रविवार, अगस्त 25, 2013

जनाब ये तहरीके चौक है जंतर-मंतर नहीं


आखिर वही हुआ जिसका डर था। मिस्र का तहरीके चौक दो साल पहले दुनिया भर के लोकतंत्र समर्थकों के लिए नजीर बन गया था। लोकतंत्र के समर्थकों ने दशकों से जमे मिस्र के तानाशाह होस्नी मुबारक को बिना खून-खराबे के सत्ता से उतार फेंका था। आज वो ही तहरीके चौक खून से लाल है। दो साल पहले अचानक दुनिया में शोर मचा था कि तहरीके चौक से अरब देशों में बंसत की बयार की तरह लोकतंत्र की हवा बहेगी। एक बार ऐसा लगा भी था कि अरब के रेगिस्तान में उठी लोकतंत्र की आंधी दुनिया को लोकतंत्र का नया पन्ना लिखने को मजबूर कर देगी, मगर अफसोस ऐसा हो न सका। 
   दो साल पहले भी मुझे इसकी कामयाबी पर शक था। मेरे साथ कई लोगो ने इस बयार पर रूक कर, मिस्र में हवा का रूख देखकर, टिप्पणी करने की बात की थी। तब मेरे जैसे लोगो को ताना दिया गया था कि हम जैसे लोग वक्त की दीवार पर लिखी जा रही नई ईबारत को पढ़ने को तैयार नहीं हैं। कई लोगों का कहना था कि मिस्र जैसे एक मुस्लिम देश में उठती बयार को हम जैसे पचा नहीं पा रहे हैं, और हमें सीधे-सीधे सांप्रदायिक कह दिया गया। सांप्रदायिक यानि मुस्लिम विरोधी।
   इन हवाबाजों ने हद तो तब कर दी थी जब अन्ना की अगुवाई में जनसैलाब जंतर-मंतर पर जुटा, तो जंतर-मंतर को तहरीके चौक कहने लगे। बकि तहरीके चौक और जंतर-मंतर में जमीन-आसमान का फर्क है। ये फर्क उस वक्त आंख के अंधे लोगो को और हमें ताना देने वालों को शायद आज साफ दिख रहा हो। फिर भी उनके मुंह से ये बात नहीं निकलेगी।
    जंतर-मंतर कई साल से भारत के परिपक्व लोकतंत्र का प्रतीक हैं, मगर 'तहरीके चौक' आज की तारिख में अपने ही लोगों के खून से नहाया हुआ है। सिर्फ दो साल में तहरीके चौक चीन के थ्यानमन चौक जैसा बन गया है। वही थ्यानमन चौक, जहां लोकतंत्र की आवाज उठाने वाले नौजवानों को चीन की खूनी कम्युनिष्ट सरकार ने टैंकों तले कूचल दिया था।
   जबकि दिल्ली का जंतर-मंतर प्रतीक है उस लोकतंत्र का, जिसकी तरफ दुनिया भर के शांति के यौद्धा हसरत भरी नजरों से देखते हैं। दिल्ली का जंतर-मंतर प्रतीक है उस लोकतंत्र का, जिसकी तरफ दुनिया के सताए मजलूम प्रेरणा पाने के लिए देखते हैं। जंतर-मतंर पर ही तिब्बत का दर्द झलकता है। जाहिर है भारत उस धरती का नाम है, जहां लोकतंत्र की जड़ें काफी गहरी हैं। बावजूद इसके की भारत के दोनो तरफ दुनिया के दो सबसे अराजक और आतंकवाद के पनाहगार देश पाकिस्तान औऱ बांग्लादेश बसे हुए हैं। 
     मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना आसान नहीं है। इस्लामी राष्ट्र होने के कारण मिस्र में भारत या अमेरिका की तरह लोकतंत्र नहीं आ सकता। भले ही वहां के युवा ऐसा चाहते हों, भले ही वहां सदियों से चिरनिद्रा में लीन फिरोन भी बदवाल का इंतजार कर रहे हों। मगर अफसोस की न तो मुर्सी ने जनता की इच्छा को तव्ज्जो दी, और न ही सेना ऐसा कोई कदम उठाती दिख रही है। मिस्र में लोकतंत्र का रंग वहां की जनता के हिसाब से होगा। ये भी हकीकत है कि जहां आधुनिक लोकतंत्र औऱ कट्टरवाद के बीच जंग होगी, वहां की जमीन खून से लाल होगी ही। 

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