बुधवार, जुलाई 31, 2013

सावन का महीना. ..चतुर्मास और हम

 
सावन का पहला सोमवार गुजरा...देश के कई हिस्सों में इस समय सावन की झड़ी लगी हुई है...कई लोगो ने अंडे और मांसाहार का त्याग कर दिया है....इस बहाने कुछ समय तक शरीर वातावरण के मुताबिक खुद को ढाल लेगा....तीनों देवों में महादेव के साथ सभी देवता और पृथ्वी पर संन्यासियों और धर्म प्रचारकों का भी चातुर्मास शुरु हो चुका है...यानि पृथ्वी पर चार महीने सभी पुण्य आत्माएं एक जगह रहकर धर्म चर्चा...संकीर्तण...और हरि चर्चा करते हैं...यही भारत की परंपरा थी...यही भारत की संस्कृति थी....जिसने भारत को जगद् गुरु बनाया था...कितना पवित्र और कितना सुनियोजित जीवन दर्शन औऱ जीवनचर्या जीती हैं हमारी पुण्य आत्माएं.....पर अब कलयुग है...आधुनिक काल है...तो ऐसे में क्या करना चाहिए?....संतों के मुंह से सुना है कि कलियुग में सिर्फ कीर्तन से भगवान का सुमिरन करने से बेड़ा पार हो जाएगा....तो सावन के इस महीने में कीर्तन का सौभाग्य मिल जाए तो अहोभाग्य....अभी तीन महीने बाकी हैं औऱ अगर संतों की टोली मिल जाए तो हरि कथा सुनने को मनन करने को मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो तो कितना सुंदर हो जाए मन..
अब संतों का डेरा...साधुऔं का हरिकीर्तन की गूंज इतनी आसानी से सुनाई नहीं देती....लोग सुबह शाम आज भी मंदिर जाते हैं...मंदिरों में कीर्तन भी होता है...सत्संग भी होता है...लोग जुटते भी हैं...पर वो आलौकिक आनंद नहीं मिलता है....आलौकिक आनंद तो दूर..अब तो शांति भी नसीब नहीं होती कई जगहों पर..ऐसा क्यों....आधुनिकता के समय में संगीत है...बड़े-बड़े स्पीकर हैं....माइक है...स्वामी जी हैं....कथा प्रवचन करने वाले महाराज जी हैं....पर फिर भी आनंद कम होता जा रहा है...पता नहीं हमारी आत्माएं पापी हैं या हमारी आत्माएं इतनी आहत हैं..इतनी अतृप्त है कि इन्हें क्षणिक शांति से भली हिंसक अशांति भाती है....वो या तो पूरी तरह शांत होना चाहती है या पूरी तरह से अशांति की गोद में लेटना चाहती है...लगता है हमारी अशांत आत्माएं बीच में झूलने के बजाए इस पार या उस पार जाना चाहती हैं....मगर इस चाहने न चाहने के चक्कर में हम घनचक्कर बन जाते है...।
      भौतिकता औऱ अध्यात्मिकता के बीच कितना आसानी से आया जाया जा सकता है ये सावन का महीना आसानी से बयां करता है....बारिश की बूंदे दिल के तारों को छेड़ देती हैं..कहीं ये तारे प्रियतमा की याद कर झंकृत होते हैं...तो कहीं पर घने काले बादलों का बरसता क्रोध महादेव के महाकाल रुप की याद दिला देते हैं...तो कहीं भोले बाबा भंडारी औऱ मां पार्वती के पवित्र प्रेम की कहानी से प्रेम की अमरता औऱ पवित्रता का बोध कराता है...सच में सावन जब झूम के आता है ...तो जाने कैसे-कैसे भौतिक-अध्यात्मिक..विचारों के बीच मन इतनी आसानी से विचरण करने लगता है मानो इन दोनो के बीच कोई अंतर नहीं हैं....भौतिकता के शिखर पर रहो या अध्यामिकता के शिखर पर....बस मन भोले भंडारी...क्षीरसागर वासी....संसार रचियता के रंग में रंगा रहना चाहिए..... ये क्या है पता नहीं...इतने भौतिक युग में हमें सावन का महीना भीगोता है.....ये बताता है कि कहीं न कही कोई न कोई ..पुरातन सूत्र अब भी जिंदा है हमारे मन में..।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...