रविवार, अगस्त 11, 2013

We The Great Bathroom Singer ....हीहीहीही


   हिंदी फिल्मों को लाख गाली दे लो.....पर ये सच है कि अगर हिंदी फिल्में न होती तो हम न होते...हमारी तन्हाईयां न होती...अगर तन्हाईयां होती तो वो अकेलेपन से मर जातीं....दीवार के आसरे खड़ी बेलें खड़ी तो रहतीं....पर अरबी की आयतें नहीं बनतीं। पूरब से पश्चिम तक...उत्तर से दक्षिण तक..हम सपनों में भी कुछ न कर पाते....यहां तक की ख्याली पुलाव भी नहीं पका पाते...पकाते तो बेस्वाद पकाते। फिल्में न होतीं तो पता नहीं चलता की हमसब भी महान गायक हैं...रह जाते हम सूट..पैंट..टाई...टाइप के लोग..जो सिर्फ गिटरपिटर बोलते हैं...या धोती....पजामा...कच्छाधारी..जैसे आम भारतीय नागरिक.।
   गायक होने का बीज बच्चे में माताएं लोरियां सुना-सुना कर पालने में डाल देती हैं...चाहे पालना सोने का हो या पूरानी साड़ी का...बच्चे में पड़ा गायक का ये बीज तब फल-फूलता है जब वो दूसरी मां यानि सिनेमा की गोद में पहुंचता है...फिल्में ही बताती हैं कि बेटा जो मर्जी बन जाओ..डॉक्टर, इंजीनियर, पुलिस अफसर, जज, जसूस, यहां तक की डॉन भी...जबतक गाना नहीं गाओगे..तुम्हारी कोई औकात नहीं.। उसपर तुर्रा ये कि तुम्हारे अंदर हर मूड और  माहौल के हिसाब से गाने की क्षमता होनी चाहिए...चाहे पार्टी हो रही हो या मोहब्बत में तुम्हारा जनाजा निकलने जा रहा हो...गाना कहीं भी पड़ सकता है..समझे बच्चू।
   फिल्म में कई गाने पाछे से बजते हैं..यानि बैकग्राउंड में...दरअसल पाछे वाले गाने एक्टर के अंदर की आवाज होते है जो सिने`मा ही सुना सकती है। फिल्म में हीरो-हीरोइन के अलावा अगर कोई और गाता भी है तो वो भी हमरी-तुम्हरी..यानि हीरो-हीरोइन की भावनाओं के हिसाब से ही गाता है...जइसे शाहरुख जी की विलेन हीरो वाली फिल्म ``बाज़ीगर’’ का गाना……`````बताना भी नहीं आता...छुपाना भी नहीं आता....’’’’’’
   हकीकत कि ज़िंदगी में गाने का शौक कभी भी अंगड़ाई ले लेता है....न समय देखता है न मुहर्त....चाहे सफर में रहो.....चाहे ऑफिस के ब्रेक टाइम में...ये शौक दबने का राजी नहीं होता...लेकिन अंदर की ये आवाज तब ज्यादा जोर मारती है जब आप सबसे सुकुन वाली जगह पर होते हो...यानि बाथरुम में....बस यही एक जगह होती है जहां हम किशोर कुमार के सपनों की रानी को अपनी बनाते हैं....रफी साहब से ज्यादा जंगली होते हैं..मन्ना डे जी की देख कर चलने की नसीहत भूल जाते हैं...वगैरह वगैरह.....या कहें की सारे महान गायकों के सुर यहीं बाथरुम में आकर हमारे में समा जाते हैं....
     इससे होता ये है कि गुनगुनाते-गुनगुनाते थोड़े अच्छे सुर के साथ कई गाने हम उसी अंदाज में गाने लगते हैं...जिसको दुनिया भी मानने लगी है..तभी तो शहर-दर-शहर बाथरुम सिंगरों के मिलने-जुलने के प्लेटफॉर्म हैं...कहीं टीवी पर कंपटिशन है.
     इसलिए आजकल हमारे अंदर का गुसलखाने का गायक फिर से जागने लगा है...हम भी बिना वक्त देखे गुनगुनाने लगे हैं...पब्लिक प्लेस पर भी..भले ही कोई हमें अजीबो-गरीब नजरों से घूरे तो घूरे...पर हमें खुशी है कि कहीं-कहीं अपने जैसा-जैसी सिरफिरा-सिरफिरी बाथरुम सिंगर कभी-कभी हमारे साथ तान में तान मिला देता-देती है...। बस ऐसा साथ हमें मिला नहीं कि हम बन जाते हैं.
                       ''''GREAT  BATHROOM SINGER'''''''''
 .....फिर देर नहीं लगती....और हम छेड़ देते हैं अपनी तान....लअssssss.....लअsssssलर ल....ओssssssssssss..होओओओssss..अह..लरलरलललल...हम तो तेरे आशिक हैं....ठंडे-ठंडे पानी से....हमका पीनी है पीनी है पीनी है....U r bad girl, M for Murder…etc etc….वगैरह..वगैरह...

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...