शनिवार, अक्तूबर 05, 2013

Mahatma Gandhi.....साडे National केमिकल लोचा

(गांधी नाम ऐसा है जो कुछ करे या न करे...दिमाग का दही कर ही देता है। मुन्नाभाई के शब्दों में कहूं तो गांधी जी दिमाग में केमिकल लोचा तो शर्तिया करेंगे....इसलिए उनपर लिखना आसान नहीं होता..फिर भी लिख ही डाला...फिर लिखकर तीन दिन में पोस्ट कर ही डाला..पोस्ट लंबी है..पर क्या करुं....बापू ने कहा इससे कम शब्दों में नहीं समाउंगा....सो बापू को जय रामजी बोलनी हैं तो पढ़ लें पूरी पोस्ट...)


दो अक्टूबर का दिन....टीवीरेडियो औऱ अखबार के पन्नों पर महात्मा गांधी काफी हद तक जिंदा थे। लालबहादूर शास्त्री भी कहीं-कहीं नजर आ रहे थे..ठीक उसी तरह जिस तरह आजकल नैतिक साहस से भरपूर इंसान कभी-कभी ही नजर आता है। बड़े शहरों में युवाओं को महात्मा गांधी याद थे...कुछ को लाल बहादूर शास्त्री भी। कई युवा खासकर वो जो राहुल गांधी की उम्र के आसपास के हैं..वो गांधीजी के दर्शन को आज के हिसाब से बदलना चाहते हैं। वैसे गांधी का असली दर्शन क्या है ये अधिकांश लोग नहीं जानते। कहा जाता है कि गांधीजी अगर आज होते तो वो बदले स्वरुप में होते...जबकि हकीकत है कि 100 साल पहले जो महात्मा गांधी ने कहा था....वो कालजयी था। इसलिए 21वीं सदी में गांधीजी काम करने के नए तरीके अपनाते....परंतु नैतिकता के मापदंड नहीं बदलते। 
     
     चार वेदों पर हमारे समाज ने अनगिनत टिकाएं लिखीं...फिर यही समाज बाद के दिनों में अपनी-अपनी टिकाओं के पन्ने को ही सच मानता रहा औऱ ज़ड़ होता चला गया। वही हाल गांधीजी का हुआ। दरअसल बापू ने वही आदर्श अपनाया था जो 5000 साल से भारत में हर महान शख्स अपना रहा है...। अब विंडबना देखिए कि आज कायर औऱ कर्महीन लोग इन मूल्यों की आड़ ले रहे हैं। 20वीं सदी में महात्मा गांधी को मजूबरी का दूसरा नाम बना दिया गया है। बहादूरों की अहिंसा कायरों की अहिंसा कही जाने लगी....जबकि गांधी नाम था एक बदलाव का....एक नाम था जड़ता को तोड़ने वाला।
     बापू की आलोचना करने वालों की तादाद भी कम नहीं है। आलोचना आसानी से की जा सकती है...पर बिना पढ़े आलोचना का कोई अर्थ नहीं है। लोग कहते हैं कि गांधीजी आधुनिक मशीनों का विरोध करते थे। जबकि गांधी आधुनिक मशीनों को इंसान पर तरजीह दिए जाने की सोच के खिलाफ थे। इसलिए बापू की आधुनिक मशीनों को लेकर की गई कड़ी आलोचना को उनके निंदक आधुनिक मशीनों का विरोध बताते हैं।
   
   जहां अच्छे आदर्श हों वहीं पैदा होते हैं नैतिकता औऱ सरलता के प्रतीक...महात्मा गांधी के अनेक अनुयायी थे...उनके सिद्धांतों की एक प्रतिमूर्ती थे-लाल बहादूर शास्त्री....सौम्य, सरल और चमक-दमक से दूर एक इंसान। जिन्होंने पंडित नेहरु के बाद सरलता से देश की बागडोर संभाली। संकट के समय इसी सौम्यता के पीछे अटल इरादो वाला इंसान लोगो को दिखा। शास्त्री जी कि निश्छल मुस्कान पर भरोसा करके जवान से किसान तक एक ही कड़ी में जुड़ गए थे....तो नैतिकता से उत्पन ताकत का अहसास पाकिस्तान जैसे नापाक मुल्क को तब हुआ जब भारतीय फौज लाहौर पर काबिज हो गई।
  
     महात्मा गांधी जानते थे कि भारत में नैतिक बल की कमी है...तभी भारत 1000 साल तक गुलाम रहा..और उससे पहले कई सदियों तक दिगभ्रमित। गांधीजी ने अनेक बार बताया कि कहां से अहिंसा कायरता में तब्दील हो जाती है.....औऱ हिंसा कब अहिंसा के लिए बेहद जरुरी हो जाती है। मगर अफसोस कि इसे खान अब्दुल गफ्फार खां औऱ उनके अनुयायियों के अलावा कम ही लोग समझ सके। कई बार गांधीजी ने कहा कि हम बहादूर नहीं हैं....अधिकतर लोग अहिंसा रुपी बहादूरी नहीं अपना सकते हैं....गांधीजी जिस ओर खुलकर कहते थे..वो कमी आज चारो तरफ दिखती है....उसी की कमी के कारण 21वीं सदी में मंगल पर पहुंचने की तैयारी में लगे भारत में जमीन पर आज भी प्रेमी जोड़े कत्ल कर दिए जाते हैं...दुनिया में आने से पहले कन्या वध कर दिया जाता है...कहीं आम लड़कों का गिरोह सड़क पर चलती लड़की को देखते ही हैवान में तब्दील हो जाता है...तो कहीं तेजाब इंसानियत को झुलसा देती है 
    गांधीजी के उसूलों को अपनाना आसान है...पर उस पर टिके रहना कहीं ज्यादा मुश्किल...इश्क करना आसान है..पर इश्क को सच्चे अर्थ में जीना मुश्किल.....जो ये कर जाता है वो नाम कर जाता है....और जो टूट जाता है वो बिखर जाता है। पिलपिला इंसान बापू का सिद्दांत नहीं अपना सकता...उसके लिए नैतिक बल औऱ कलेजा चाहिए....पर अफसोस कि आज हर परिस्थिती में अधिकतर लोग पिलपिले ही दिख रहे हैं। गांधीजी ने साफ शब्दों में कहा है गुंडागर्दी वहीं चलती है जहां नैतिकता की ताकत नहीं होती....जहां नैतिकता होगी वहां विरोध होगा...जब विरोध होगा तो गुंडागर्दी नहीं चलेगी...औऱ विरोध के दौरान किसी तरह के भी नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए..औऱ कोई सरकार जनता के सक्रिय सहयोग के बिना कुछ नहीं कर सकती....जब ईश्वर उन्हीं की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है तो ये नश्वर सरकार खुद कैसे आपकी मदद करेगी

   सच में गांधीजी का दर्शन तब जितना जरुरी था....आज भी उतना ही जरुरी है। जरुरत गांधीजी के पीछे चलने की नहीं...गांधी जी के मूल्यों को समझने की है। 

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

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