शनिवार, जून 29, 2013

पहाड़ की त्रासदी...हमाम में हम सब नंगे

देश का सरकारी अमला कुंभकरणी नींद सोता है। ये तबतक नहीं जागता जबतक कोई आपदा नहीं आए। जब ये जागता भी है तो ठीक उसी तरह धाराशाही हो जाता है जिस तरह कुंभकरण हुआ था। माउंटरिंग की ट्रैनिंग ले चुके कई स्थानीय युवाओं ने अपने कष्ट के बाद भी दूसरे लोगो की जान बचाई। वरना जाने कितनी औऱ जानें जा सकती थीं। यानि  हमें पता सब है कि कब क्या करना है..कैसे करना है....मगर मुश्किल है कि इसको अमली जामा पहनाने के मामले में घोर लापरवाही बरती जाती है...जिसका खामियाजा इमानदार लोगो को भुगतना पड़ता है। अगर आपदा प्रबंधन को स्कूली स्तर पर ही अनिवार्य कर दिया जाए तो जानी नुकसान कम हो जाएगा। जरा इस स्थिती पर नजर डालिए...
  • प्रधानमंत्री के अधीन बने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन में कोई फुलटायम डायरेक्टर नहीं है
  • गठन के सतर साल बाद भी बाढ़ की पूर्व सूचना देने वाले विभाग की जानकारी से लाभ नही उठाया जा रहा है.
  • अबतक बाढ़ और नदी के तट के अंदर अतिक्रमण पर कहीं रोक नहीं लग पा रही है 
  • आपदा प्रबंधन के लिए हैलिकॉप्टरों का इस्तेमाल करने में देरी हुई 
  • प्राइवेट हैलिकॉप्टर को इमरजेंसी कानून के तहत तत्काल राहत के लिए नहीं लगा पाई सरकार
  • सेना जाबांजी औऱ तत्परता से काम करती है..अगर हर बार सेना का इस्तेमाल करना है तो राज्य के आपदा प्रबंधन के लोग किस बात की तनख्वाह लेते हैं?
सरकार को चुनती है जनता...जो खुद कम नहीं हैं..क्योंकि इसी जनता से निलकते है लालची व्यापारी.....धन के लिए कुछ भी करने वाले लोगों ने पहाड़ों को बर्बाद कर दिया। आज....
  • पहाड़ों के सभी तीर्थस्थानों के साथ ही पर्यटन स्थलों में विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगल हैं...
  • नदी किनारे जमीन पर बिना बुनियाद की जाने कितनी मंजिलें खड़ी कर दी..
  • प्रकृति की कई चेतावनी के बाद भी सचेत नहीं होते लोग..
  • एक के बाद एक होटल खुलते गए...
  • बिल्डर लॉबी रुपए के लोभ में कई आशियाने खड़े करती गई
आखिर प्रकृति कब तक बर्दास्त कर पाती...उसने एक बार फिर सजा देने की ठान ली। 
अब याद कीजिए सिर्फ पचास-साठ साल पुराना समय....जब तीर्थयात्रा के लिए निकले लोगो को तिलक करके लोग भेजते थे...ये मान लिया जाता था कि वो तीर्थयात्रा पर जाने वाले अपने परिजनो के अंतिम दर्शन कर रहे हैं....इन तीर्थायात्रियों में जो देशभर में फैले तीर्थस्थानों की यात्रा कर लौट आता था उसे बड़ा भाग्यशाली माना जाता था...। तो क्या फिर से वही समय आ गया है कि तिलक लगा कर हम अपने परिजनों को तीर्थयात्रा पर भेजें.. 
तो क्या चांद पर राकेट पहुंचाने वाले देश के नागरिकों की आत्माएं इसी तरह भयंकर आपदा का शिकार होकर ही संसार से बाहर जाने के लिए अभिशप्त रहेंगी?
   कहा जा रहा है कि इस भयंकर आपदा के समय भगवान भोले शंकर ने भी किसी की फरियाद नहीं सुनी....। तो क्या आस्था से किनारा कर लिया जाएक्या तीर्थयात्रा का कोई महत्व नहीं हैसवाल कई हैं...पर उतर भी अनेक हैं....जितने मरे उससे कहीं ज्यादा लोगो की जान बची....आस्था के केंद्र पर लोग अब पर्यटन स्थल के तौर पर भी जाते हैं। लोगों एक पंथ दो काज वाला फॉर्मूला यहां भी अपनाते हैं। घूमने के साथ-साथ तीर्थ का पुण्य भी साथ-साथ...। अब सवाल उठता है कि क्या इसलिए भगवान कुपित हुए...मगर ऐसा नही हो सकता....ऐसी निर्दोष इच्छा पर भगवान नाराज नहीं हो सकते....हां तीर्थ यात्रा का ये लिखित नियम है कि ऐसे जगहों की पवित्रता बनाए रखें।
आस्था के केंद्र पर पाप नष्ट होते हैं...ऐसे में तीर्थ स्थलों पर पाप करेंगे तो फिर कहां मोक्ष मिलेगा? 
ये भी लिखित नियम है कि पवित्र स्थानों को हनीमून का स्पॉट नही समझा जाना चाहिए। ऐसे में ये सवाल उठता है कि जो वहां रहते हैं क्या वो इससे निरपेक्ष रहते हैं....तो इसके लिए स्पष्ट किया है कि जो लोग वहां रह रहे हैं वो स्वाभाविक कार्य करते हैं..मगर मर्यादा के साथ.....जबकि जो बाहर से आते है वो मर्यादा का उल्लघंन करने लगते है। 
जब भी आप प्रकृति से बिना सहजता निभाए विकास करेंगे...तो नतीजे इतने ही भयंकर होंगे....
जितना बिना सोचे-समझे डायनामइट से पहाड़ों के सीने छलनी करेगा इंसान...उससे कहीं ज्यादा दर्द प्रक़ति आपको देगी। अभी भी समय है कि सब जागें। सरकारी अमले को....नेताओं को...और इनसबसे बढ़कर आम आदमी को..वो आम आदमी जो अपने पीछे प्लास्टिक जैसा जाने कितना प्रदूषण पहा़ड़ों पर छोड़ आता है..यही प्रदूषण पहाड़ की सांसे अवरुद्ध कर देता है।  जाहिर है कि सिर्फ सरकार को कोसने से काम नहीं चलेगा...खुद की गलतियों को सुधारा जाएगा तभी कुछ भला होगा..। जय शिव शंकर....जय शिव शंभू

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...