सोमवार, जून 23, 2014

हो गई है अपनी तो ऐसी तेसी


  पहले चुनाव के नतीजों..फिर थकान और अंत में बीमारी ने पूरी तरह से क्लांत कर दिया था। जिसका असर जिंदगी में हर तरफ पड़ा। इसी दौरान मैंने जीवन का चालीसवां पड़ाव भी पार कर लिया। पता ही नहीं चला था कि कब जिंदगी प्रौढ़ हो चली। अब तक मेरा दिल सदा जवान रहा। उमंगे रह-रह कर हिलोरे लेता रहा... मगर इस बीमारी से पता चला कि अपने को मैंने काफी बदल लिया था। इस बीमारी से समझ आया कि आप कितना भी तेज हों...कितना भी उमंग भरे रहें..अगर आपके आसपास नकारात्मक विचारों के लोगों कि अधिकता है...तो न चाहकर भी देर सबेर आप उनकी नकारात्मक उर्जा का शिकार हो जाते हैं। काम करने वाली जगह और घर के अंदर कुछ लोगो को आप कभी बदल नहीं सकते। इन लोगो को आपको झेलना ही होता है। 
    बीमारी के दौरान ही कई चीजें याद आईं। कहावत है कि कभी किसी को खाते वक्त नहीं टोकना चाहिए, कभी किसी को पीछे से जाते वक्त अत्यावश्यक न हो तो टोकना नहीं चाहिए। कोई मुस्कुरा रहा हो तो न समझे कि वो कोई ग़म चबा रहा है। मगर मेरे साथ ये टोकाटी हमेशा चलती रही। मेरी उर्जा हमेशा लोगो कि चिढ़ का कारण बना रहा। 
   डॉक्टर से सतत बातचीत के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं अनजाने में हर वो चीज छोड़ता जा रहा था जो मेरी ताकत थी। जो मुझे उर्जा से भरपूर रखता था। दरअसल ऊपरवाल हर इंसान के अंदर उसकी जीवन से जुड़ी ऐसी आदते जन्मजात देता है। इसी तरह की मेरी आदत थी हर वीकेंड पर बाहर घूमने निकल जाना। कभी-कभी तो सिर्फ किताब पढ़ने के वास्ते मैंने दिल्ली से बाहर का रुख किया है। 
    इतना ही नहीं..हर शाम एक लंबी वॉक मेरी दिनचर्या का हिस्सा रही थी। यानि जितना खाता था उसके हिसाब से ही कैलोरी खर्च होती जाती थी। मैने सालों इस बात का पालन किया कि स्वस्थ शरीर हजार नियामत। मगर पिछले कुछ सालों से नकारात्मकता मेरे अंदर धर करती जा रही थी। मैने सारी अच्छी बातों को छोड़ दिया। घर पर  पड़े रहना मेरी आदत हो गई। छुट्टी वाले दिन भी दिल्ली से बाहर तो दूर दिल्ली के अंदर भी घूमना बंद सा कर दिया। 
     प्रोफेशनल लोगो की नेगेटिव बातों को अपने उपर लेने लगा। नतीजा पिछले तीन महीनों में डायबटिज जैसी बीमारी ने मुझे अपनी गिरफ्त में लिया। एक साधारण घाव की जांच में पता चला कि शूगर का लेवल 475 है। हालांकि तबतक किसी तरह के लक्षण मुझे महसूस नहीं हुए थे। मगर डॉक्टर के बताने के तीन चार घंटे के अंदर बीमारी के सारे लक्षण मुझे महसूस होने लग गए।
    अब ज़िंदगी परहेज और सावधानी का दूसरा नाम बन गई है। चटोरी जीभ बेचारी हमेशा के लिए बेड़ियों मे जकड़ दी गई है। फेवरेट चावल-चोखा-हरी मिर्च-आलू की सब्जी-नमकीन..सब खाना बैन हो गया है। हैरत होती है कि खाने के इस मुद्दे पर एलोपैथी और आर्युवेद के डॉक्टर एकमत हैं। 
    अब जिदंगी किस तरह अपना रुख लेगी? कौन सी दिशा पकड़ेगी? ये पता नहीं। मुझे इस बात का मलाल नहीं कि बीमारी ने दबोचा...मलाल इस बात का है कि ऐसी बीमारी ने मुझे जकड़ा जिसे मुझ जैसा कार्यशील और खुश रहना वाला व्यक्ति आसानी से टाल सकता था। खैर आजकल अपने को समटने की कोशिश में लगा हुआ हूं। नए रास्तों को बनाने का खाका खींचने की कोशिश कर रहा हूं। आखिर उम्मीद पर ही दुनिया कायम है। बहती हवा रुक नहीं सकती...पर इंसान तो बंध जाता है। अब बंधा हुआ मैं कितनी उमंग के साथ कितना चल सकता है देखना ये होगा।

मां..काश कुछ फिल्मी फरिश्ते मिलते

   पुरानी फिल्मों में फैमली डॉक्टर के हाथ में एक जादू का बक्सा होता था। कैसी भी बीमारी हो , एक गोली देता था , या इंजेक्शन लगाता था और ब...