गुरुवार, दिसंबर 26, 2013

Merry Christmas-हंसता हूं मैं..मुस्कुराता हूं मैं

....मैं ऐसा ही यारों

हंसना-मुस्कुराना जिंदगी का एक हिस्सा है....पर लगता है कि अब हर बात का मतलब बदल गया है। आजकल फेसबुकिया सूक्तियों ने अर्थ का अनर्थ करना शुरु कर दिया है। सीधी बातों का उल्टा मतलब निकाला जा रहा है। लगता है जैसे फेसबुकिया लोग बह्मज्ञानी और दार्शनिक हो गए हैं। ये आम बात है कि जब आदमी सहज होता है, तो मुस्कुराता है। अपन ऐसी ही फितरत के मालिक है। ऐसी तबीयत के मालिक होने के कारण अपन अक्सर फेसबुकिया ज्ञानियों के शिकार होते रहते हैं। ये फेसबुकिया तत्वज्ञानी हरबार एक मशहूर विज्ञापन की पंक्तियों में सवाल करते हैं.." भई इतना जो मुस्कुरा रहे हो..बताओ क्या ग़म चबा रहे हो".....हद है यार..काहे को विज्ञापन के जिंगल की वाट लगाते हो।
   ऐसे ही सदाबहार फिल्मी गाने सुनते वक्त कई बार सकारात्मक विचारों यानि की Positive thoughts की गाड़ी सरपट दौड़ने लगती है। तब मुझे शांत बैठे देखकर अक्सर लोग पूछ बैठते हैं, रोहित जी अपने जमाने के गाने सुनकर कहां खो गए? ऐसे लगता है गोया अपन पृथ्वीराज कपूर के चढ्ढी यार हैं। है न हैरानी की बात। जबकि फिल्मों के सदाबहार गाने उस वक्त के हैं, जब अपन पैदा भी नहीं हुए थे।
    लोग अक्सर पूछते हैं कि आखिर आप अकेले कैसे रहते हैं? मेरा जवाब होता है कि मैं अकेला नहीं हूं...तो फेसबुकिया ज्ञानी तत्काल कहने लगते हैं कि इसका मतलब है कि आप बहुत अकेले हैं। आपको चीजों की परवाह है। जबकि सच यह है कि लोग परिवार में भी अकेलापन महसूस करते हैं। जाहिर है मैं भी अलहदा नहीं..लेकिन मेरे पास करने को इतना कुछ है कि अकेलेपन की परछाई देर तक नहीं टिकती। चीजों की परवाह करना तो इंसान की सहज प्रवृति है। ऐसे में इन स्वनाम धन्य ज्ञानियों को कौन समझाए कि जो चीजें सहज हों...कुदरती तौर पर आपके अंदर हो..उसको इतना असहज मत बनाओ यार। क्यों मिलनसार लोगो को मतलबी औऱ हंसते बोलते लोगो को तन्हा समझते हो
   सच में हालात काफी बदल गए हैं। कुछ साल पहले तक जिन बातों का मजा लेकर हम दोस्तों की टांग खींचते थे वो आज कॉमेडी की दुनिया के सबसे बिकाउ प्रोग्राम बन गए हैं। देखा जाए तो ये एक गंभीर समाजिक समस्या है। जो चीजें पहले सहज औऱ सरल थी वो दुर्लभ हो गई हैं। आपस में लोग सहज होकर नहीं मिलते। जो सरलता औऱ हास्य समाज में सहज उपलब्ध था, उसके लिए अब लोग टीवी शोज के मोहताज हो गए हैं। समाजिक त्यौहारों को हमने व्यक्तिगत बना दिया है। जबकि इससे बचने के लिए ही हमारे पूर्वजों-ऋषियों ने हर महीने कोई न कोई उत्सव मनाने की परंपरा डाली थी। ताकि कम से कम हम इस दिन तो खुश रह सकें, लेकिन हम इस शानदार परंपरा का बैंड बजा चुके हैं।
 आज जब क्रिसमस का मौका है तो क्यों न हम ईसा मसीह के जीवन से सहज प्रेम को लेकर सांता की तरह लोगो में बांटे। हम तुलसी के पौधे औऱ सांता के क्रिसमस ट्री को अलग नहीं समझें। दरअसल यही सहजता हमारी ताकत थी..जिसे हमने खो दिया था। याद रखिए यही वो चीज है जो हमें औऱ हमारे समाज को जीवंत बनाएगी। 
     तो हे दोस्तों औऱ फेसबुकिया ज्ञानियों सहज मुस्कुराते आदमियों को देखकर इतने सवाल न करो कि उनकी मुस्कुराहट भी दुर्लभ हो जाए। यारो अगर ऐसे ही अपनी और दूसरों की मुस्कुराहटे गायब करते रहोगे तो हमारे समाज के DNA में गड़बड़ हो सकती है औऱ हम हिंदुस्तानियों की आने वाली नस्लें दुनिया में गंभीर थोबड़ा लिए पैदा होने लगेंगी। समझे...यकीन जानो गंभीर थोबड़े वाले नवजात (New Born Babies) अच्छे नहीं लगेंगे।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...