शुक्रवार, मार्च 29, 2013

गायब मस्ती..सूखी होली...सोया-जागा निज़ाम

अजब है हमारे देश में सितारों का खेल....जहां एक ही त्यौहार अलग-अलग जगह पर अलग-अलग दिन मनाया जाता है। खैर दिल्ली में बुधवार को  होली खेली गई। बाजार  हर तरह की पिचकारियों और रंगों से भरे थे...लोगो की भीड़ भी मौजूद थी...पर जाने क्यों इस बार दिल्ली में होली की मस्ती नजर नहीं आई..बच्चे हुड़दंग तो मचा रहे थे...पर बड़े घरों में घुसे हुए थे...पहले लोगों की टोलियां निकलती थी....मुहल्ले में घर-घर जाकर रंग लगाती थी...इससे कोई अकेला भी होता था तो उसे त्यौहार की खुशी महसूस होती थी....पर अब ये बातें जाने कहां गायब हो गई हैं? सड़कों पर होली खेलने वाली टोलियां जाने कहां नदारद हो गई हैं....कुछ बरस पहले कान्हा की नगरी में था...मथुरा औऱ वृंदावन...दोनो ही जगह छोटी होली को मौजूद था...पर वहां की गलियों में वो हुलियारों की टोली नहीं दिखी जिसका बखान होता है..लगा जैसे कान्हा खुद ही मंदिरों और आश्रमों में कैद हो गए हों...जहां फूलों से...लड्डुओं से...रंगों से..पानी की बौछार से कान्हा से होली खेली जाती है..पर सड़कों से..गलियों से....गोपी और गोपियां दोनों नदारद दिखे...दिल्ली जैसे शहर में तो होली कई साल पहले से ही मॉल्स...फॉर्म हाउस...और होटलों में कैद होने लगी थी..अब तो होली इन्हीं जगहों की मेहमान बन गई है..।
      हमारा निजाम भी कम नहीं है...सड़कों पर सख्ती के नाम पर गाड़ियों का आना-जाना बंद कर दिया है..हालांकि दिल्ली का ट्रैफिक विभाग काफी मेहनत करता है..और सड़क पर शांति बनाए रखता है...पर होली पर सख्ती से बाइक सवारों पर लगाम लगाने वाला निजाम दूसरे त्यौहारों पर जाने कहां गुम हो जाता है? पिछले साल इंडिया गेट पर सिर्फ टोपी लगा कर हजारों की तादाद में लोग हुड़दंग मचाते रहे....सड़कें जाम रही..पर सब चुप रहे....न ही पुलिस-ट्रैफिक की मौजूदगी ढंग से नजर आई.. मोटरसाइकिलें पर एक नहीं चार-चार लोग सवार घुम रहे थे....पर तब ये निजाम चुपचाप था...
   
आजकल कहा जा रहा है कि होली के दिन पानी का प्रयोग न करें....जाहिर है पानी कि अहमियत है..पर क्या एक दिन पानी बचाने से परिवर्तन आएगा...क्या हम त्यौहार की बचीखुची खुशी खत्म कर लें...जैसे पानी बिन सब सुन...वैसे ही होली भी बिन पानी सूखी...ये ठीक है कि जहां सूखा हैं वहां सूखी होली खेलनी चाहिए...पर बाकी जगह क्यों? होना ये चाहिए कि एक दिन पानी बचाने की जगह हम हर दिन पानी की बर्बादी को रोकने की कोशिश करें। दिल्ली जैसे शहर में पानी की कमी क्यों हुई? क्या ये बताने की जरुरत है कि दिल्ली में अधिकांश प्राकृतिक तलाबों  को पाट कर उनपर मकान बना दिए गए है..दिल्ली में जब जंगलों को तबाह किया जा रहा था...तब प्रशासन क्यों सोया हुआ था? 
    भू-माफिया के साथ मिलकर प्रशासन औऱ नेता दिल्ली की प्यास बुझाने वाले स्रोतों को तबाह करने पर तुले हुए हैं...औऱ जाने कबतक इसी तरह ये गठबंधन चलता रहेगा...यानि हमारे अह्म....सोते प्रशासन...तुष्टीकरण की नीति....इन तीनों का का खामियाजा हमारे त्यौहार भूगतते रहेंगे...

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