मंगलवार, अगस्त 19, 2014

केजरीवाल भाई ये क्या हो रहा है

   
जब से आम आदमी पार्टी बनी है, तब से ही सुर्खियों में रही है। पार्टी में आना जाना लगा हुआ है। गड़बड़ ये है कि पार्टी छोड़ने वाले ज्यादातर सदस्य अरविंद को ही निशाना बना रहे हैं।  सबका आरोप भी एक ही है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? किसी राजनीतिक पार्टी में लोगो का आना जाना लगा रहता है। नेता अक्सर टिकट या पद के लालच में पार्टी छोड़ते हैं। बहुत कम लोग उसूलों को लेकर पार्टी से अलग होते हैं। हालांकि आप पार्टी के सत्ता में आने से पहले अबतक ज्यादातर वही लोग अऱविंद से अलग हुए थे जो राजनीति में नहीं जाना चाहते थे। शुरुआत में अरविंद के साथ ऐसे काफी लोग थे जिनका उद्देश्य राजनीति में बिना उतरे समाजिक दवाब औऱ आंदोलन के जरिए परिवर्तन लाना रहा है। अरविंद के राजनीति में कदम रखने के बाद यही लोग सबसे पहले अरविंद को टाटा बाय बाय करके गए।  
    इस बार जाने या अनजाने अरविंद केजरीवाल पर हमला शांति भूषण ने किया है। शांति भूषण उन्हीं प्रशांत भूषण के पिता हैं जो अऱविंद केजरीवाल के सबसे करीबी लोगो में एक हैं। अरविंद, मनीष औऱ प्रशांत की जोड़़ी इस पार्टी की सबसे बड़ी तिकड़ी है या कहें कि ये तीन बड़े हैं। अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शांति भूषण ने कहा है कि केजरीवाल में पार्टी को आगे बढ़ाने की क्षमता नहीं है। उन्हें ये काम किसी दूसरे को सौंप देना चाहिए। हालांकि पार्टी का चेहरा केजरीवाल को ही रहना चाहिए।
     शांति भूषण देश के बड़े वकीलों में गिने जाते है। जाहिर है कि उनकी बात आसानी से दरकिनार नहीं की जा सकती। अब ये तो केजरीवाल को ही देखना होगा कि ऐसा क्यों होता है? आखिर उनके करीबी रहा व्यक्ति उनपर घूमाफिराकर यही आरोप क्यों लगाता है? इतने करीबियों के आरोप अरविंद को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहे है। 
    दिल्ली में पार्टी की जमीन खिसकी नहीं है। लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर के बाद भी आम आदमी पार्टी ने काफी वोट बटोरे। इन वोटों को अगले विधानसभा चुनाव में बढ़ाए बिना सत्ता नहीं मिल सकती। जाहिर बिना सत्ता के कुछ बदलाव नहीं हो सकता। इसके साथ ही जरुरी है कि पार्टी में ऊपर से नीचे इसतरह के अंसतोष का निशाना केजरीवाल को नहीं बनना चाहिए। केजरीवाल को कार्यशैली में बदलाव लाना होगा। कार्यशैली में बदलाव लाना बदलना नहीं होता। आखिर केजरीवाल कोई राजनेता नहीं हैंं। जब जंग का तरीका बदलता है तो बदलाव आना तो लाजिमी है। सवाल यही है कि अब क्या केजरीवाल बदलाव लाने को तैयार होंगे?

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