000। वाह!  क्या बेहूदा मजाक है। जरा आसपास के बाजारों पर नजर घुमाइए। सारे देश में ऐसे बाजारों की संख्या हजारों में है जहां भारी कारोबार होता है। जब ऐसे बाजारों की तादाद हजारों में है, तो क्या हमारे देश में सिर्फ 42,000 लोग ही एक करोड़ रुपया कमाते होंगे? ये क्रूर मजाक से कम नहीं है। देश में 25 करोड़ लोग मध्यमवर्ग में हैं। इनमें एक करोड़ कमाने वालों की संख्या लाखों में होगी, मगर ये वर्ग अपनी आमदनी को कम दिखाता है। ये एकांउटेंट के पास जाते हैं कम आमदनी दिखाने के तरीकों के बारे में जानने के लिए। जबकि ये लोग एक-दो लाख का टैक्स भरें तो इनका खजाना खाली नहीं हो जाएगा। सरकार का खजाना इससे भर जरुर जाएगा। ऐसे कई प्रोपटी डीलर हैं जो छोटी-मध्यम डील से बीसेक लाख सलाना कमाते हैं..पर वो आमदनी की तुलना में न के बराबर टैक्स देते हैं। ऐसे ही कई किराना, कपड़े-लते और इल्रेक्ट्रॉनिक आइटम्स के दुकानदार हैं जिनकी आमदनी लाखों औऱ करोड़ों में है..पर सही टैक्स भरने से बचते हैं। जब  इतना काला पैसा बाजार में घूमता रहेगा...और इतना ही घोटालों के जरिए कहीं ओर पहुंच जाएगा तो देश की आर्थिक हालत पर असर तो पड़ेगा ही। इसका खामियाजा सीधे नौकरी करने वालों को ही पहले भुगतना पड़ेगा।

   सीधा सा फलसफा है...जहां समाज चोरी की आदत डालेगा तो उनका नेता भी उनके जैसा ही होगा। जहां समाज जागा रहेगा वहां उसकी अगुवाई करने वाले लोग सजग रहेंगे। जब अगुवाई करने वाले सजग रहेंगे तो प्रशासन भी चौकस होगा। यानि साफ है कि हमें खुद आगे आकर समाजिक जिम्मेदारी निभाने की आदत डालनी होगी। अपनी आंखें खोल कर नेताओं का चयन करना होगा। साथ ही उन्हें अपने सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य करें।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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