सोमवार, फ़रवरी 03, 2014

नस्लवादी दिल्ली... बोले तो...सारा हिंदुस्तान

दिल्ली में एक मौत होते ही लोगो ने हल्ला मचाना शुरु कर दिया कि नार्थ ईस्ट के लोग नस्लवाद का शिकार होते हैं। किसी नार्थ-ईस्ट की लड़की से बलात्कार होते ही हल्ला मचने लगता है कि नार्थ ईस्ट की महिलाओं के लिए दिल्ली सुरक्षित नहीं है। जबकि हकीकत ये है कि दिल्ली में आए दिन घिनौने बलात्कार का जो शिकार होती है वो सिर्फ एक महिला या लड़की होती है..किसी क्षेत्र विशेष की नहीं। उसपर अंकुश लगाने की जगह सब नस्लवाद-नस्लवाद(Racist attack in delhi,..timesofindia/) भजने लगते हैं। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगो को, जो गंभीर समस्याओं को गलत मोड़ दे देते हैं। 
   हाल तक दिल्ली समेत देश के कई इलाकों में हर पूरबइए को गाली की तरह बिहारी कह कर फब्तियां कसी जाती थीं। तब कोई कैंडल मार्च औऱ धरना नहीं दिया गया। फब्तियां आज भी कसी जाती हैं..अब बस अंतर ये आया है कि बिहार का माहौल बदलने के बाद दिल्ली में इन फब्तियों में वो तुर्शी नहीं रही। संता-बंता चुटकले भी ऐसी ही सोच से उपजे हैं। जबकि अब लोग इसे चुटकले से ज्यादा तव्वजो नहीं देते। दिल्ली देश की राजधानी है और यहां अधिकतर लोग बाहर से आकर बसे हैं। इसलिए यहां फब्तियों की मौजदूगी देश की मानसिक सोच बताती है।  
  ये समस्या सिर्फ दिल्ली की नहीं है। सारे देश में अधिकतर लोगो में नस्लवाद औऱ क्षेत्रवाद का जहर किसी न किसी हद तक भरा हुआ है। विश्वास न हो तो जरा रेलगाड़ियों में सफर करिए। जैसे-जैसे स्टेशन आते जाएंगे वहां के स्थानीय लोग, खासकर सेंकेंड क्लास के आरक्षित डिब्बों में घुसकर यात्रियों को हड़काने लगते हैं। ये आदत अगर देशव्यापी न होती तो महाराष्ट्र में राज ठाकरे की राजनीति नहीं चमकती। नस्लवाद और क्षेत्रवाद की देशव्यापी आदत के कारण ही मुंबई और पुणे के स्थानीय चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी को सफलता मिली है। 
   कड़वा सच ये भी है कि दक्षिण भारत में हिंदी बोलने पर उत्तरभारतियों के साथ अजीब व्यवहार होता है। एक कड़वी हकीकत ये भी है कि दिल्ली जैसे शहरों में स्थानीय लोगों से नार्थ-ईस्ट के लोग दूरी बनाकर रखते हैं। हकीकत ये भी है कि नार्थ-ईस्ट की लड़कियों या लड़कों को देखकर यहां की लड़कियां या आंटियां भी उन्हें ऐसे घूरती हैं जैसे कोई एलियन आ गया हो।
   इस तरह के हालात के लिए कहीं न कहीं शिक्षा भी जिम्मेदार है। विश्वास नहीं तो जरा स्कूल में पढ़ाए जाने वाले इतिहास के पन्नों को पलटिए। उन पन्नों से नार्थ-ईस्ट का इतिहास लगभग नदारद है। इसलिए इस गंभीर बीमारी के लिए हमारे अदूरदर्शी समाजशास्त्री और शिक्षाविद् भी जिम्मेदार हैं।  
      अपने देश के लोगो की विचित्र मानसिक स्थिती का एक उदारहण देता चलूं। नौकरी शुरु करते हुए साल ही हुआ था। मेरे यहां पंजाब के एक बड़े शहर के बड़े हिंदी अखबार से दो सीनियर पत्रकार दिल्ली आए। दोनो अक्सर हैरत में दिखाई देते थे औऱ चुपचाप काम करते रहते थे। दो-तीन दिन उनकी ऐसी हालत देखकर मैने पूछा कि क्या बात है..क्या दिल्ली ऑफिस का वातावरण अच्छा नहीं लगा। 
   दोनो ने धीरे से मुझसे कहा-यार यहां आकर हम बड़े हैरान हैं। मैंने कारण पूछा तो दोनो बोले यार बिहारी इतने पढ़े-लिखे होते हैं..हमें विश्वास नहीं होता...हमारे यहां तो ज्यादातर बिहारी रिक्शा चलाते हैं..मगर यहां तो स्पेशल कॉरसपोंडेंट से लेकर संपादक के पद तक बिहारी बैठे हैं। हमें तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि बिहारी इतने पढ़े लिखे होते हैं। तुम कैसे इनके बीच काम करते हो?” दिल्ली में पले-बढ़े इस राष्ट्रवादी बिहारी को पहली बार देश के शिक्षित लोगो के मानसिक विकार की झलक मिली थी। इससे मैं आसानी से समझ गया कि जब पत्रकारों का ये हाल है तो देश के बाकी तबकों का हाल क्या होगा?
   दुनियाभर में फैली नस्लवाद या रंगभेद की ये समस्या हमारे लिए कलंक कि बात इसलिए है, क्योंकि हम सीना ठोककर कहते हैं कि हम एक जीवंत सभ्यता हैं। क्या जीवंत सभ्य समाज का दिमाग इतना कुंद हो सकता है, जो एक औरत के बलात्कार या झगड़े से हुई मौत को एक क्षेत्र या नस्ल विशेष के साथ जोड़ दे? अफसोस फिलहाल यही हो रहा है। बेहतर हो कि नेता औऱ समाजशास्त्री नस्लवाद की विचारधारा को लोगो के दिमाग से निकालने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी और पंजाब से अरुणाचल प्रदेश तक एक साझा प्रयास करें। लोग अपने दिमाग के ढक्कन को खोलें। वरना इसी तरह हर घटना को गलत मोड़ देते रहेंगे लोग।

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