गुरुवार, जुलाई 17, 2014

पर्यावरण और गंगा-जमुना की तहज़ीब का रोना?...रोहित

बातें हजार...दिखावा दुनिया का...औऱ नतीजा सिफर। कुछ यही हाल हमारे देश के कर्ताधरताओं का है। हमारे नेता और अधिकारी पर्यावरण के बेड़ा गर्क होने, नदियों के प्रदूषित होने और हवा के जहरिले होने का रोना अक्सर रोते हैं। खरबों, पद्म औऱ महापद्म (खरब के बाद रुपयों की गिनती हिंदी में) अब तक हरियाली बढ़ाने और नदियों का प्रदूषण काबू में करने के नाम पर खर्च कर दिए गए हैं। इसके बावजूद पर्यावरण का जहर काबू में नहीं आ रहा। इसके लिए सत्ता चलाने वाली हर पार्टी के साथ ही अधिकांश उदासिन जनता जिम्मेदार है।  
    भारत की सबसे पवित्र नदियों में शामिल गंगा का पानी जीवनदायनी नहीं रह गया है। अभी लोकसभा में एक सवाल पर पर्यारवण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावेडकर ने जो लिखित बयान दिया वो आंखे खोल देने वाला है। चाहे दिल्ली हो या कोई राज्य, हर जगह बेड़ा गर्क हो रहा है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार सबसे ज्यादा महाराष्ट्र की 28 नदियां  प्रदूषित हैं। उसके बाद नंबर आता है गुजरात का, जहां 19 नदियां प्रदूषित है। तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है जहां कि 12 नदियां प्रदूषित हैं। इसी उत्तर प्रदेश के बड़े इलाके से गंगा-यमूना बहती है। जाहिर है जब यहां गंगा-जमुना का बेड़ागर्क हो रहा है, तो गंगा-जमुना तहजीब के दम तोड़ने पर रोना काहे। जब अपनी नदियों का हम ख्याल नहीं रखते, तो इनपर अधारित तहज़ीब क्या खाक बचाएंगे। खैर यूपी के अलावा कनार्टक की 11, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश औऱ तमिलनाडु की 9 नदियां प्रदूषण का बोझ लिए बह रही हैं। यानि सारे देश की नदियों का हाल बेहाल है। 
     रह गई देश की राजधानी दिल्ली..तो इसका हाल जानकर देश के बाकी राज्यों की  बेहाली समझ में आ जाएगी। यानि जब राजधानी का हाल बेहाल है तो देश के बाकी हिस्सों में नदियों की हालत खाक ठीक होगी। देश की राजधानी से मात्र एक ही नदी बहती है यमुना। यमुना का भी महज चंद प्रतिशत हिस्सा दिल्ली से गुजरता है, लेकिन इस पूरी नदी के प्रदूषण को 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दिल्ली की ही देन है।(courtsey-Indiawaterportal.org - न लगाएं यमुना में डूबकी) इसी यमूना को साफ करने के नाम पर जितने खरब रुपए बहाए गए हैं उतने में जाने कितने नए शहर बस जाते। यहां हरियाली का ये हाल है कि एक रिकॉर्ड के अनुसार महज 7 साल में 15 फीसदी हरियाली सफाचट हो गई है। कई वाटर रिजर्व गायब हो गए हैं। केंद्र के अनुासर महज दिल्ली का नजफगढ़ नाला क्षेत्र, पड़ोसी शहर नोएडा और गाजियाबाद के साथ ही हरियाणा का फरीदाबाद और पानीपत देश के सबसे ज्यादा प्रदूषित क्षेत्रों में हैं। 
   इन नदियों का हाल इसलिए पता है क्योंकि ये नदियां देश के बड़े हिस्सों से होकर  बहती हैं। इसके उलट पहाड़ों औऱ राज्यों में बहने वाली जाने कितनी छोटी नदियों का अस्तित्व विलिन हो चुका है। जिसकी किसी को कोई फ्रिक नहीं है। इन छोटी नदियों का गायब होना सबसे बड़े खतरे की पहली बानगी हैं।
इन छोटी नदियों के गायब होने का मतलब टूटते पहाड़ों औऱ भयंकर अकाल के आगमन की सूचना है। सब जानते हैं कि नदियां अविरल नहीं बहेंगी तो कालांतर में हम भी नहीं बचेंगे। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमारे जमा पैसे से सिर्फ जानलेवा बीमारियों का इलाज ही कराती रह जाएंगी। जो गरीब होंगे वो तड़प तड़प कर जिएंगे, आसानी से मरंगे नहीं।। यानि हमारी उदासिनता और लापरवाही हमारे ही बच्चों को खा जाएगी। सावधान रहने की जरुरत आ ज है, क्योंकि कल चिड़िया के खेत चुग जाने पर पछताने से कोई फायदा नहीं होगा। 

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