बुधवार, अगस्त 06, 2014

'पीके'-नंगू-पंगू हुए आमिर खान

आखिरकार आमिर खान भी नंगा पूंगा हो गए पीके....माफ कीजिएगा कुछ पीके नहीं..राजकुमार हिरानी की फिल्म पीके के लिए हुए हैं नंगू-पंगू आमिर खान। सलमान खान बरसों पहले कमीज उतार कर टॉपलेस हुए थे। अब आमिर ने इक्सवीं सदी में कमीज औऱ पेंट के साथ-साथ चढ्ढी भी उतार दी है। वैसे हो सकता है कि जिसे हम नंगू लूक कह रहे हैं, बाद में उसके बारे में कहा जाए कि पोस्टर में आमिर ने चढ्ढी पहनी हुई थी, जो स्कीन कलर की होने के कारण पोस्टर में नहीं दिखी। इसलिए जरा दोबारा गौर से आंखे गड़ा कर देख लें, सच में ऐसा ही तो नहीं है।
   आमिर खान के इस नए लुक ने बवाल मचा दिया है। मचनी भी चाहिए, आखिर आमिर कोई ऐरे-गैरे अभिनेता नहीं हैं। आमिर लगातार दस साल से लाइन लगाकर सुपर हिट फिल्में दे रहे हैं। एकाध फिल्मों को छोड़कर, लगभग उनकी हर फिल्म ने करोड़ों कमाए हैं। अपने समकालिन सुपरस्टारों की तुलना में आमिर काफी एक्सपेरिमेंट करने वाले अभिनेता हैं। जाहिर है जब ऐसा सुपरस्टार अइसा लुक धरेगा, तो बवाल तो मचना ही था। लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि आमिर खान ने नंगू पंगू होकर कैसी क्रिएटिविटी दिखाई है? अब हमें तो नहीं पता, शायद फिल्म देखने के बाद पता चले। वैसे आमिर से पहले एक औऱ बड़े स्टार जॉन अब्राहम न्यूड सीन दे चुके हैं। जॉन के अलावा नील नीतिन मुकेश भी फिल्म में न्यूड सीन कर चुके हैं, लेकिन नंगा-पूंगा हुए आमिर पहले सुपरस्टार हैं। 
   जहां तक पोस्टर की बात है तो वो शानदार है, आधुनिक है, पर सवाल ये भी है कि क्या आमिर के कंजरवेटिव दर्शक उन्हें पसंद करेंगे? फिलहाल अबतक तो मॉल कल्चर वाले दर्शक को नंगू आमिर पंसद आए हैं। गली-दर-गली रहने वाली देसी शकीरा औऱ लेडी गागा की तो जैसे लॉटरी निकल गई है। आखिर उनका फेवरिट हीरो उस स्टाइल नजर में तो आया, जिसे वो सपने में देखा करती थीं।
   इस पोस्टर के साथ ही बहस भी छिड़ गई है, कई सवाल भी उठ रहे हैं। मगर इनसबस परे मेरे दिमाग में एक ही सवाल ठक-ठक कर रहा है। अगर कोई हीरोइन आमिर की जगह होती तो लोग क्या होता? आखिर हीरोइनें के बिकनी पोस्टर पर ही स्कीन शो का हल्ला मचने लगता है? फिर आमिर के नंगू-पंगू होने पर उन्हें उतनी नसीहतें(या कहें लानतें) क्यों नहीं मिल रहीं, जितनी हीरोइनों को मिलती हैं। इस बहस ने बरसों पुरानी लड़कियों के टॉपलेस होने की मुहिम की याद तजा करा दी है। खैर इस तरह बात करने लगेंगे, तो जाने कितनी मुहिमों को कब्रों से खोदकर या म्यूजियम से झाड़पोंछ कर निकालना पड़ेगा। बेहतर है बहस को यहीं छोड़ देते हैं। जिसे फिल्म देखनी हो, वो देखे औऱ जिसने नहीं देखनी हो वा न देखे। भारत आधुनिक और पुरातन के बीच जी रहा है। दोनो को एक-दूसरे को जीने देना चाहिए। 

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