बुधवार, अप्रैल 24, 2013

चाणक्य, चीन और हमारे हालात

दगाबाज-एहसानफरामोश-दुश्मन पड़ोसी मुल्क

देश के अबतक के इकलौते ऐतिसाहिक औऱ सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ की बातें मानें तो देश के हालात 70 फीसदी रहने लायक नहीं हैं। देश के 90 फीसदी नेताओं पर विश्वास नहीं करना चाहिए। हमारे समाज की 70 फीसदी हालत खस्ता है। महान कूटनीतिज्ञ की बात माने या न माने...आने वाले 25-30 साल में नदियां हमारे उजड़ने या पलायन करने का सबसे बड़ा कारण बन जाएंगी। करीब 23 सौ साल पहले महान राजनीतिज्ञ चाणक्य की बातें आज साकार रुप से देश में दिख रही हैं। आज राजनीतिक नेतृत्व के कारण हमारा शासनतंत्र, आर्थिक तंत्र, समाजिक तंत्र औऱ पड़ोसी से संबंध सभी चिंताजनक स्थिती में है। सबसे पहले बात करते हैं पड़ोस में मौजूद मुसिबतों की।

चीन
       देश की पूरी उत्तरी सीमा इस समय अशांत हैं। हमसे बुद्द का ज्ञान लेने वाला और 1962 में हमारी पीठ में छूरा घोंपने वाला चीन इस समय हमारी सीमा में अपनी सैनिक चौकी बना चुका है। वो भी तब जब चीन के नए प्रधानमंत्री पहली विदेश यात्रा पर भारत का दौरा करने वाले हैं। हालांकि विदेश मामलों के जानकार चीनी प्रधानमंत्री के भारत दौरे पर चीनी सेना की इस हरकत से हैरत में हैं। कुछ का कहना है कि ये घुसपैठ चीनी नेता और वहां कि सेना के बीच नीतियो को लेकर टकराव का नतीजा है। तो क्या माना जाए की भारत से संबध सुधारने की चीनी प्रधानमंत्री की बातें वहां के कुछ जनरलों को रास नहीं आ रही है?
    भारत की इंडो-तिब्बत फोर्स की एक टुकड़ी उस इलाके में तैनात कर दी गई है। बावजूद इसके चीन कह रहा है कि उसके सैनिक अपनी सीमा में ही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारी सैन्य टुकड़ियां विवादित सीमा का बहाना करके चीन की सीमा में घुसपैठ क्यों नहीं करतीं? अगर चीनी सेना पीछे नहीं हटती तो छोटे स्तर पर सैन्य टकराव से हमारी सरकार क्यों डर रही है? जब जापान विवादित द्वीप के मुद्दे पर चीन को करारा जवाब देने की धमकी दे सकता है तो हमारे नेता खुलकर क्यों डर रहे हैं?
      इसका सीधा कारण है हमारी ढीली-ढाली हुकुमत। पाकिस्तान की सेना ने जब हमारे सैनिकों के गले काटे थे, तब भी सिर्फ बयानबाजी हुई थी। हमारे उस समय के ढीले रवैये के बाद ही चीन ने ये हिमाकत की है। हालांकि चीन पिछले कुछ साल से हमारी सीमाओं में अक्सर घुसपैठ करता रहता है। सीमावर्ती जिलों के कलेक्टर कई बार इस बारे में पत्र लिखकर भारत सरकार को सूचित कर चुके हैं। मगर हालात वही हैं ढाक के तीन पात।
बांग्लादेश    
हमारे खून-पसीने से हमारी ही जमीन पर बना दूसरा पड़ोसी देश बांग्लादेश हमारे लिए दीमक बन चुका है। देश के हर हिस्से में अवैध बांग्लादेशी मौजूद हैं। पूर्वोत्तर के हालात गंभीर हैं। वहां मुख्यभूमी के लोगो को भगाकर बांग्लादेशी भारी तादाद में बस गए हैं। इन अवैध एहसान फरामोश बांग्लादेशियों को गोली मारने की जगह नेता वोट बैंक के तौर पर देखते हैं। जब कोई कार्रवाई होती है तो नेता अल्पसंख्यकों का राग अलापने लगते हैं।
श्रीलंका-मालदीव
   श्रीलंका से रिश्तों में पलीता लगाने का काम जयललिता-करुणानिधी कर रहे हैं। तमिलों पर अत्याचार के बहाने वो केंद्र सरकार पर दवाब बनाते रहते हैं कि केंद्र सरकार श्रीलंका के मामलों में खुलेआम हस्तक्षेप करे। तो उधर मालदीव की सरकार हमारे खिलाफ लगातार उकसावे की कार्रवाई कर रही है। वहां के पूर्व राष्ट्रपति ग्यूम साहब भूल गए हैं कि  विद्रोहियों से उनको..उनकी सत्ता और मालदीव को हमने ही बचाया था। मगर आज उनकी समर्थित पार्टी ही हमारे देश के लिए मुसीबत खड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं। ये सब सिर्फ इसिलए हो रहा है कि हमारे नेता शांति का पाठ रटते हुए ये भूल जाते है कि शांति की रखवाली ताकतवर ही कर सकते हैं। 

   देश की राजधानी दिल्ली के केंद्र में ही भारत के महानकूटनीतिज्ञ के नाम पर बसा चाणक्य पुरी है। वहीं चाणक्य के दूसरे नाम कौटिल्य के नाम से एक सड़क भी है। चाणक्यपुरी में अधिकतर विदेशी दूतावास हैं। ऐसा लगता है कि हमारे कूटनीतिज्ञ की सीख पर विदेशी तो अमल करते हुए कौटिल्य मार्ग पर चल रहे हैं....पर हमारे राजनेता सबकुछ जानते हुए भी कौटिल्य के दिखाए मार्ग को छोड़कर पतली गलियों से निकल जाते हैं। 

हकीकत है कि बिना भय के प्रीति नहीं होती। बिना डर के सम्मान नहीं पैदा होता। ताकतवर की बात दुनिया सुनती है। तो जैसे बबूल के पेड़ पर आम नहीं उगते..उसी तरह ये पड़ोसी देश कभी नहीं सुधरने वाले। इसिलए हमें लगातार अपनी ताकत का एहसास इन एहसानफरामोश विश्वासघाती पड़ोसी देशों को कराते रहना होगा। 
                                                                          (क्रमशः)

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