गुरुवार, नवंबर 14, 2013

इतिहास छोड़ें, भविष्य देंखें MR Modi & Mr Rahul Gandi...plz



आजकल पता ही नहीं चल रहा है कि चुनाव कौन लड़ रहा है...अचानक ही पटेल और नेहरु को स्वर्ग से जमीन पर घसीट लिया गया है। लगता है जैसे मुद्दे खत्म हो गए हैं। दोनों ही पार्टियां और उनके नेता ये भूल जाते हैं कि आज का युवा आज की समस्या को सुलझते हुए देखना चाहता है....किसान अपनी बिरादरी को खुश देखना चाहता है। जबकि न तो गांवों के विकास की कोई य़ोजना और न ही युवाओं को रोजगार मुहैया कराने का रोडमोप मोदी या राहुल गांधी अब तक देश के सामने रख सके हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों ये बात जानते नहीं हैं, पर हैरत होती है कि बात करते-करते एक दूसरे पर निशाना साधते हुए दोनो नेता व्यक्तिगत बातें करने लगते हैं। एक तरफ नरेंद्र मोदी लोहपुरुष पटेल बनाम  नेहरु की लड़ाई छेड़ देते हैं, तो राहुल गांधी उस तुष्टीकरण की पैरवी करने लगते हैं, जिसे सुन-सुन कर कई पीढ़ियां परेशान हो चुकी है। कभी कभी लगता है कि ये चुनाव सिर्फ मुस्लिम समाज के उत्थान के लिेए ही लड़ा जा रहा है....।
      लगता है कि 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे दोनो पार्टियां भूल गई हैं। 2009 में कांग्रेस चुनाव जीती थी, लेकिन बीजेपी को उसने नहीं हराया था। बीजेपी खुद 2009 लोकसभा चुनाव हारी थी। 2009 में बीजेपी के पीएम पद के केंडिडेट आडवाणी जी जब भी बात करते थे सोनिया गांधी को निशाना बनाते थे, जबकि राहुल गांधी युवाओं के विकास की बात करते थे। राहुल गांधी के पीछे का आभामंडल सशक्त अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के राजनीतिक कौशल से चमकता था। जबकि आडवाणी जी पुरजोर तरीके से आर्थिक विकास की अपनी योजनाओं को वोटरों के सामने नहीं रख पाए थे। बीजेपी की टीम में कोई इस कमी को पूरा कर पाया था। नतीजा ये निकला कि उस वक्त देश के युवाओं औऱ मध्यवर्ग ने बीजेपी की तुलना में कांग्रेस को चुनावी जीत दिलाई थी।
     हालंकि 2014 लोकसभा चुनाव अभी 7 महीने दूर हैं, परंतु दिल्ली समेत चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे मोदी और राहुल गांधी की राजनीतिक दिशा तय करेंगे। दोनो नेता वैसे तो युवाओं पर ही फोकस कर रहे हैं, पर बात-बात में दोनो इतिहास में पहुंच कर लड़ने लगते है।  पुराने जख्मों को बार-बार कुरेदा जाता है। जहां जनता पूराने जख्मों को भूल कर आगे बढ़ना चाहती हैं..वहीं मोदी और राहुल के सलाहकार इन दोनो को पीछे पहुंचा देते हैं। 
      आम जनता को अब तक पता नहीं चल पाया है कि उसकी बेहतर जिदंगी के लिए और देश की तरक्की के लिए मोदी और राहूल की योजना क्या है? अब देखना ये है कि बीजेपी 2009 के इतिहास से सबक लेती है या नहीं? राहुल गांधी नए सिरे से युवाओं को किस तरह विकास की योजनाओं को समझा पाते हैं?

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...