रविवार, मार्च 24, 2013

पश्चाताप है तो संजय दत्त सजा भुगतें...Rohit


एक सीधी सी बात में राजनीति घुसी नहीं कि उसका बंटाधार होते देर नहीं लगती। संजय दत्त का मामला इसका ताजा उदाहरण है। है। मामला एकदम सीधा-साधा है...संजय दत्त ने एक गुनाह किया औऱ उसकी सजा उन्हें मिली..वो भी न्यूनतम..। उच्चतम न्यायालय ने रहम दिखाते हुए दस आरोपियों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदला और तो संजय दत्त की 6 साल की सजा घटाकर 5 साल कर दी। मगर संजय दत्त की सजा का ऐलान होते ही नेता और अभिनेता से नेता बने लोगों ने इस तरह से बयान देना शुरु कर दिया...जैसे संजय दत्त को माफी के लिए अपील करने की भी जरुरत नहीं है। सबसे विस्मित तो लोग जस्टिस काटजू के बयान पर हुए। जबकि आजकल काटजू साहब देशभर को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के कारण सुर्खियों में रहते हैं। मीडिया तो आए दिन उनके कटाक्ष का निशाना बनता रहता है।  काटजू साहब कह रहे हैं कि वो संजय दत्त की सजा माफी की अपील करने के लिए खुद गवर्नर के पास जाएंगे। काटजू साहब तो जज रहे हैं उच्चतम न्यायाल के। बेहतर ये नहीं कि वो उन हजारों गरीबों की पैरवी करें जो मामूली सजा वाले अपराध में भी वर्षों से जेल में बंद हैं।
  
   आम जनता के दिलों में संजय दत्त को लेकर सहानूभूति पहले से ही थी। कुछ नरगिस-सुनील दत्त का बेटा होने के कारण और कुछ संजय दत्त की फिल्मी छवि का असर। जनता संजू बाबा को लेकर सॉफ्ट थी। ऐसे में अगर कुछ महीने की सजा काटने के बाद संजय दत्त को प्रोबेशन पर छोड़ा जाता तो इतना हंगामा नहीं बरपा होता। मगर जिस तरह से उनकी सजा माफी पर उछलकूद मची उससे लोगों में भारी नाराजगी है। नेताओं, फिल्म इंडस्ट्री के लोगों और काटजू जैसी शख्सियतों के उलूलजुलूल बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है। इससे सजंय दत्त को ही नुकसान हुआ है...लोगो के दिलों में उनको लेकर सहानुभूति कम ही हुई है। लोग सीधे पूछ रहे हैं कि करनी का दंड संजू बाबा क्यों नहीं भुगतना चाहते।

सांसद जया बच्चन कहती हैं कि संजय दत्त 20 साल से एक छोटी सी गलती की सजा भूगत रहे हैं। जया जी की बात मान ली जाए तो कई सवाल ऐसे हैं जो जवाब का इंतजार कर रहे हैं...
  • मुंबई धमाकों में आधिकारिक आंकडों में जो 245 मौतें हुईं औऱ 700 घायल हुए... उनके परिजन 20 साल से जो सजा भुगत रहें हैं..क्या उसकी कोई कीमत नहीं है? 
  • संजय दत्त को टाडा अदालत ने भले ही धमाकों की साज़िश का हिस्सा होने के आरोप से बरी कर दिया था....पर मुंबई धमाकों के साज़िशकर्ताओं से उनकी गहरी दोस्ती का कोई मतलब नहीं?
  • बावजूद इसके क्या अंडरवर्ल्ड से दोस्ती और लगातार संपर्क में नहीं रहे संजय दत्त। 
  • क्या इसे संजय दत्त को उनके राजनीतिक पिता के रसूख का मिला फायदा नहीं कहा जाए?  
  • क्या एक नेता होने के नाते सुनील दत्त ने पिता के तौर पर किया वो समाज को सही संदेश देता है?
  • क्या संजय दत्त बताएंगे कि सरकारी सुरक्षा के बाद भी उन्हें अपने परिवार की सुरक्षा कि चिंता क्यों हो रही थी।  

   संजय दत्त के समर्थन में ये भी तर्क दिया जा रहा है कि उन्होंने लगे रहो मुन्नाभाई जैसी फिल्मों के जरिए गांधी के आर्दशों को जनता के बीच पहुंचाया है...वो काफी चैरिटी करते हैं...उनके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं।  इसका मतलब तो ये निकला कि....
  • अगर अपराधी अमीर है तो उसे कह दिया जाए कि... भाई चैरिटी कर...हम तुझे प्रोबेशन पर छोड़ते हैं....
  • जा तू कमा-खा...नाम कर...शादी कर...बच्चे पैदा कर...ऐश कर.... 

और जिसके पास चैरिटी के लिए पैसे नहीं हैं....वो जेल में ही सड़ते रहें..मां-बाप..बीबी-बच्चे तो दूर...सालों तक जेल की चारदिवारी के बाहर की दुनिया की शक्ल तक न देख सकें।

वाह रे हमारे नेता जन...और फिल्मी दुनिया के कलाकारों....वाह रे धन संपन्न कुबेरों के हिमायतियों...।  मान गए...।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...