रविवार, जुलाई 14, 2013

अलविदा Born Villain ..पर कब मरेंगे Real Villain?


पिछला सप्ताह देखा जाए तो बड़ा हंगामेखेज रहा....एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे निर्णय सुनाए जिससे लोगो की बांछें खिल गई....लोकतंत्र में बुरे आदमी को दूर रखने के प्रयास में हम एक कदम आगे बढ़ गए हैं...लेकिन ये सप्ताह जाते-जाते देश के सबसे प्यारे ‘’खलनायक’’ को अपने साथ ले गया....जी हां प्राण। एक ऐसे इंसान जिन्होंने परदे पर इतने बुरे काम किये कि नाम  पड़ गया Born Villain. मगर फिल्मी रोल के एकदम उलट निजी ज़िंदगी में प्राण साहब की शराफत एक मिसाल थी....उन्होंने  परदे पर ओढ़े हुए चरित्र इतने जानदार तरीके से निभाए कि लगता था कि अब इससे बुरा कोई नहीं हो सकता....मगर हकीकत की कड़वी जमीन पर यानि हमारे समाज में इसके ठीक उलट होता है। हमारे आसपास कई समाज और राजनीति में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो निजी जीवन में होंगे मक्कार...कमीने...दिल के पूरे काले...पर सफेद झकाझक कुर्ता पहन कर शराफत कि ऐसी बेमिसाल एक्टिंग करगें की पूछिए मत....यानि फिल्मी प्राण राजनीति में हम हर जगह देख सकते हैं..परंतु निजी जीवन में दिल के शरीफ प्राण साहब की तरह के लोग राजनीति में आसानी से नहीं मिलते...या फिर शरीफ नेताओं को काफी पीछे धकेला जा चुका हैं।
   काश प्राण साहब कुछ साल औऱ जिंदा रहते...या अपनी आखिरी सांस तक फिल्मों में अभिनय करते रहते...भगवान ने सबसे शरीफ बुरे हीरो को कई दिनों तक बिस्तर पर बीमार रखकर उनके फैन को काफी कष्ट दिया है। वो फैन..जो पहले ही छोटी सोच...वोटो के लिए कुछ भी करने वाले नेताओं...और शराफत के लबादे में छुपे भेड़ियों को सक्रिय देख-देख कर कूढ़ रहा है..उसे दोहरी सजा जाने क्यों मिल रही है। जाने कब तक हम ऐसी दोहरी सजा झेलते रहेंगे?   ये भगवान ही जानते हैं। 
    फिलहाल कोर्ट अपना काम करती रहती है..पर सवाल है कि हम कब अपना काम करेंगे? पर्दे पर प्राण साहब को जाने कितनी बद्दुआ औऱ लानतें भेजते थे हम....शायद इसी का असर था कि Born Villain पर्दे पर बदलता चला गया...मंगल चाचा....शेरखान जाने जैसे अनेक दिल के करीब किरदार निभाने लगे थे प्राण साहब..वो भी उसी शिद्दत से जैसे लगे कि अब इससे अच्छा कोई इंसान हो नहीं सकता। अपनी पूरी इमेज को ही बदल डाला था उन्होंने.....। ये बद्दुआ रुपी दुआओं का असर था.....जो पर्दे का विलेन दोस्ती के गीत गाने लगा। 
    मगर असली जिंदगी में सबकुछ उल्टा-पुल्टा होता रहता है...या फिर शायद हमारी बद्ददुओं में दम ही नहीं होता...या फिर हम दिल से बद्दुआ नहीं करते..जिस कारण घटिया और सफेद कुर्ते में मौजूद शराफत का मुखौटा ओढ़े नेताओं से हमें निजात नहीं मिल पा रही है....या असल जिदंगी में हमारे सामूहिक कर्म ऐसे नहीं होते कि हम इन लोगो को उठाकर कचरे के डिब्बे में डाल सकें....या शायद कचरे का डिब्बा भी और ज्यादा कचरा ढोना न चाहता हो....इसमें जाने क्या सच है.....पर ये सच है कि प्राण साहब नहीं रहे।
   
लगता है कि फिल्मी दुनिया का सबसे उंचा सम्मान दादा फाल्के लेने के बाद रवानगी का समय तय कर लिया था प्राण साहब ने। वैसे लोग ये भी कहते हैं कि दादा साहब फाल्के सम्मान लेने के बाद अधिकतर कलाकार फानी दुनिया से रुखसत हो जाते हैं...पर मुझे लगता है कि शायद दादा फाल्के पुरुस्कार कलाकारों को तभी मिलता है जब वो दुनिया को अलविदा कहने वाले होते हैं। बात जो भी हो, पर ये हकीकत है कि प्राण साहब ने अलिवदा कह दिया है। फिल्मी दुनिया में दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गजों से भी ज्यादा पैसा लेने वाले प्राण साहब कि खाली जगह कोई नहीं भर सकता...पर दुर्भाग्य देखिए देश की जनता का....कि एक मक्कार नेता के मरने से पहले ही उसकी जगह लेने के लिए कई मक्कार....नेता का चोला पहन कर अच्छे नेता की एक्टिंग करने लगते हैं।
   खैर एक जिंदादिल ज़़िंदगी जीने और हजारों दिलों में जगह बनाने के बाद प्राण साहब दूसरी दुनिया के सफर पर निकल चुके हैं। वैसे कहते हैं कि इस सफर पर इंसान हमेशा अकेला ही जाता है...पर प्राण साहब के साथ तो करोड़ों दुआएं सफर कर रही हैं....तो करोड़ों दुआ के साथ सफर पर निकले हमारे प्यारे खलनायक को अलविदा..।  

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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