केदारनाथ धाम के दर पर


बारिश की रिमझिम...बदल गई मूसलाधार में
बारिश भी बड़ी अजीब है...जब रिमझिम बरसती है तो मन में कसक होती है....जब मूसालाधार बरसती है तब भी कल्पनाओं और मीठे दर्द को हवा दे देती है....पर जब यही बारिश बेहिसाब बरसती है तो ऐसा दर्द दे जाती है जो याद आने पर सिर्फ सिहरन पैदा करती है...आखिर ये कैसा रंग है प्रकृति का...कभी प्यार का एहसास जगाती है..तो कभी जीवन भर के असहनीय दर्द का बायस बन जाती है....शुरुआती नजर में ये आपदा प्रकृति का कोप नजर आती है....जिसमें मोक्षदायिनी गंगा भी काल का रुप लगने लगती है...
अपनी सीमाओं को तोड़ती नदियां

  उत्तराखंड में लाखों तीर्थयात्री अलग-अलग जगह पर पहुंचे हुए थे...बरसों से चले आ रहे रिवाज के मुताबिक गर्मी के मौसम में तीर्थयात्रा चालू थी...किसी को सपने में गुमान नहीं था कि बीस-बाईस दिन बाद आने वाला बरसात का मौसम समय से पहले पहुंच जाएगा...और बरसात के बादलों पर चढ़कर काल अट्टाहस करने लगेगा। लोग निश्चिंत थे...मैदानी प्रदेशों में तीर्थयात्रियों के परिजन चैन की नींद ले रहे थे...पर अचानक सबकुछ बदल गया....आसमान का रंग बदल गया.....बादल फट गए...झीलें पानी अपने में समेट नहीं सकीं और तटबंध टूट गए....पानी काल की रफ्तार के साथ नीचे बह चला.....टीवी पर चलने वाली खबरों और अखबारों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगो की नींद छीन ली....पूरे 48 घंटे तक पता नहीं चला कि क्या हुआ...कहां कौन बचा...कहां कौन फंसा....कुछ पता नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे प्रकृति का क्रोध ठंडा शांत हुआ...उफनती नदियां कुछ-कुछ अपनी सीमाओं में आने लगी....तब दिखा तबाही का वो मंजर..जिसे देखने वाला हर इंसान दहल गया.....

 
सेना मुस्तैद...प्रशासन सुस्त
केदारनाथ धाम के द्वार पर लगी हजारों भक्तो की भीड़ बाबा के दरवाजे पर ही लाशों में तब्दील हो गई....कई तीर्थयात्रियों औऱ स्थानीय निवासियों को गंगा समेत अनेक नदियां अपने साथ बहा ले गई..। रामबाग...जैसे कुछ जगहों का नामोनिशान मिट गया। गंगोत्री..यमनोत्री..रुद्रप्रयाग...चमोली..हर जगह हजारों स्थानीय और तीर्थयात्री फंस गए..सड़कों का संपर्क टूट गया..
 दो दिन तक सरकार और प्रशासन पंगु बने रहे...दो दिन सरकार और प्रशासन के लोग बदहवास थे...राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की जिन कमियों की तरफ उंगली उठाई जाती थी...वो खुलकर विध्वंस के रुप में नजर आ गई.....ऐसा नहीं है कि कर्ताधर्ताओं को पता नहीं था कि हालत इतने बदतर हो जाएंगे...पर सभी लापरवाह थे। तीन दिन बाद सेना ने मोर्चा संभाला तो आपसी समन्वय की कमी दिखी...सेना पूरी ताकत से राहत काम में नही जुट पाई।

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