शुक्रवार, दिसंबर 13, 2013

LGBT, Sex, supreme court और कन्फ्यूजियाए लोगों की कांय-कांय

(Update-Australia court पोस्ट लिखते-लिखते ऑस्ट्रेलियाई कोर्ट ने वहां की संसद को कानून बनाने को कह दिया है। हालांकि वहां के प्रधानमंत्री गे मैरिज के खिलाफ हैं)
LGBT पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या आया सब ऐसे शोर मचाने लग गए हैं जैसे कयामत टूट पड़ी हो। जैसे इस फैसले के बाद बदलाव की दुनिया खत्म हो गई हो। भारत एक झटके में जाने पाषाण युग में पहुंच गया हो। चारो तरफ से लोग ऐसे टर्र-टर्र कर रहे हैं जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दुनिया में हमारी इज्जत कम कर दी हो। हद होती है हायतौबा मचाने की भी।
    छुटभयै नेता से लेकर राष्ट्रीय पहचान वाले नेता LGBT के पक्ष में हल्ला मचा रहे हैं। सभी धर्मगुरू मारे खुशी के उछलकूद मचा रहे हैं। फिल्म और फैशन की दुनिया के लोग फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं।
    ध्यान से देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने दायरे में रहते हुए कहा है कि समलैंगिकता कानूनन गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि उसका काम कानून बनाना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून बनाना संसद का काम है और अगर संसद चाहे, तो इस कानून को खत्म कर दे। इतना साफ-साफ फैसला सीधे-सीधे किसी को समझ नहीं आ रहा तो क्या किया जा सकता है।
     जरा राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से पूछिए कि भैये अगर LGBT यानि Gay, Lesbian, homosexual वगैरह वगैरह की इतनी ही चिंता है, तो संसद में कानून क्यों नहीं बना देते? नेताओं को किसने रोका है कानून बनाने से? खत्म कर दें अंग्रेजों के जमाने के इस कानून को। हर बात का बतंगड़ बनाने और मूल मुद्दे को इधर-उधर करने की भी कोई हद होती है।
    रह गए ये धर्मगुरु और कठमुल्ले....। ये तो इस फैसले के आने से सुप्रीम कोर्ट के ऐसे शुक्रगुजार हो रहे हैं, जैसे ये उसके हर फैसले के आगे अच्छे बच्चे की तरह सिर झुकाते हों। जब सड़क घेर कर नमाज पड़ी जाती हैऔर देर रात तक जगराते के नाम पर आवाज आती है, तब इनलोगों को कानून का सम्मान करना क्यों याद नहीं रहता? हद है बेशर्मी की। कई धर्मगुरु तो LGBT लोगो को कड़ी सजा की बात ऐसे करते हैं, जैसे भारत में मध्ययूगीन जंगली राज हो। वैसे उसी मध्यूगीन भारत में एक बादशाह औरतनुमा मर्द की मोहब्बत में तड़प-तड़प कर शायरी करने लगा था।
   एक धर्मगुरु इसे बीमारी बताते हुए ठीक करने की बात कर रहे हैं। तो महाराज अबतक आप क्या कर रहे थे? अगर इलाज शुरु कर दिया था, तो ऐसा जबरदस्त प्रचार अबतक क्यों नहीं किया था, जितना राजनीति के मैदान में अपना प्रचार करते हैं? उसवक्त ये महाराज काहे को चुप हो गए थे, जब एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल पर एक फिल्मी गे ने खुलेआम कहा था कि अगर महाराज उन्हें बीमार मानते हैं तो वो उसे ठीक कर दें..वो ईलाज के लिए तैयार है। सदियों से जो समाज में है उसे आधुनिक युग में खुलकर मानते क्यों नहीं ये तथाकथित धर्मगुरु। कबतक नैतिकता के नाम पर आडंबर करते रहेंगे। सब फैसले को अपने-अपने धर्म के हिसाब से ठीक कह रहे हैं...जबकि भारत में धर्मनिरपेक्ष शासन हैं जहां फैसले धर्म की आड़ में नहीं होते। 
     जहां तक बात फिल्मी लोगों की है....तो ये सच में फिल्मी हैं। फिल्मी दुनिया के कई चर्चित नाम फैसले के विरोध में ऐसे कूद पड़े कि पूछिए मत। है देश के स्टाइल के देवताओं, जरा अपने आसपास की दुनिया में स्वतंत्रता के नाम हो रही जोर-जबरदस्ती का विरोध क्यों नहीं करते? सोनू निगम के आरोप क्या फिल्मी दुनिया भूल गई है? वहीं फैशन के महारथी फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं। शोर मचा रहे हैं कि दो लोगों के बीच आपसी सहमति से सेक्स संबध बनाने की छूट हो। पर क्या ये सच नहीं है कि कई फैशन डिजाइनर रैंप पर मौका देने के बदले मेल मॉडल्स के पिछवाड़े में वार करने का मौका ढूंढते रहते हैं? व्यक्तिगत स्वतंत्रता की इतनी ही परवाह है तो बड़े-बड़े नाम खुलकर ऐसी हस्तियों के खिलाफ क्यों नहीं बोलते जो इस स्वतंत्रता पर काम देने के बदले हमला बोलते हैं।
    अब बात जरा इस फैसले को देश की इज्जत से जोड़ने वाले लोगो की करते हैं। लगता है इन आधुनिक लोगों का दिमाग फिर गया है। जरा ये बताएं कि क्या भूख से मरते लोगो की तादाद से क्या देश के नाम पर बट्टा नहीं लग रहा? दंगों की आग में झुलसते भारत की तस्वीर को देखकर क्या दुनिया हमारी इज्जत करती है? वाह मान गए देश की इज्जत की परवाह करने वाले अक्ल के अंधों...वाह।
    फैसले के घेरे में फंसी LGBT बिरादरी की बात भी निराली है। ये 21वीं सदी है..जिसमें सबको जीने का अधिकार है। इसलिए अपने अधिकारों के लिए खुलकर मैदान में आओ। कबतक पिछवाड़े में खोए रहोगे? LGBT परेड में क्यों नकाब ओढ़े रहते हो? कब तक बड़े नामों के सहारे जीओगे? तुम्हारी बिरादरी में जो बड़े नाम हैं उनको कहो कि अगुवाई करें। समाज में चर्चा करें। काहे को रंगे सियारों की हुआ हुआ में अपना जीवन खोते हो। बता दो कि तुमने भी देश के लिए काफी कुछ किया है। कबतक सिर्फ किताबों औऱ रिसर्च के सहारे साबित होता रहेगा कि फलां कलाकार..फलां लेखक...फलां डॉक्टर...फलां बादशाह आदी आदी लोग LGBT थे। अपने अधिकार को मांगों औऱ अगर कानून नहीं मानता है तो चुपचाप देश के कानून का पालन करो और चुप हो जाओ। याद रखना सुकरात ने जेल से भागने की अपेक्षा कानून का पालन करना जरुरी समझा था।
    हे देश के कर्णधारों हल्ला न मचाओ। गेंद तुम्हारे पाले में है। इस समस्या पर गंभीर चर्चा करके इसका समाधान निकालो। बेहतर है कि इससे भी आगे बढ़कर बड़ी मुसीबतों से हमें निजात दिलाओ। गरीबी के दुष्चक्र से हमें छुटकारा दिलाओ....ताकि हमारा औऱ समाज का भला हो सके...औऱ देश का नाम सही मायने में दुनिया में इज्जत से लिया जा सके। समझे???????

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...