सोमवार, सितंबर 23, 2013

ब्लॉग पर चुप्पी तो बनती है यार


   किसी विषय पर लिख पाना कई बार आसान होता है...तो कई बार कलम अपने आप रुकने लगती है...हर विषय पर धड़ाधड़ विचार तो आते रहते हैं...पर उनको जब कलम कागज पर उतारने से आनाकानी करने लगे...तो समझ जाना चाहिए कि विचारों की उछलकूद इतनी है कि कलम उनको संभाल नहीं पा रही। ऐसे हालात होते हैं तो मैं कम्पयूटर के की-बोर्ड रुपी कलम पर से हाथ हटा देता हूं। जिस कारण कुछ दिनों की चुप्पी छाई रहती है ब्लॉग पर...। 

   हालंकि ऐसी चुप्पी छाती नहीं कभी..अगर ब्लॉग की शुरुआत हमारी योजना के अनुसार होती...मगर सबकुछ उल्टा-पुल्टा हो गया था...उसका कारण मैं एक पोस्ट "" जाना था जापान..पहुंच गए चीन..समझे""" कर चुका हूं। 

   वैसे भी हर घटना की तस्वीर समग्रता से देखने के बाद ही साफ होती है। इसलिए हर घटना पर तुरंत पोस्ट लिखना संभव नहीं होता..लेकिन कई बार चीजें शीशे की तरह साफ होती हैं....परंतु उन्माद के दौर में लोगो को समझाना आसान नहीं होता...हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि किसी को कुछ कह पाने का कोई फायदा नहीं होता...और हालात के काबू में आने के बाद जबतक लोगों की समझ में कुछ आता है...तबतक सबकुछ बिखर चुका होता है..ठीक उसी तरह जिस तरह मुज़फ्फरनगर में हुआ। 

   इसी तरह के अनेक कारणों से ब्लॉग पर कुछ दिनों चुप्पी छाई रहती है। कुछ नौकरी मैया की मर्यादा का भी सवाल होता है। आखिर यही नौकरी है जो हमें रोटी खिला रही है। वैसे भी आप जहां रहते हैं वहां की मर्यादा के हिसाब से चलना चाहिए। यानि जैसा देस..वैसा भेष। इसलिए मेरे ब्लॉग पर राग बिंदास उटपटाग जब बजता है तो बिंदास बजता है..पर ज्यादातर पोस्टों में सुनामी का हल्का सा ही शोर होता है...ज्रयादातर शोर नदी की लहरों की तरह किसी तट या बांध से टकराकर थम जाता हैं..अब ये बांध मजबूत हैं..या चाकरी की मजबूरी बड़ी...पता नहीं।  

उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर आपको किसी भी ब्लॉग पर चुप्पी चुभेगी नहीं? कहिए ठीक कह रहा हूं न मैं? 

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