गुरुवार, नवंबर 28, 2013

हाय ये फिल्मी बिच्छुआ. ..औऱ मेरी रिसर्च

हम भारतीयों में से ज्यादातर किसी न किसी तरह फिल्मों से जुड़ना चाहते हैं। हो भी क्यों न....हर किसी को फिल्मी दुनिया का तिलिस्मी दरवाजा या कोई खुली खिड़की आंख खोलते ही दिख गई थी। इन्हीं दरवाजों औऱ खिड़की से हमने राजकूपर (RAJ KAPOOR) (छलिया तेरा नाम) के रुमानी प्यार से लेकर मुगलिया सल्तनत को चुनौती देती प्रेम दिवानी अनारकली (Madhubala...हे मेरे खुदा) को देखा। प्रेमी सलीम के बगावती तेवर की कहानी से लेकर सबकुछ उलट-पलट कर देने वाला गुस्सैल युवा देखा। सिमरन की खोज में लंदन से पंजाब के गांव पहुंचे एनआईआर राहुल की जद्दोजहद देखी तो तारों को जमीं पर उतरते देखा। ऐसी सारी कहानियां पिछली पीढ़ी से लेकर आज की पीढ़ी तक को जाने-अनजाने बचपन से ही घुट्टी में मिला कर पिला दी गई हैं।
   
  इसलिए जिदंगी के किसी भी पड़ाव पर बैठा आदमी मौका पाते ही किसी न किसी तरह से रुपहले परदे से नाता जोड़ने की कोशिश करने लगता है। दिल्ली से लेकर बैंगलुरु तक, हर बड़े शहरों में ऐसे ही सपने लिए नौजवानों से लेकर पचास बसंत देख चुके लोगों का जमावड़ा जमता है। काफी हाउसों की टेबलों पर दुनिया की परवाह किए बिना अपने सपनों को जमीन पर उतारने का ताना-बाना बुना जाता है। अब चाहे www.youtube.com हो या फिर फिल्मी परदा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फिल्मों का जुनून और अपनी बात को कैमरे के सहारे कहने की चाहत इनसभी लोगो को एकजुट कर रही है।
   
   अब सवाल ये उठता है कि मुझे ये पता कैसे चला। असल में हुआ यूं कि एक दिन फिल्मी कीड़े के एक रिश्तेदार खुराफाती विचार के कीड़े ने मुझे काट खाया। उधड़ कीड़े ने मुझे काटा औऱ इधर मेरे दिल में विचार कौंधा कि क्यों न जेनेरेशन नेक्सट के फिल्मी बुखार का मीटर नापा जाए। बस फिर क्या था, मैं फिर निकल पड़ा अनजानी राहों पर अपनी प्रोफेशनल पहचान छुपाकर। इस यात्रा में मैं अनेक लोगो से मिला...कई जगहों पर मैंने अड्डा जमाया....फिल्मी गानों से अपनी शामें सजाईं....अलग-अलग रेस्टोरेंट में लाजवाब जायकों का लुत्फ लिया...जन्मदिन की पार्टी की....स्टैंडअप कॉमेडी और नाटकों के शो देखे....किताबें पढ़कर सुनाई...केजरीवाल के बाद उलझे राजनीतिक समीकरण के चक्कर में चकराए नौजवानों से बतियाया।
       इस रिसर्च रुपी घुमक्कड़ी में मैंने पाया कि 19 साल से लेकर 72 साल तक की उम्र के इन सभी में एक बात समान है, और वो ये कि इन सभी को बचपन में ही फिल्मी कीड़े ने काट लिया था। अब भले ही इनके पास संसाधनों की कमी हो, लेकिन इनके जुनून ने इन सभी लोगो को उस रास्ते पर डाल दिया हैं जहां से मंजिल साफ दिखाई देती है। उसपर अनुराग कश्यप औऱ तुगमांशु धुलिया जैसे नए सफल डायरेक्टर्स ने इनके जुनून को हिम्मत दी है तो बाजार में नित नए आते डीजिटल कैमरों ने लोगो के सपनों को पंख लगा दिए हैं। कई आइडियाज़ ने नई औऱ पुरानी जेनरेशन के बीच की दूरी को पाट दिया है....ये मिलकर काम करने को तैयार हैं।

        कई बुरी घटनाओं औऱ बदलते नैतिक मूल्यों के बीच ये जानकर सुकुन पहूंचता है कि हमारे देश का वर्तमान औऱ भविष्य, मिलकर सपने देखने औऱ उसे पूरा करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। रिसर्च में एक सुखद बात सामने आई कि लोग जमीनी हकीकत से जुड़े हैं औऱ किसी समस्या पर कैमरे के सहारे अपना नजरिया दुनिया के सामने रखना चाहते हैं।
    
   तो दोस्तों मेरी एक औऱ रिसर्च पूरी हुई। अब सवाल ये है कि जब सब कैमरे का सहारा ले रहे हैं तो मेरी रिसर्च कैमरे के सहारे क्यों नहीं आती। तो उस फिल्मी कीड़े की कसम जिसने मुझे भी काटा था...मेरी रिसर्च भी टीवी औऱ www.youtube.com के परदे पर उतरेगी। आमीन.....

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...