शनिवार, जून 08, 2013

Zia Khan....ज़िंदगी है बेवफ़ा ?

जिंदगी कैसी है पहेली?

जिया खान की मौत ने डिप्रेशन की समस्या को फिर से लाइमलाइट में ला दिया है। मोहब्त में नाकामी या शक, या फिर कैरियर में आया ठहराव....या दोनो। जाने क्या था कि जिया खान को ज़िंदगी बेरौनक लगने लगी औऱ उन्होंने दुनिया ही छोड़ दी। जिया खान की मौत पर बड़े आराम से कई लोगो ने कह दिया कि ये बॉलीवुड की चमकती दुनिया के पीछे का काला सच है। कितनी आसानी से बात को रफादफा कर दिया लोगो ने। हकीकत में जिया खान की मौत के मामले पर ये सच पूरी तरह सटीक नहीं बैठता। दरअसल आत्महत्या कोई भी कर सकता है। कामयाब प्रोफेशनल से लेकर कर्ज में डूबा किसान, लोग रोजाना आत्महत्या कर रहे हैं। शहरों में अकेलापन लोगो की जिंदगी लील रहा है। कामयाबी की अंधी दौड़ में भागता इंसान जब हारने लगता हैस तो मौत को गले लगा लेता है, मगर हर जगह कारण अलग-अलग होते हैं। इसमें शक नहीं कि जिया खान की मौत के कारणों में कहीं न कहीं प्रोफेशनल जिंदगी की जद्दोजहद भी है। चमकती दुनिया का कोई सफेद-काला झूठ नहीं। 
   
बिग बी-नाकामयाबी से जिंदगी में निराश नहीं हुए
जिया खान की खुदकुशी की खबर रात को करीब पौने चार बजे जिस वक्त नेट पर देखा उसके कुछ क्षण बाद ही अमिताभ बच्चन का tweet 
आया। अमिताभ बच्चन इस खबर से सन्न रह गए। देखा जाए तो बिग बी ने भी फिल्मी जीवन में कम संघर्ष नहीं किया। एक दौर था जब 4-5 साल संघर्ष करके अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वापिस लौटने की तैय़ारी में थे बिग बी...पर किस्मत ने करवट बदली...और एक कलाकार से मेगास्टार तक का सफर किया अमिताभ ने। बावजूद इसके कि उनका परिवार उस वक्त भी देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार का काफी करीबी था। बाद के दिनों में अमिताभ दुर्घटना का शिकार होते रहे..पर काम करते रहे। मेगास्टार होने के बाद भी एक दौर फिर से आया जब लगा कि अमिताभ खत्म हो गए हैं। मगर अमिताभ ने हार नहीं मानी...और बाकी कहानी आज इतिहास बन चुकी है। आज ही पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि दुनिया में कई लोग दुखी, चिंतित और जीवन से निराश हैं क्योंकि उनके सपने साकार नहीं हो पाए..और वो उनसे जीवन में हार न मानने का निवेदन करते हैं।
    प्रोफेशनल लोगों में अधिकतर के सामने गरीबों की तरह पेट की आग शांत करने की मुश्किल नहीं होती....किसानों और छोटे व्यापारियों की तरह रोज कर्ज मांगने वालों की फौज इज्जत नीलाम करने की धमकी नहीं दे रही होती। फिर भी प्रोफेशनल लोग आत्महत्या कर लेते हैं। सिर्फ कामयाबी के शिखर पर न पहुंच पाना उनमें इतनी निराश पैदा कर देता है कि वो जिंदगी को अलविदा कह देते हैं। जबकि जिंदगी सिर्फ कामयाबी के शिखर पर पहुंचने का नाम नहीं है। सबसे ज्यादा नाकामयाबी वैज्ञानिक झेलते हैं..पर उनकी आत्महत्या की खबरें नहीं आती। दरअसल वो थककर नही बैठ जाते..और मंजिल तक पहुंच जाते हैं। यानि लगातार चलने वाला इंसान ही किसी न किसी मुकाम तक पहुंचता है। थक कर बैठ जाने वाला कहीं नहीं पहुंच पाता है।
   जब लगे की हालात बदतर हैं...तो बेहतर है कि बात करें...अपने परिवार से...अपने मित्रों से। दिल की भड़ास निकलने के बाद नाकमयाबी का दंश कम चुभता है।
   खुद से बड़ा अपना सहारा कोई नहीं होता....सवाल इस बात का नहीं होता  है कि आपको जीत मिली या नहीं...सवाल ये है कि आपने मैदान तो नहीं छोड़ा...याद रखिए हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता....वैसे भी अंत में दर्पण के आगे खड़े होते हुए अपने प्रयासों पर गौर करें..अगर आपको लगे कि आपने इमानदारी से प्रयास किया तो फिर रंज कैसा?

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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