शुक्रवार, फ़रवरी 14, 2014

प्यार का आलम क्या होगा...वो जाने या हम



घर के सामने का पार्क...बारिश से चंद मिनट पहले की ये तस्वीरें हैं,.बूंदाबादी शुरु हो गई थी। इस बूंदाबादी में ये नन्हें पिल्ले मस्ती कर रहे थे। जैसे ही पता लगा की पिक्चर ले रहा हूं..दोनो पोज मारने लगे..पुचकारा तो पास आकर उछलने-कूदने लगे..पर बारिश की बूंदों से बचने के लिए गेट में आने को तैयार न हुए। कुछ देर में रिमझिम शुरु हो गई...दोनो भाग कर जाने कहां दुबक गए। मैं खिड़की के पास आ बैठा...बाहर की नारंगी रोशनी से नहाती गलियों औऱ पार्क में पड़ती रिमझिम का मजा ले रहा हूं...हां हाथ मैं गर्म कॉफी का कप भी है। थोड़ी देर में सुबह का उजाला फैलने लगेगा। आसपास लोग रोजमर्रा की चिकचिक के बीच दिन की शुरुआत करने लगेंगे....पर इन सबसे इतर वैलेंटाइन्स डे का रंग भी दिखने लगेगा...चंद घंटे बाद ही दिल्ली की सड़कों पर भी बाकी शहरों की तरह मोहब्बत का रंग बिखरने लगेगा...हाथों में गुलाब थामे प्रेमी नजर आने लगेंगे...साथ ही उनको तरेरती नजरें भी होंगी....कई ऐसी नाराज नजरें उन्हें घूरेंगी..जो अपने जमाने में नाकाम मोहब्बत
की कहानी के पात्र होंगे...ऐसा क्यों होता है कि अपनी जवानी में इंकलाब और मोहब्बत के तराने गाने वाले लोग....प्रोढ़ होने पर मोहब्बत और इंकलाब के तराने के घोर विरोधी हो जाते हैं। आजादी के समय से ही फिल्मों की नायिका का बाप उसकी मर्जी से शादी की वकालत करता नजर आता है..पर हकीकत के धरातल पर अभी वैंलेंटाइन्स डे मनाने के नाम पर ही लोग मरने-मारने पर उतारु हो जाते हैं। आजादी के 64 साल बाद भी कई प्रेमियों के लिए मर्जी से जीवनसाथी चुनने की बात मृगमरिचिका है।
ये नन्हें पिल्ले इन सबसे दूर अब भी कहीं बारिश के थमने का इंतजार कर रहे हैं....ताकि ठंड में भी इनकी मस्ती चालू रहे। ऐसी मस्ती हम लोगो की दोस्तों के बीच कायम रहती है..या फिर बचपन में कि होती है। बंसत अभी शुरु ही हुआ है...उसपर बारिश से गुलजार इस गुलाबी ठंड ने मोहब्बत के दिन वैलेंटाइन्स का इस्तकबाल कर दिया है। प्रकृति ने तो ठंडी सांसे भरती आहों और रतजगों के मारे प्रेमियों के सुकुन के लिए आगे बढ़कर स्टेज तैयार कर दिया है....बारिश की रिमझिम से मदहोश हुई इस रात औऱ आने वाली गुलाबी ठंड के बीच आती सुबह का अहसास ऐसा है जिसको बताया नहीं जा सकता। ये आलम वो ही समझेगा..जिसने प्रेम का प्याला पिया होगा....हीर-रांझे की कहानी जी होगी....मीरा की पीर सही होगी...विरह की अग्नि में जो जला होगा....मिलन की आस में जिसने अनेकों रातें आंखों में काटी होगी। जिसने इन लम्हों को नहीं जिया होगा..वो इन्हें समझ नहीं पाएगा...जिसने इन लम्हों को जिया होगा, वो इसे कह नहीं पाएगा। सच में....पहले बसंत की बयार...फिर बारिश की रिमझिम...उसपर बैलेंटाइन्स डे का बुखार...उस पर पिया मिलन की आस....इन्हें समझाया नहीं जा सकता....इसलिए बेहतर है इन लम्हों को अपने अंदर उतारते हुए अपने को समेटता हूं। 
....Happy Valentines Day....

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...